कॉलरिज का कल्पना सिद्धान्त | Coleridge Ka Kalpana Siddhant

15 min read
Coleridge Ka Kalpana Siddhant

कॉलरिज का पूरा नाम सैमुअल टेलर कॉलरिज (Samuel Taylor Coleridge) है। इनका जन्म 21 अक्टूबर 1772 में इंग्लैंड के सेंट मेरी नामक स्थल पर हुआ । इस लेख के माध्यम से हम आज Coleridge Ka Kalpana Siddhant को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

Read More about कॉलरिज का कल्पना सिद्धान्त | Coleridge Ka Kalpana Siddhant

टी.एस.इलियट की परम्परा की अवधारणा | T S Eliot Ki Parampara Ki Avadharna

23 min read
t s eliot ki parampara ki avadharna

आधुनिक काल के पाश्चात्य समीक्षकों में टी.एस.इलियट (1888-1965 ई.) का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनका जन्म सेन्ट लुई (अमेरिका) में हुआ, किन्तु शिक्षा पेरिस और लंदन में हुई । बाद में वे लंदन में बस गए । वे बीसवीं सदी के महान कवियों और आलोचकों में गिने जाते हैं। उन्हें 1948 ई. में साहित्य का नोबल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। इलियट की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना “Tradition and Individual Talent” है जिसमें साहित्य की आधारभूत एवं मौलिक समस्याओं पर प्रभावी ढंग से विचार किया गया है। आलोचना के क्षेत्र में उनके अत्यंत महत्वपूर्ण निबंध इस प्रकार हैं : Tradition and Individual Talent, Poetry and Drama, The Function of Criticism, The English Metaphysical Poets, The Frontiers of Criticism. टी.एस.इलियट बीसवीं सदी के महत्वपूर्ण अंग्रेजी कवि और आलोचक हैं। वे अंग्रेजी कविता के महत्वपूर्ण आधुनिक कवि हैं। इलियट, अंग्रेजी स्वच्छन्दतावादी कवि और आलोचक वर्ड्सवर्थ एवं कॉलरिज की काव्य संबंधी स्थापनाओं के विरुद्ध अर्थात् स्वच्छन्दतावाद विरोधी स्थापनाओं के लिए जाने जाते हैं। इलियट ने अंग्रेजी … Read more

आई ए रिचर्ड्स का व्यावहारिक (समीक्षा) सिद्धांत | I A Richards ka vyavaharik samiksha siddhant

18 min read
I. A. Richards ka vyavaharik samiksha siddhant

1929 ई. में आई.ए.रिचर्ड्स का ‘प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म’ ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। इसे हिंदी में व्यावहारिक आलोचना (समीक्षा) कहते हैं। I. A. Richards ka vyavaharik samiksha siddhant को समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें ।

Read More about आई ए रिचर्ड्स का व्यावहारिक (समीक्षा) सिद्धांत | I A Richards ka vyavaharik samiksha siddhant

शैली विज्ञान | Shaili Vigyan | Pashchatya Kavya Shastra

14 min read
shaili vigyan

‘शैली’ मूल लातानी (लैटिन) शब्द ‘स्तिलुस’ (stylus) से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है ‘कलम’। उसी के अर्थ का विस्तार हुआ है – कलम की प्रयोग विधि, लेखन की विधि, अभिव्यक्ति की विधि । तो आइए अब विस्तार से shaili vigyan को समझने का प्रयास करते हैं । काव्यशास्त्र के विद्वान्, रस मर्मज्ञ डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, ‘शील’ शब्द में ‘अण् प्रत्यय के योग से शैली शब्द बना है। अतः शैली के मूल में शील’ शब्द है। शील का अर्थ है स्वभाव । जब साहित्य का भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन साहित्य के कलात्मक मर्म (गूढ़ अर्थ, स्वरूप) को समझने तथा उसके भाषिक सौन्दर्य का अनुसंधान करने के लिए किया जाता है तब वह शैली-वैज्ञानिक अध्ययन बन जाता है । शैली-विज्ञान का संबंध एक ओर साहित्यशास्त्र से है और दूसरी ओर भाषा-विज्ञान से । डॉ. भोला नाथ तिवारी के विचार से, “शैली के वैज्ञानिक अध्ययन को शैली विज्ञान कहते हैं।”  चेस्टरफील्ड का कथन है … Read more

आई ए रिचर्ड्स का संप्रेषण सिद्धान्त | I A Richards ka Sampreshan Siddhant

11 min read
I A Richards ka Sampreshan Siddhant

I A Richards ka Sampreshan Siddhant

Read More about आई ए रिचर्ड्स का संप्रेषण सिद्धान्त | I A Richards ka Sampreshan Siddhant

बिम्ब क्या है | Bimb Kya Hai

8 min read
Bimb Kya Hai

ये बिम्ब एक प्रकार से संचित अनुभूतियों के रूप में हमारे अवचेतन मन (subconscious mind) में सदा विद्यमान रहते हैं और समय-समय पर स्मृति एवं कल्पना की सहायता से पुनः हमारे चेतन स्तर पर उदित होकर हमें भाँति-भाँति के बोध प्रदान करते हैं। कवि या कलाकार इन्हीं बिम्बों को अपनी रचना में प्रस्तुत करता है, जिन्हें ग्रहण करते हुए पाठक या दर्शक सामाजिक विषय का बोध प्राप्त करते हैं।   दूसरे शब्दों में बिम्ब ऐंद्रिय अनुभूति (पाँच ज्ञानेंद्रिओं अर्थात् – आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा के माध्यम से ग्रहण की गई अनुभूति) का प्रतिबिंब है, जो कि मन में अंकित हो जाता है।   बिम्ब की परिभाषा साहित्यिक दृष्टि से बिम्ब की अनेक परिभाषाएँ की गयी है। सी० डी०लेविस महोदय ने बिम्ब के स्वरूप का सांगोपांग विवेचन करते हुए कहा है—“काव्यात्मक विम्ब शब्दों के माध्यम से निर्मित एक ऐसा चित्र है, जिसका किसी न किसी प्रकार केऐन्द्रिक गुण से सम्पर्क हो।” … Read more

रूसी रूपवाद | rusi rupvad | रूपवाद | rupvad | pashchatya kavyashastra | Russian Formalism | Formalism

10 min read
rusi rupvad

पाश्चात्य काव्यशास्त्र के अंतर्गत आज हम rusi rupvad या rupvad को समझने का प्रयास करेंगे । इस सिद्धान्त को विस्तार से समझने के लिए आप नीचे का ये विडियो भी देख सकते हैं :  ‘रूपवाद’ का उद्भव रूस (Russia) में हुआ इसलिए इसे रूसी रूपवाद भी कहा जाता है। रूस में रूपवादी समीक्षा का सूत्रपात 19वीं शती के अन्तिम चरण में हुआ और 20वीं शती के अन्तिम वर्षों तक साहित्य समीक्षा को यह आन्दोलित करती रही। काव्य में वस्तु (Content) और रूप (Form) दोनों में किसे अधिक महत्त्व दिया जाय, यह प्रश्न नया नहीं है। भारतीय आचार्यों और पाश्चात्य काव्य-चिन्तकों, दोनों ने इस प्रश्न पर बहुत पहले विचार किया था। वस्तुतः कलावादी भी प्रकारान्तर से (दूसरी तरह से) रूपवाद के ही समर्थक रहे हैं। ‘रूपवाद’ पर विचार करने के लिए आवश्यक है कि हम काव्य में ‘वस्तु’ (Content) क्या है? और ‘रूप’ (Form) क्या है? इसे भली-भाँति समझ लें। सामान्यतः काव्य … Read more

प्लेटो का प्रत्ययवाद या प्लेटो का प्रत्यय सिद्धान्त | plato ka pratyayvad ya plato ka pratyay siddhant | plato ka pratyay siddhant | plato ka pratyayvad

18 min read
plato ka pratyay siddhant, plato ka pratyayvad

पश्चिम में विधिवत् रूप से एक शास्त्र के रूप में साहित्य की आलोचना की शुरुवात सबसे पहले प्लेटो (427-347 ई.पू.) के माध्यम से हुई । उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जिसे एथेन्स (यूनान) का पतनकाल कहा जाता है। आज भी विद्वान प्लेटो द्वारा कविता पर लगाए गए आरोपों से जूझ रहे हैं और उनका सही समाधान उन्हें नहीं मिल पा रहा है। समय-समय पर प्लेटो के संवादों में परवर्ती काव्यशास्त्र में विकसित अनेक सिद्धांतों के बीज भी खोजने के प्रयत्न किए गए हैं। इस तरह के प्रयत्न करने वाले विद्वानों ने करुणा और त्रास की दोहरी मिश्रित स्थिति या विरेचन सिद्धांत, विरुद्धों के सामंजस्य का सिद्धांत आदि के बीज संकेत प्लेटो में पाए हैं जबकि सच बात यह है कि प्लेटो के चिंतन का महत्व काव्य सिद्धांतों की सूची बनाने में नहीं है बल्कि इस बात में है कि प्लेटो कविता को लेकर बुनियादी प्रश्न उपस्थित करते हैं। … Read more

मार्क्सवादी साहित्य और कला-चिन्तन | Marxvadi Sahitya aur Kala Chintan | Marxvadi Sahitya Chintan

9 min read
Marxvadi Sahitya aur Kala Chintan

मार्क्सवादी कला और साहित्य-चिन्तन मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित है। इसके दो प्रमुख आधार हैं- एक द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और दूसरा ऐतिहासिक भौतिकवाद।   द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद एक विकास का सिद्धान्त है जो क्रिया, प्रतिक्रिया और समन्वय के द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसका संबंध प्रकृति और जगत के नियमों की व्याख्या से है ।  ऐतिहासिक भौतिकवाद मनुष्य के सम्पूर्ण इतिहास की व्याख्या है । मानव-समुदाय का मूल प्रयत्न आर्थिक या उत्पादन-परक है। इसी के लिए वह श्रम का आधार ग्रहण करता है। इन्हीं तत्त्वों के आधार को ग्रहण कर कला और साहित्य का निर्माण होता है। अतः कला और साहित्य भी मानव के व्यापक कार्यकलाप का अंग है। वह उसके श्रम को मधुर बनाता है और उत्पादन के उपरान्त प्राप्त सफलता के आधार पर आगे के निर्माण और विकास की कल्पना प्रदान करता है और उसका मार्ग प्रशस्त करता है।  इस प्रकार मार्क्सवाद साहित्य और कला के सम्बन्ध में एक … Read more

अभिजात्यवाद क्या है | आभिजात्यवाद क्या है | Abhijatyavad Kya Hai | Classicism Kya Hai

13 min read
abhijatyavad kya hai

हिंदी शब्द अभिजात्यवाद या आभिजात्यवाद अंग्रेजी शब्द क्लासिसिज्म [CLASSICISM] का पर्याय है। हिंदी में आभिजात्यवाद के अतिरिक्त शास्त्रवाद या श्रेण्यवाद आदि कई नाम इसके लिए प्रस्तावित किए गए हैं।   आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ने उसके लिए हिंदी  में ‘श्रेण्यवाद‘ शब्द प्रस्तावित किया किन्तु यह  शब्द प्रचलन में नहीं आ सका।   आभिजात्यवाद या क्लासिसिज्म की परिभाषा और व्याख्या समय-समय पर अनेक प्रकार से की गई है। वस्तुतः लैटिन शब्द ‘क्लासिक‘ का प्रयोग रोम के करदाताओं के सर्वोच्च वर्ग के लिए किया जाता था। बाद में सामान्य जनता से भिन्न अभिजात वर्ग या श्रेष्ठ वर्ग के साहित्य के लिए किया जाने लगा। परिणामतः क्लासिसिज्म (आभिजात्यवाद), क्लासिक (अभिजात) और क्लासिकल (अभिजात्य) ये तीनों शब्द सर्वश्रेष्ठ के लिए वाचक हो गए। ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में ‘क्लासिक‘ का अर्थ अभिजात लेखक समझा जाता था, जो अल्पसंख्यक अभिजात (उच्च वर्ग) के लिए लिखता है।  कुछ समय बाद वह कृति क्लासिक कहलाने की अधिकारिणी मानी जाने लगी जिसमें … Read more

मिथक | मिथक क्या है | Mithak | Mithak Kya Hai | Myth | Myth Kya hai

8 min read

  ‘मिथक’ शब्द अंग्रेजी के ‘मिथ’ (Myth) और ग्रीक शब्द ‘माइथोस’ शब्द पर आधारित है। ‘मिथ’ (Myth) का प्रयोग ‘कल्पित कथा’ या ‘पौराणिक कथा’ के लिए किया जाता है।  अरस्तू ने अपने ग्रन्थ ‘पोयटिक्स’ में ‘मिथक’ शब्द का प्रयोग ‘मनगढ़ंत कथा’ के लिए किया है। मिथक परम्परागत अनुश्रुत (परंपरा से प्राप्त ज्ञान) कथा है जो किसी अतिमानवीय प्राणी या घटना से सम्बन्धित होती है, जो बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लिया जाता है।    हिंदी में इस शब्द का पहला प्रयोग आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया। ‘मिथ’ का मूल ग्रीक भाषा का शब्द ‘मुथॉस’  है जिसका अर्थ ‘वाणी का विषय’ है। ‘वाणी का विषय’ से तात्पर्य है, एक कहानी एक आख्यान (वर्णन, वृतांत, कथा), जो प्राचीन काल में सत्य माने जाते थे और कुछ रहस्यमय अर्थ देते थे। लेटिन भाषा में यह शब्द ‘मिथास’ है, जिसका अर्थ है – शब्द-कथा या कहानी।  इस प्रकार ‘मिथक’  ऐसे आख्यान (वर्णन, वृतांत, कथा) को कहते है, जिसमें कोई तार्किक संगति न हो। … Read more

संरचनावाद क्या है | Sanrachanavad Kya Hai

21 min read
sanrachanavad kya hai

संरचनावाद अंग्रेजी शब्द (Structuralism) का हिंदी पर्याय है । संरचनावाद पाश्चात्य समीक्षा जगत से हिंदी में आया।  यह 1960 के दशक के फ्रांस में विकसित बौद्धिक विश्लेषण एवं चिंतन की वह पद्धति है जिसे विश्व स्तर पर भाषाविदों, साहित्य समीक्षकों, दार्शनिकों, मनोविज्ञान शास्त्रियों तथा नृविज्ञान शास्त्रियों (anthropologist) का उत्साहवर्द्धक समर्थन मिला । तो चलिए आज हम sanrachanavad kya hai  को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं ।  ‘संरचनावाद’ की अवधारणा का मूल स्त्रोत जेनेवा और पेरिस में  भाषाविज्ञान के प्रोफेसर फर्डिनेन्ड-डि-सस्यूर (Ferdinand de Saussure, 1857-1913) द्वारा प्रतिपादित ‘भाषा-सिद्धांत’है ।‘संरचनावाद’ का केंद्रवर्ती  बिन्दु ‘कृति’ है, कृतिकार अथवा  समीक्षक नहीं । ‘संरचनावाद’ का गहरा संबंध ‘भाषा’ से है । ‘संरचनावाद’ भाषिक दृष्टि  से साहित्य के मूल्यांकन का प्रतिमान (model) है।  भाषा का ऐसा कलात्मक  प्रयोग, जो मानव स्थितियों के नाना पहलुओं को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है, ‘संरचनावाद’ के अंतर्गत आता है।   भाषा और अर्थ परस्पर जुड़े रहते हैं । अतः किसी भी साहित्यिक कृति … Read more

प्लेटो का काव्य सिद्धांत | Plato ka Kavya Siddhant

31 min read
Plato ka Kavya Siddhant

पाश्चात्य काव्य-चिंतन की परंपरा का विकास 5 वीं सदी ईस्वी पूर्व से माना जाता है। पतंतु पाश्चात्य आलोचना में भौतिक सिद्धान्तों का सर्वप्रथम प्रतिपादन प्लेटो द्वारा ही हुआ । इसी काल में पाश्चात्य अर्थात् ग्रीक आलोचना का क्रमबद्ध स्वरूप देखने को मिलता है । इसके पहले कतिपय यूनानी साहित्यकारों (होमर, पिण्डार, गार्जियस, अरिस्टोफनीस आदि) की कृतियों में हमें भले ही कुछ फुटकर आलोचना के सिद्धान्तों के दर्शन हों, किन्तु उनका कोई सारगर्भित और व्यवस्थित रूप हमें देखने को नहीं मिलता । एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में पाश्चात्य साहित्यालोचन की पहली झलक प्लेटो (427-347 ई.पू.) के ‘इओन’ नामक संवाद में मिलती है । प्लेटो का जन्म 427 ई.पू.में एथेंस में हुई और मृत्यु 347 ई.पू.में हुई। इनका मूल नाम अरिस्तोक्लिस था, लेकिन इनके गुरु ने इन्हें प्लातोन नाम दिया। आज हम इन्हें अरबी-फारसी में अफलातून और अंग्रेजी में प्लेटो के नाम से जानते हैं। प्लेटो की महत्वपूर्ण रचनाएँ ईओन (Ion), विचार … Read more

अरस्तू का अनुकरण सिद्धांत | Arastu Ka Anukaran Siddhant

23 min read
Arastu Ka Anukaran Siddhant

पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में यूनानी विद्वान अरस्तू (384 ई.पू.-322 ई.पू.) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है । वे एक ओर तो प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो के शिष्य थे तो दूसरी ओर विश्व-विजेता सिकंदर महान के गुरु होने का गौरव भी उन्हें प्राप्त है।    उन्होंने अपने जीवन में लगभग चार सौ ग्रन्थों की रचना की । उनके साहित्य-संबंधी विचार ‘काव्य-शास्त्र’ (Poetics) एवं ‘भाषण-शास्त्र’ (Rhetorics) में उपलब्ध होते हैं। इन्हीं के आधार पर हम अरस्तू के अनुकरण सिद्धान्त पर प्रकाश डालने का प्रयत्न करेंगे । यूनानी भाषा के ‘मिमेसिस’ (Mimesis) शब्द का अंग्रेजी में रूपांतरण किया गया है- ‘इमिटेशन’ (Imitation) और हिंदी में इसका अनुवाद है ‘अनुकरण’ या ‘अनुकृति’ । पाश्चात्य काव्यशास्त्रीय चिंतन में अनुकरण सिद्धांत का बड़ा व्यापक प्रभाव और महत्व है। इसका संबंध काव्य की रचना प्रक्रिया से है । अरस्तू ने प्लेटो के अनुकरण संबंधी मत का संशोधन और विशद विश्लेषण करके उसे एक कला सिद्धांत के रूप में … Read more

error: Content is protected !!
↑