डॉ. नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि | Dr Namvar Singh Ki Alochana Drishti

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Dr Namvar Singh Ki Alochana Drishti

डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह ने शुक्ल-द्विवेदी विवाद को दूसरी पीढ़ी तक ले जाने और उसे जारी रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । दोनों ही प्रगतिवादी या मार्क्सवादी आलोचक हैं और दोनों की यह समान विशेषता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को रूढ़ि के रूप में स्वीकार कारण के बजाए उदार प्रगतिशील चेतना को लेकर हिंदी आलोचना को एक नया आयाम दिया । आज के इस लेख में हम Dr Namvar Singh Ki Alochana Drishti को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना | Shukla Yugin Hindi Alochana

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shukla yugin hindi alochana

वास्तव में हिंदी आलोचना का पूर्ण रूप शुक्ल युग  में ही निखर पाया और इसका श्रेय इस युग के प्रमुख आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल को है। आज के इस लेख में हम Shukla Yugin Hindi Alochana को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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द्विवेदीयुगीन हिंदी आलोचना | Dwivediyugin Hindi Alochana

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dwivediyugin hindi alochana

हिंदी आलोचना को विकसित करने में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान सराहनीय है। उन्हीं का अनुसरण करते हुए द्विवेदी युग के अन्य लेखक भी आलोचना की ओर अग्रसर हुए। आज हम Dwivediyugin Hindi Alochana को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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भारतेन्दुयुगीन हिंदी आलोचना | Bhartenduyugin Hindi Alochana

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bhartenduyugin hindi alochana

वर्तमान युग में ‘आलोचना’ नामक विधा का तीव्र गति से विकास हुआ है । आलोचना का वास्तविक उद्भव संस्कृत की काव्यशास्त्रीय परंपरा में मिलता है , किन्तु हिंदी में भारतेन्दु युग से ही हिंदी आलोचना का सूत्रपात मिलता है । भारतेन्दु ने ‘नाटक’ नामक सर्वप्रथम आलोचनात्मक ग्रंथ लिखा। आज हम Bhartenduyugin Hindi Alochana का विस्तार से अध्ययन करेंगे और इसे समझने का प्रयास करेंगे ।

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डॉ.रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि | Dr Ramvilas Sharma ki Alochana Drishti

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Dr Ramvilas Sharma ki Alochana Drishti

आज हम मार्क्सवादी आलोचना के शिखर-पुरुष डॉ.रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि पर विचार करेंगे । उन्होंने हिंदी की मार्क्सवादी  आलोचना में ‘हिंदी जाति’, ‘हिंदी जाति की सांस्कृतिक चेतना’, ‘भाषा-समाज-संस्कृति-साहित्य’, ‘हिंदी नवजागरण’ जैसी अनेक नवीन अवधारणाओं पर नया चिंतन प्रस्तुत किया है। तो आइए अब Dr Ramvilas Sharma ki Alochana Drishti को विस्तार से समझने का प्रयास करें ।

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आलोचना के प्रकार |alochana ke prakar |आलोचना के भेद | alochana ke bhed

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alochana ke prakar

किसी साहित्यिक रचना की सम्यक् परीक्षा करना, उसके गुण-दोषों का उद्घाटन करना आलोचना है । आज हम alochana ke prakar या alochana ke bhed को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

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आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना पद्धति | Acharya Nanddulare Vajpeyi Ki Alochana Paddhati

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Acharya Nanddulare Vajpeyi Ki Alochana Paddhati

  अर्थात् उनके अनुसार ‘साहित्य’ की ‘स्वतंत्र सत्ता की स्वीकृति’ ही स्वच्छन्दतावाद का केंद्रीय तत्व है । आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की प्रसिद्धि हिंदी में सौष्ठववादी आलोचक के रूप में है। सौष्ठववादी समीक्षा पद्धति में ‘काव्य के सौन्दर्योद्घाटन’ पर विशेष बल दिया जाता है, शास्त्रीय समीक्षा पर नहीं। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने ‘प्रसाद’, ‘निराला’ और ‘पन्त’ की समीक्षा स्वच्छन्दतावादी एवं सौन्दर्य-बोधक मूल्यों की दृष्टि से की और इन्हें ‘छायावाद’ की वृहतत्रयी के रूप में प्रतिष्ठित  किया । उनके अनुसार- “काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों से ऊपर उठकर सौन्दर्य का उद्घाटन करना ही आलोचक का प्रधान कार्य है।” आलोचक अपनी प्रतिभा से भावों के उदात्त स्वरूप एवं मार्मिकता का विश्लेषण कर स्वयं तो आनन्दित होता ही है, पाठक को भी इसी भावभूमि पर ले जाता है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ‘छायावाद’ को प्रतिष्ठित करने वाले समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने छायावादी काव्य की विस्तृत समीक्षा करते हुए इस काव्यधारा को स्थापित करने … Read more

मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि | Muktibodh Ki Alochana Drishti

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muktibodh ki alochana drishti

मुक्तिबोध, जिनका वास्तविक नाम गजानन माधव मुक्तिबोध था, एक प्रसिद्ध हिंदी कवि और आलोचक थे। उनकी आलोचना दृष्टि हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, और उनके विचार आज भी प्रासंगिकहैं।  मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थी। वे साहित्य को समाज के परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते थे। उनका मानना था कि साहित्य समाज की सच्चाई को प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण साधन है।    मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे साहित्य को केवल एक कला के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक हथियार के रूप में भी देखते थे। उनका मानना था कि साहित्य समाज को बदलने की शक्ति रखता है। मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे साहित्य को व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ते थे। उनका मानना था कि साहित्य व्यक्तिगत अनुभवों को व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण … Read more

भारतेन्दुपूर्व हिंदी आलोचना | Bhartendupurva Hindi Alochana

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bhartendupurva hindi alochana

भारतेन्दु  से पूर्व भक्ति और रीति युग में आलोचना के क्षेत्र में प्रयास हुए हैं। भक्ति काल में भक्ति का प्रभाव इतना प्रबल है कि वहाँ अलग से काव्य-सिद्धांतों की चर्चा प्रायः नहीं हुई है। भक्त कवियों के लिए काव्य रचना ईश्वर भक्ति का साधन है इसलिए जहाँ ईश्वर है वहाँ उत्तम काव्य भी है। कबीर, सूर तुलसी, मीरा भक्तिकाल के ये सभी भक्त कवि इसी आदर्श को मानते हैं। यद्यपि तुलसीदास ने “सुरसरि सम सब कह हित होई” तथा “गिरा अर्थ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न” कह कर काव्य के प्रति अपनी सजगता भी प्रकट की है।  वैसे इसकाल में भक्तों के जीवन, विचार, भक्ति से परिचित कराने वाले ग्रंथ लिखे जाने लगे थे जिन्हें ‘वार्ता साहित्य’ के नाम से जाना जाता है। भक्त कवियों की कविता के संबंध में भी कहीं-कहीं विचार हुआ है। काव्य के वर्ण्य विषय और शैली बंधी विशेषताओं के अतिरिक्त काव्य के … Read more

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि | Acharya Hazariprasad Dwivedi Ki Alochana Drishti

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acharya hazari prasad dwivedi ki alochana drishti

बलिया जिला (उ.प्र.) के ‘आरत दुबे का छपरा’ नामक गाँव में जन्मे, काशी में शिक्षित हुए तथा शान्तिनिकेतन, चंडीगढ़ और काशी में अध्यापन करने वाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (19.8.1907-19.5.1979) मूलतः साहित्येतिहासकार, आलोचक और अनुसन्धानकर्ता हैं।  उन्होंने साहित्य को सांस्कृतिक चेतना के स्तर पर देखा है। इसी दृष्टि से उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण आलोचना ग्रंथ लिखे हैं और उनके माध्यम से उन्होंने शुक्ल जी के बाद की हिंदी आलोचना को किसी हद तक प्रभावित भी किया है। ‘हिंदी साहित्य कोश’ के अनुसार, “यद्यपि मूलतः द्विवेदी जी, रामचन्द्र शुक्ल की परम्परा के आलोचक हैं फिर भी साहित्य को एक अविच्छिन्न परम्परा में देखने पर बल देकर द्विवेदी जी ने हिंदी समीक्षा को नई दिशा दी।” आचार्य द्विवेदी की प्रमुख आलोचना कृतियाँ हैं:  ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद’, ‘कबीर’, ‘नाथ सम्प्रदाय’, ‘हिंदी साहित्य’ ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’, ‘साहित्य सहचर’, ‘हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास’, ‘मध्यकालीन बोध … Read more

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