काव्य हेतु | भारतीय काव्यशास्त्र | Kavya Hetu | Bhartiya Kavyashastra | Bharteeya Kavyashastra

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किसी भी वस्तु के निर्माण के लिए कुछ आवश्यक साधन ज़रूरी होते हैं, जिनके अभाव में उस वस्तु का सृजन संभव नहीं हो सकता। जिन साधनों या कारणों से वस्तु का निर्माण होता है, वस्तुतः ये साधन (हेतु) कहलाते हैं। काव्य या साहित्य की सर्जना के लिए कुछ आवश्यक कारण (हेतु) होते हैं । आज हम भारतीय काव्यशास्त्र के अंतर्गत Kavya Hetu को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

हेतु का अर्थ है कारण। कवि में काव्य-रचना की सामर्थ्य उत्पन्न करने वाले साधनों को काव्य हेतु या काव्य का कारण कहा जाता है। ये साधन ही कवि को काव्य-रचना में सक्षम बनाते हैं।

संस्कृत, हिंदी और अंग्रेजी के अधिकांश विद्वानों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से काव्यरचना के लिए तीन हेतुओं को मान्यता दी है :  1.प्रतिभा, 2. व्युत्पत्ति और 3. अभ्यास।

इन हेतुओं में प्रतिभा का सर्वाधिक महत्व है जिसे काव्य का बीज माना गया है। प्रतिभा के अभाव में कोई व्यक्ति काव्य रचना नहीं कर सकता क्योंकि इसके बिना मौलिक या नवीन रचना नहीं की जा सकती। प्रतिभा के साथ व्युत्पत्ति (बहुज्ञता-शास्त्रज्ञान और लौकिक ज्ञान) और अभ्यास नामक अन्य दो हेतुओं के योग से रचना में व्यापकता और उत्कृष्टता आती है।

काव्य-हेतु: अभिप्राय एवं आयाम

काव्य-हेतु से अभिप्राय काव्य रचना के मूल कारणों से है। भारतीय काव्यशास्त्र के आचार्यों ने काव्य-रचना के तीन हेतु स्वीकार किए हैं :

  • (1) प्रतिभा
  • (2) व्युत्पत्ति, और
  • (3) अभ्यास ।

 अब हम प्रतिभा के संबंध में भारतीय आचायों के मतों का अध्ययन करेंगे।

भारतीय काव्य-शास्त्र के आचार्यों के अनुसार काव्य-हेतु

भारतीय काव्य-शास्त्र के आचार्यों के अनुसार काव्य-हेतु निम्नानुसार हैं :

आचार्य भामह  

भामह भारतीय काव्यशास्त्र के आदि आचार्य माने जाते हैं। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यालंकारहै, जिसमें प्रतिभा के संबंध में उनके मौलिक विचार व्यक्त हुए हैं। आचार्य भामह प्रतिभा को काव्य रचना का प्रमुख हेतु मानते हैं। प्रतिभा के द्वारा ही श्रेष्ठ काव्य-रचना हो सकती है।

आचार्य भामह के अनुसार केवल प्रतिभा ही वह काव्य हेतु है जिससे काव्य की रचना की जा सकती है । आचार्य भामह के अनुसार भी काव्य के तीन हेतु हैं : 1. प्रतिभा, 2. व्युत्पत्ति और 3. अभ्यास।

इनमें से प्रतिभा को उन्होंने काव्य का मूल हेतु या कारण माना है और व्युत्पत्ति तथा अभ्यास को काव्य की उत्कृष्टता का हेतु।

आचार्य दण्डी

आचार्य दण्डी के प्रतिभा संबंधी विचार उनके प्रसिद्ध ग्रंथ काव्यादर्श में मिलते हैं। आचार्य दण्डी ने काव्य-रचना के लिए तीनों काव्य हेतुओं प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास को आवश्यक माना है।

आचार्य दण्डी के अनुसार केवल प्रतिभा से ही काव्य-सर्जना नहीं हो सकती है। काव्य-रचना के लिए प्रतिभा के साथ शास्त्र ज्ञान (व्युत्पत्ति) तथा अभ्यास की आवश्यकता पर दण्डी ने विशेष बल दिया है।

आचार्य वामन

आचार्य वामन ने प्रतिभा को कविता का मूल या बीज माना है किन्तु अन्य दो काव्य हेतुओं को भी महत्व प्रदान किया। पूर्व रचित काव्यों का अनुशीलन (अध्ययन), काव्यज्ञ (काव्य का ज्ञाता या कवि) के लिए आवश्यक है।

इस प्रकार आचार्य वामन प्रतिभा को महत्वपूर्ण काव्य हेतु मानते हुए व्युत्पत्ति और अभ्यास पर विशेष बल देते हैं।

आचार्य रुद्रट

आचार्य रुद्रट ने शक्ति (प्रतिभा) के साथ व्युत्पत्ति और अभ्यास को भी काव्य हेतुओं में महत्व दिया है।

रूद्रट ने प्रतिभा के दो भेद भी किए है- सहजा, जो जन्मजात होती है तथा उत्पाद्या जो शास्त्र तथा लोक से अर्जित की जाती है। रूद्रट प्रतिभा को काव्य का मूल हेतु स्वीकार करते हैं और उसे ही शक्ति मानते हैं।

आचार्य आनंदवर्द्धन

आचार्य आनंदवर्द्धन के अनुसार प्रतिभा और व्युत्पत्ति को काव्य का हेतु माना है। उनके अनुसार काव्य के हेतु दो ही हैं । इनमें प्रतिभा या शक्ति ही अनिवार्य हेतु है । इस प्रकार उन्होंने प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों की आवश्यकता प्रतिपादित की है।

आचार्य राजशेखर

सुप्रसिद्ध काव्यशास्त्रीय ग्रंथ काव्य मीमांसा के रचयिता आचार्य राजशेखर ने काव्य हेतुओं की विवेचना करते हुए प्रतिभा और व्युत्पत्ति दोनों को समान रूप से प्रमुख काव्य हेतु स्वीकार किया है। इन दोनों के योग से कविकर्म में श्रेष्ठता आती है।

उन्होंने प्रतिभा और व्युत्पत्ति को केन्द्र में रखकर कवि के दो प्रकार विकसित किए हैं। प्रतिभा-सम्पन्न काव्य कवि और व्युत्पत्तियुक्त काव्य कवि

आचार्य मम्मट

आचार्य मम्मट अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ काव्यप्रकाश में काव्य हेतुओं में शक्ति (प्रतिभा), निपुणता (व्युत्पत्ति) और अभ्यास की विवेचना (अनुसंधान) करते हैं।

उन्होंने शक्ति (प्रतिभा) को कवित्व का बीज कहा है- “शक्तिः कवित्व बीज रूपः यां विना काव्य न प्रसोत्” (काव्य प्रकाश 1/13) किन्तु निपुणता और अभ्यास को शक्ति (प्रतिभा) के साथ सम्मिलित मानते हैं।

आचार्य पंडितराज जगन्नाथ

 इन्होंने काव्य हेतुओं में केवल प्रतिभा को मान्यता दी है इसीलिए उन्हें प्रतिभावादी आचार्य भी कहा जाता है।  

उपर्युक्त विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि काव्य हेतुओं में प्रतिभा मुख्य है और सभी आचार्यों ने इसे काव्य-रचना में प्रमुखता प्रदान करते हुए इसकी अनिवार्यता स्वीकार की है। वस्तुतः साहित्य सर्जना की यह मूल शक्ति है।

हिंदी के विद्वानों के अनुसार काव्य-हेतु

हिंदी के विद्वानों के अनुसार काव्य हेतु निम्नानुसार हैं :

कुलपति मिश्र

कुलपति मिश्र ने रस रहस्यमें कहा है कि कवित्त का कारण कहीं शक्ति, कहीं व्युत्पत्ति, कहीं अभ्यास, कहीं तीनों जानिए।

भिखारीदास

भिखारीदास ने शक्ति को जन्मजात मानते हुए तीनों काव्य हेतु को स्वीकार किया है। उनके अनुसार शक्ति या प्रतिभा, सुकवियों द्वारा काव्य-रीति का अध्ययन और लोकानुभव तीनों ही काव्य हेतु अनिवार्य हैं ।

श्रीपति

श्रीपति की दृष्टि में 6 काव्यहेतु हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल 

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रतिभा को काव्य का मुख्य हेतु मानते हुए व्युत्पत्ति और अभ्यास को भी महत्त्व प्रदान किया है।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के अनुसार – कवि के लिए जिस बात की सबसे अधिक जरूरत होती है, वह प्रतिभा है। द्विवेदी जी ने व्युत्पत्ति और अभ्यास का भी महत्त्व स्वीकार करते यह कहा है कि जिस कवि को मनोविकारों और प्राकृतिक बातों का यथेष्ट ज्ञान नहीं होता, वह कदापि अच्छा कवि नहीं हो सकता है।

 डॉ. नगेन्द्र

 डॉ. नगेन्द्र  डॉ. नगेन्द्र ने प्रतिभा को सर्वाधिक महत्त्व दिया है। इन्होंने प्रतिभा को चेतना माना है और यह कहा है कि यह चेतना अनुभूति, चिंतन, विचार, संकल्प तथा कल्पना इत्यादि क्रियाएँ संपादित करती है।

पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार काव्य-हेतु

पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार काव्य हेतु निम्नानुसार हैं :

प्लेटो

प्लेटो ने हेतु के लिए प्रेरणा शब्द का प्रयोग किया है। उनके अनुसार कवि काव्य-प्रेरणा के क्षणों में रचना करता है। स्पष्ट है वे कवि को असाधारण मानते हैं और उसकी शक्ति को असामान्य। हम चाहें तो इसे प्रतिभा कह सकते हैं। उन्होंने कवि के लिए चिन्तन, अध्ययन, अभ्यास और शिक्षण को आवश्यक माना है।

अरस्तू

अरस्तू ‘अनुकरण’ शब्द का प्रयोग कर कवि के लिए कल्पना, स्वतंत्र चिन्तन और प्रतिभा को आवश्यक मानता है। उसकी दृष्टि में अध्ययन और अभ्यास भी कवि के अनिवार्य गुण हैं।

हौरेस

हौरेस ने प्रतिभा और शास्त्रज्ञान (व्युत्पत्ति) के समीकरण पर बल दिया है। उसने प्रतिभा का स्पष्ट उल्लेख तो नहीं किया है किन्तु आविष्कार (Invention), नवीन उद्भावना, अन्तर्दृष्टि आदि शब्दों का प्रयोग प्रतिभा के लिए ही किया है।

लौंजाइनस

लौंजाइनस प्रतिभा तथा अभ्यास दोनों को काव्य हेतु मानते थे। औदात्य के पाँच तत्त्वों के विवेचन से यह स्पष्ट है कि उन्होंने प्रतिभा, अध्ययन और अभ्यास तीनों हेतुओं को काव्य रचना का कारण माना है।

डॉ. जॉनसन

नव्यशास्त्रवाद युग के डॉ. जॉनसन ने कवि के लिए, मौलिकता, कल्पना और स‌द्विवेक को आवश्यक माना है। इन्हें हम प्रतिभा के मूलतत्त्व कह सकते हैं।

विलियम वर्ड्सवर्थ

विलियम वर्ड्वर्थ ने काव्य में कल्पना को महत्त्व दिया है और कल्पना का संबंध प्रतिभा से है। चिन्तन मनन, अध्ययन और अभ्यास को भी वे काव्य हेतु मानते हैं।

कालरिज

कालरिज के वक्तव्यों से स्पष्ट है कि वे प्रतिभा, सहृदयता, विवेक और अध्ययन को काव्य हेतु मानते थे।

शैली

शैली कवि के लिए आवश्यक मानते हैं कि वह “श्रेष्ठ, परम बुद्धिमान एवं विश्रुत (विख्यात) होना चाहिए।” इससे स्पष्ट है कि शैली भी प्रतिभा, चिन्तन-मनन अभ्यास और अध्ययन को काव्य हेतु मानते हैं।

क्रोचे

क्रोचे के वक्तव्यों से यह प्रकट होता है कि वे आत्माभिव्यक्ति को काव्य सृजन की प्रेरक वृत्ति मानते हैं।

फ्रायड

फ्रायड के अनुसार काव्यरचना का मूल कारण कामवासना ही है। दमित कामवासनाएँ या अतृप्त वासनाएँ ही मनुष्य को काव्यसृष्टि की ओर प्रेरित करती हैं।

एडलर

फ्रायड के शिष्य एडलर ने हीनता की भावना को काव्यसृजन का मूल प्रेरक कारण माना है। उसके विचार से मानव अपने अभावों और न्यूनताओं की पूर्ति साहित्य के द्वारा करता है।

युंग

युंग के अनुसार काव्यरचना की प्रेरक शक्ति अभिव्यक्ति की अदम्य कामना है, जो जीवनेच्छा या आत्मरक्षा से घनिष्ठ रूप में जुड़ी हुई है।

वस्तुतः इन मनोविश्लेषणवादियों ने साहित्य को एकांगी एवं संकुचित दृष्टि से देखते हुए अपने मत स्थापित किए हैं। डॉ. नगेन्द्र के अनुसार काव्य रचना के लिए जहाँ एक ओर सौन्दर्य का उद्दीपन आवश्यक है, वहाँ दूसरी ओर अभाव की पीड़ा भी अपेक्षित है। इन दोनों आनंद और पीड़ा के संयोग से काव्य का जन्म होता है।

प्रतिभा का अर्थ और महत्व  

प्रतिभा के स्वरूप पर कुछ आचार्यों ने विशेष रूप से प्रकाश डाला है जिनमें आचार्य आनन्दवर्द्धन, आचार्य अभिनवगुप्त, आचार्य भट्टतौत आदि प्रमुख हैं।

आचार्य आनन्दवर्द्धन मानते हैं कि प्रतिभा वह शक्ति है जिसके द्वारा प्राचीन विषयों को भी नवीन रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

आचार्य अभिनवगुप्त ने प्रतिभा के स्वरूप का निरूपण करते हुए उसे अपूर्ववस्तु निर्माण क्षमा कहा है। अपूर्व वस्तुओं का निर्माण केवल प्रतिभा के माध्यम से ही हो सकता है ।

आचार्य भट्टतौत ने प्रतिभा के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा माना है। अर्थात् उनके अनुसार नये-नये अर्थों का स्वतः उदघाटन करने वाली प्रज्ञा (बुद्धि) प्रतिभा कहलाती है ।

आचार्य महिम भट्ट ने कवि की प्रतिभा को शिव के तृतीय नेत्र से उपमित किया है। जिसकी शक्ति से वह त्रिलोक में स्थित भावों का साक्षात्कार करता है।

आचार्य पण्डित जगन्नाथ प्रतिभा का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कहते हैं – काव्य-रचना के अनूकूल शब्द तथा अर्थ को प्रस्तुत करने की क्षमता प्रतिभा है ।

प्रतिभा के प्रकार

आचायों ने प्रतिभा के भेदों का भी विवेचन किया है। आचार्य रुद्रट ने शक्ति (प्रतिभा) के दो भेद किए हैं- (1) सहजा (2) उत्पाद्या ।

उनके अनुसार, सहजा प्रतिभा जन्मजात होती है और उत्पाद्या अध्ययन आदि से अर्जित होती है।

आचार्य राजशेखर प्रतिभा के दो भेद स्वीकार करते हैं- कारयित्री और भावयित्री।

इनमें से कारयित्री प्रतिभा जन्मजात होती है और इसका संबंध कवि कर्म से (अथवा कवि से) है और भावयित्री प्रतिभा का संबंध आलोचना कर्म से (अथवा पाठक या आलोचक से) है।

आचार्य राजशेखर ने कारयित्री प्रतिभा के पुनः तीन प्रकार बतलाए हैं- (1) सहजा, (2) आहार्या, और (3) औपदेशिकी ।

1) सहजा प्रतिभा: यह पूर्वजन्म के संस्कारों से प्राप्त होती है और इस जन्म में अल्प प्रयत्न से उद्दीप्त (जागृत) हो जाती हैं।

2) आहार्या प्रतिभा: यह प्रतिभा वर्तमान जीवन के संस्कारों से उत्पन्न होती है। अतः इसके लिए अधिक अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है।

3) औपदेशिकी प्रतिभा: देवता, गुरु, तंत्र, मंत्र आदि से उद्बुद्ध (जागृत) प्रतिभा औपदेशिकी है। उपदेश आदि से प्राप्त होने के कारण इसी औपदेशिकी कहते हैं। इसका संबंध वर्तमान जीवन से रहता है।

आचार्य हेमचन्द्र ने प्रतिभा के दो प्रकार निरूपित किए हैं-

(1) सहजा और (2) औपाद्यिकी।

(1) सहजा: स्वतः (अपने आप) स्फुरित होने वाली प्रतिभा ‘सहजा’ है।

(2) औपाद्यिकी:  मंत्र और देवाराधना आदि से प्राप्त होने वाली प्रतिभा औपाद्यिकी है।

व्युत्पत्ति का अर्थ और महत्व  

व्युत्पत्ति शब्द वि उपसर्ग के साथ उत्पत्तिशब्द के मेल से बनता है। इसका तात्पर्य यह है कि लोक (संसार) में जो कुछ भी उत्पन्न है, उसका विशेष ज्ञान होना व्युत्पत्ति है।

वास्तव में इसके अंतर्गत लोक-व्यवहार और प्रकृति आदि विभिन्न विषयों का ज्ञान समाहित (शामिल) रहता है। इसीलिए व्युत्पत्ति को बहुज्ञता( अनेक विषयों की जानकारी)  भी कहा गया है। यह अर्थ काव्यशास्त्र के सभी आचार्यों द्वारा मान्य है। आचार्य मम्मट ने इसे निपुणता की संज्ञा दी है।

व्युत्पत्ति के प्रकार

व्युत्पत्ति के प्रकार : व्युत्पत्ति के दो भेद किए गए हैं- शास्त्रीय और लौकिक ।

1. शास्त्रीय व्युत्पत्ति: शास्त्रीय व्युत्पत्ति अध्ययन से प्राप्त होती है ।

2. लौकिक व्युत्पत्ति:  लौकिक व्युत्पत्ति लोक के अनुभव एवं निरीक्षण से प्राप्त होती है ।

शास्त्रों के मनन-चिंतन और लोक के निरीक्षण तथा काव्य-परंपरा का गंभीर अध्ययन करने से कवि में निपुणता आती है और उसका अनुभवजन्य ज्ञान भी विस्तृत होता है जिसके माध्यम से वह काव्य को जीवन और समाज के निकट लाने में समर्थ होता है।

व्युत्पत्ति का क्षेत्र असीमित होता है क्योंकि लोक और शास्त्र की कोई सीमा नहीं मानी गई। व्युत्पत्ति का अधिकाधिक ज्ञान होने से काव्य-दोषों में कमी आती हैं।

अभ्यास का अर्थ एवं महत्व 

काव्य हेतुओं में ‘अभ्यास’ महत्वपूर्ण कारक है। आचार्य राजशेखर के अनुसार निरंतर प्रयास करना अभ्यास है। सभी आचार्यों ने अभ्यास को प्रतिभा का पोषक और संस्कारक माना है।

आचार्य दण्डी का मत है कि अभ्यासपूर्वक वाणी (माँ सरस्वती) की उपासना करने पर अवश्य ही वह अनुग्रह (कृपा) करती हैं।

आचार्य वामन के अनुसार अभ्यास के द्वारा ही कवि कर्म में कुशलता प्राप्त की जा सकती है ।

आचार्य हेमचंद्र (काव्यानुशासन) मानते हैं कि अभ्यास से प्रतिभा संस्कारित होकर कामधेनु जैसी हो जाती है और काव्यामृत प्रदान करती है ।

निष्कर्ष

इस प्रकार प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास तीनों काव्य हेतु एक दूसरे के पूरक हैं। किसी एक के बिना भी काव्य-सृजन कठिन है। कोई एक अपने आप में पर्याप्त नहीं।

 प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास ही प्रमुख काव्य हेतु हैं, किन्तु प्रतिभा सर्वप्रमुख है जिसे व्युत्पत्ति और अभ्यास से निरंतर निखारा जा सकता है । वस्तुतः ये तीनों समन्वित रूप में ही काव्य के हेतु हैं जिन्हें अलग-अलग नहीं किया जा सकता ।

जिस प्रकार पानी को बार-बार छानने से वह निर्दोष हो जाता है और बर्तन को बार-बार मांजने से वह चमक उठता है उसी प्रकार व्युत्पत्ति और अभ्यास से प्रतिभा को निर्दोष बनाया जा सकता है ।

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