सन्त काव्यधारा के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ |Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen

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Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen

‘भक्ति’ का उल्लेख सर्वप्रथम श्वेताश्वेतर उपनिषद में मिलता है । मोनियर विलियम्स के अनुसार ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘भज’ धातु से हुई है । भक्ति का उदय दक्षिण में हुआ । इस लेख में हम आज Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen का अध्ययन करेंगे ।

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मलिक मुहम्मद जायसी का रहस्यवाद | malik muhammad jayasi ka rahasyavad

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malik muhammad jayasi ka rahasyawad

malik muhammad jayasi ka rahasyawad athwa malik muhammad jayasi ke kavya men rahasyawad

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कबीर का काव्यशिल्प |kabir ka kavyashilp| kabir ki kavyakala

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kabir ka kavyashilp

कबीर भक्तिकाल की निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्तर्गत संत-काव्य धारा के प्रमुख और प्रतिनिधि कवि हैं। आज हम Kabir ka kavyashilp अथवा Kabir ki kavyakala इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे ।

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कबीर के साखियों की व्याख्या | Kabir ke Sakhiyon ki Vyakhya

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Kabir ke Sakhiyon ki Vyakhya

Kabir ke Sakhiyon ki Vyakhya

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नीतिकाव्य | Niti Kavya | नीति काव्य किसे कहते हैं | Niti Kavya Kise Kahte Hain

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Niti Kavya

नीतिकाव्य जीवन-व्यवहार को सुगम बनाने का आधार है। नीतिकाव्य सृजित करने में व्यावहारिक अनुभवों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। व्यक्ति इन अनुभवों को स्वयं के क्रिया-कलापों से तथा दूसरों के द्वारा अर्जित एवं कहे गए मन्तव्यों से ही अर्जित करता है।    स्वयं द्वारा अर्जित अनुभवों से यद्यपि व्यक्ति आत्मनिर्भर और संघर्षशील बनता है, तथापि दूसरों के अनुभव उसे सहजतापूर्वक जीवन को समझने मेंसहायक होते हैं। यह अनुभव यदि काव्य के रूप में होते हैं, तो वे मुहावरों जैसे हो उठते हैं। अधिकांश नीतिकथनपरक उक्तियों में जो सुग्राह्यता औरसरसता है, वह उन्हें मुहावरों की कोटि में ले जाने वाली है। हजारों वर्षों से नीतिपरक उक्तियाँ मनुष्य को जीवन के अँधेरों में प्रकाश की किरण बनकर उसे मार्ग दिखाती रही हैं, जीवन जीने का तरीका सिखाती रहीहैं। इस स्तर पर नीति काव्य शिक्षा के उद्देश्य को पूर्ण करने वाला बन जाता है।  नीतिकाव्य जीवन सुधार का लक्ष्य लेकर चलता है।नीति काव्य … Read more

कबीर का समाज दर्शन | Kabir Ka Samaj Darshan | कबीर एक समाज सुधारक के रूप में | Kabir Ek Samaj Sudharak Ke Rup Men | Kabir Ki Samajik Chetna

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल) का समय संवत् 1375 से 1700 (अर्थात् सन् 1318 ई. से 1643 ई.) तक है ।   उन्होंने भक्तिकाल का विभाजन निम्नानुसार किया है, जो आज सर्वमान्य है : भक्तिकाल का काल विभाजन : 1. निर्गुण धारा : (क) ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्यधारा) – इसके प्रतिनिधि कवि कबीर हैं । (ख) प्रेममार्गी शाखा ( सूफ़ी काव्यधारा) – इसके प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं । 2.सगुण धारा : (क) रामभक्ति शाखा – इसके प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं । (ख) कृष्णभक्ति शाखा –  इसके प्रतिनिधि कवि सूरदास हैं ।   इस प्रकार कबीर भक्तिकाल की निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्तर्गत संत-काव्य धारा के प्रमुख और प्रतिनिधि कवि हैं।  हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में इन महाकवियों का आविर्भाव हुआ था, संभवत: इसी को ध्यान में रखकर हिंदी साहित्य के इतिहास लेखक जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपने ग्रंथ ‘द मॉडर्न वर्नाक्यूलयर लिटरेचर ऑफ नॉर्दर्न हिंदुस्तान’ (1888 … Read more

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