अनुवाद शब्द वर्तमान समय में अत्यंत प्रचलित शब्द है । एक भाषा में कही गई बात को दूसरी भाषा में व्यक्त करना ही अनुवाद है ।
अनुवाद एक भाषिक प्रक्रिया है । अनुवाद वास्तव में दो भाषाओं के बीच सांस्कृतिक सेतु का काम करता है ।
इस प्रकार एक भाषा की किसी सामग्री का दूसरी भाषा में रूपांतर ही अनुवाद है । अनुवाद का कार्य है- एक भाषा (स्त्रोत भाषा) में व्यक्त विचारों को दूसरी भाषा (लक्ष्य भाषा) में व्यक्त करना ।
अनुवाद शब्द की व्युत्पत्ति
अनुवाद शब्द ‘अनु‘ उपसर्ग तथा ‘वाद‘ शब्द के संयोग से बना है : अनु + वाद = अनुवाद। ‘अनु‘ उपसर्ग का अर्थ होता है – पीछे या अनुगमन करना तथा ‘वाद‘ शब्द का संबंध है – वद् धातु से, जिसका अर्थ होता है कहना या बोलना। इस प्रकार अनुवाद शब्द का शाब्दिक अर्थ तो होगा (किसी के) कहने या बोलने के बाद बोलना।
यह तो आप जानते ही हैं कि प्राचीन काल में हमारे देश में गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी। प्रायः गुरु या आचार्य लोग जो कुछ बोलते या मंत्रों का उच्चार करते थे; शिष्य लोग गुरु के उन कथनों के पीछे-पीछे उन्हीं बातों को दोहराते थे। इसी को अनुवचन या अनुवाद कहा जाता था।
पाणिनि ने अपनी ‘अष्टाध्यायी’ में ‘अनुवाद’ शब्द का प्रयोग किसी ज्ञात बात को कहने के संदर्भ में किया है – अनुवादे चरणानाम्।
इसी तरह भर्तृहरि ने भी ‘अनुवाद’ शब्द का प्रयोग दुहराने या पुनर्कथन के अर्थ में ही किया है – आवृत्तिरनुवादों वा।
जैमिनीय न्यायमाला में भी अनुवाद को ज्ञात का पुनर्कथन ही माना गया है – ज्ञातस्य कथनमनुवादः।
कहने का तात्पर्य इतना ही है कि हमारे यहाँ अनुवाद शब्द का प्रयोग गुरु के कथनों को शिष्यों के द्वारा दुहराए जाने के लिए होता था। शिष्य के लिए दुहराना या पुनर्कथन करना इसलिए आवश्यक था कि हमारे यहाँ शिक्षा मौखिक परंपरा में दी जाती थी।
आज अनुवाद शब्द को हम जिस अर्थ में ग्रहण करते हैं वह संस्कृत में प्रयुक्त अनुवाद के अर्थ से थोड़ा भिन्न है। आज अनुवाद शब्द को अंग्रेजी के Translation शब्द के पर्याय के रूप में ग्रहण किया जाता है।
अंग्रेजी का ट्रांसलेशन शब्द भी लैटिन के दो शब्दों Trans तथा Lation के संयोग से बना है जिसका अर्थ होता है – पार ले जाना।
वस्तुतः अनुवाद में एक भाषा में कही गई बात को दूसरी भाषा में ले जाया जाता है। अतः एक भाषा के पार (दूसरी भाषा में) ले जाने की प्रक्रिया के लिए ही ट्रांसलेशन शब्द अंग्रेजी में प्रचलित हो गया ।
इस प्रकार संस्कृत तथा अंग्रेज़ी के शब्दों की व्युत्पत्ति के आधार पर हम कह सकते हैं कि –
- अनुवाद शब्द का अर्थ है एक बार कही गई बात को दोहराना या पुनर्कथन।
- यहाँ शब्द तथा शब्द-रूपों के बजाए अर्थ के दोहराए जाने की बात की ओर संकेत किया जा सकता है।
- ट्रांसलेशन शब्द से भी लगभग यही अर्थ निकलता है कि अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके अंर्तगत एक भाषा के पाठ में व्यक्त अर्थ को दूसरी भाषा में ले जाया जाता है।
इस प्रकार दोनों दृष्टियों में कोई मौलिक भेद नहीं है। एक में अर्थ को दोहराने की बात कही गई है दूसरी में अर्थ को एक भाषा से उठा कर दूसरे भाषा में ले जाने की बात कही गई है।
अनुवाद का अर्थ
आज के संदर्भ में यदि हम अनुवाद को देखें तो यह कह सकते हैं कि अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा हम एक भाषा में व्यक्त विचारों को दूसरी भाषा में व्यक्त करते हैं। जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है उसे स्रोत भाषा तथा जिस भाषा में अनुवाद किया जाता है उसे लक्ष्य भाषा कहते हैं ।
स्रोत भाषा में व्यक्त अर्थ को लक्ष्य भाषा में अन्तरित करने की यह प्रक्रिया बड़ी जटिल प्रक्रिया है। इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रत्येक भाषा की संरचना अपने में विशिष्ट होती है। उसकी सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश एवं मान्यताएँ विशिष्ट होती हैं। जीवन और जगत को देखने की दृष्टि विशेष होती है।
हर भाषा एक ही भौतिक सत्य को अपने-अपने ढंग से भाषा में अभिव्यक्ति प्रदान करती है। अतः अनुवाद में एक भाषा में व्यक्त अर्थ को दूसरी भाषा में व्यक्त करना इतना आसान नहीं होता। उदाहरण के लिए हिंदी के निम्नलिखित वाक्यों पर ध्यान दीजिए-
- आज हमारे यहाँ मेहमान आए।
- आज हमारे यहाँ मेहमान आ गए।
- आज हमारे यहाँ मेहमान आ धमके।
- आज हमारे यहाँ मेहमान आ मरे।
हिंदी के इन सभी वाक्यों में यद्यपि मुख्य अर्थ तो एक ही है लेकिन फिर भी सभी वाक्यों में अर्थ के स्तर पर सूक्ष्म अंतर भी है। वाक्य (3) में वक्ता की मेहमानों के आने के प्रति अनिच्छा व्यक्त हो रही है तथा वाक्य (4) में यह अनिच्छा अपनी चरम सीमा पर जा पहुँची है।
यदि हम अंग्रेजी में इन वाक्यों का अनुवाद करें तो सभी वाक्यों का एक ही अनुवाद होगा – Guests came to us today क्योंकि अंग्रेजी में संयुक्त क्रियाओं का प्रयोग नहीं होता और हिंदी में संयुक्त क्रियाओं के माध्यम से जो सूक्ष्म अर्थ की विविधता आई है उसका अंग्रेजी में सीधे अनुवाद कर पाना कठिन ही नहीं असंभव है। व्यंजित अर्थ के लिए हमें अनुवाद करते समय लक्ष्य भाषा में कुछ जोड़ना पड़ेगा।
स्रोत भाषा की अभिव्यक्तियों के लिए लक्ष्य भाषा में समतुल्य अभिव्यक्तियाँ खोजना एक कठिन कार्य होता है। अनुवादक लक्ष्य भाषा और स्रोत भाषा के बीच एक ऐसे सेतु का निर्माण करता है जिससे दोनों के बीच तालमेल स्थापित हो सके और स्रोत भाषा पाठ तथा लक्ष्य भाषा पाठ के बीच इस सेतु का कार्य करता है अनुवाद ।
अनुवादक का द्विभाषिक होना एक अनिवार्य शर्त होती है, अर्थात् अनुवादक से यह अपेक्षा की जाती है कि उसका दोनों भाषाओं (स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा) पर मातृभाषा के समान अधिकार होना चाहिए ।
इसके अलावा अनुवादक को मूल भाषा पाठ के विषय का भी अच्छा ज्ञान होना चाहिए । विषय की पर्याप्त जानकारी के अभाव में भी प्रायः अनुवाद स्तरीय नहीं हो पाता। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति भौतिक-विज्ञान के पाठ का अनुवाद कर रहा है और उसे भौतिक विज्ञान का विषय ज्ञान बिल्कुल नहीं है तो भी दोनों भाषाओं का उचित ज्ञान होने पर भी वह आदर्श अनुवाद नहीं कर सकता।
अनुवाद की परिभाषा
अनुवाद दो भाषाओं के बीच एक सेतु का काम करता है। अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हम एक भाषा में व्यक्त विचारों को दूसरी भाषा के पाठकों तक पहुँचाने का कार्य करते हैं। अब हम अनुवाद की परिभाषा पर विचार करेंगे।
विभिन्न विद्वानों ने अनुवाद की थोड़े बहुत अंतर के साथ अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं। अनुवाद के स्वरूप को समझने में ये परिभाषाएँ हमारी काफी मदद कर सकती हैं। आइए पहले विभिन्न विद्वानों द्वारा दी गई इन परिभाषाओं पर नजर डालें –
नाइडा : “अनुवाद का तात्पर्य है स्रोत भाषा में व्यक्त संदेश के लिए लक्ष्य भाषा में निकटतम सहज समतुल्य संदेश को प्रस्तुत करना। यह समतुल्यता पहले तो अर्थ के स्तर पर होती है फिर शैली के स्तर पर।”
Translating Consists in producing in the receptor language the closest natural equivalent to the message of the source language first in meaning and secondly in style.
इस प्रकार नाइडा अनुवाद में अर्थ अर्थात कथ्य पक्ष तथा शैली अर्थात् शिल्प दोनों को ही महत्व देकर चलते हैं। उनके अनुसार सफल अनुवादक वही हो सकता है जो लक्ष्य भाषा में अर्थ और शैली की समतुल्यता की सृष्टि कर पाने में समर्थ होता है।
कैटफोर्ड : “एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्य सामग्री से प्रतिस्थापित करना ही अनुवाद है।”
The replacement of textual material in one language by equivalent textual material in another language.
इस तरह कैटफोर्ड अनुवाद को पाठ्य सामग्री के प्रतिस्थापन के रूप में परिभाषित करते हैं। उनके अनुसार यह प्रतिस्थापन (replacement) भाषा के विभिन्न स्तरों-स्वन, स्वनिम, लेखिम, भाषा की वर्ण संबंधी इकाइयों लिपि, वर्णमाला आदि शब्द तथा संरचना सभी स्तरों पर होना चाहिए।
नाइडा ने अनुवाद में मूल पाठ के शिल्प की तुलना में अर्थ पक्ष के अनुवाद को अधिक महत्व दिया था, वहाँ कैटफोर्ड अर्थ की तुलना में शिल्प संबंधी तत्वों को अधिक महत्व देते हैं ।
न्यूमार्क : “अनुवाद एक ऐसा शिल्प है जिसमें एक भाषा में व्यक्त संदेश के स्थान पर दूसरी भाषा के उसी संदेश को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।”
Translation is a craft in which an attempt is made to present a message in one language by substituting it with the same message in another language.
उपर्युक्त तीनों ही परिभाषाओं से यह स्पष्ट होता है कि अनुवाद एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंर्तगत एक भाषा के पाठ में व्यक्त संदेश को दूसरी भाषा के पाठ के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। या इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि अनुवाद एक भाषाई पाठ में व्यक्त संदेश को दूसरी भाषा के पाठ में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया का परिणाम है। अतः अनुवाद एक प्रक्रिया भी है और उसका परिणाम भी ।
हैलिडे अनुवाद को प्रक्रिया या उसके परिणाम के रूप में न देख कर उसे दो भाषाई पाठों के बीच के संबंध के रूप में देखते हैं क्योंकि उनके अनुसार ये पाठ एक जैसी स्थितियों में एक जैसा प्रकार्य ही करते हैं –
हैलिडे : “अनुवाद एक संबंध है जो दो या दो से अधिक पाठों के बीच होता है, ये पाठ समान स्थिति में समान प्रकार्य संपादित करते हैं ।”
अर्थात् हैलिडे ने अनुवाद को ऐसे संबंध के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया है जो दो भाषाओं के पाठों के मध्य होता है। शर्त यही है कि ये दोनों पाठ समान अर्थ को व्यक्त करने वाले होने चाहिए ।
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि एक भाषा में प्रस्तुत कथ्य को दूसरी भाषा में प्रस्तुत करना अनुवाद है। अनुवाद की सभी परिभाषाएँ वस्तुतः अनुवाद की प्रवृति को स्पष्ट करने का कार्य करती हैं।
अनुवाद का स्वरूप
अनुवाद भाषा, साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके माध्यम से एक भाषा में व्यक्त विचारों, भावनाओं, अनुभवों, ज्ञान और सूचनाओं को दूसरी भाषा में प्रस्तुत किया जाता है। अनुवाद का अर्थ केवल एक भाषा के शब्दों को दूसरी भाषा के शब्दों में बदलना नहीं है, बल्कि मूल रचना के भाव, अर्थ, उद्देश्य, शैली और सांस्कृतिक संदर्भों को सुरक्षित रखते हुए उन्हें दूसरी भाषा में सहज एवं प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करना है। इस दृष्टि से अनुवाद एक कला होने के साथ-साथ बौद्धिक, भाषाई और रचनात्मक प्रक्रिया भी है।
अनुवाद का स्वरूप व्यापक और बहुआयामी है। इसे विभिन्न आधारों पर अनेक प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है। इनमें शाब्दिक अनुवाद और भावानुवाद प्रमुख हैं। शाब्दिक अनुवाद में मूल भाषा के शब्दों, वाक्यों और अभिव्यक्तियों का यथासंभव सीधा अनुवाद किया जाता है। इसमें शब्दों की समानता और मूल पाठ की संरचना को अधिक महत्त्व दिया जाता है। इसके विपरीत भावानुवाद में शब्दों की अपेक्षा मूल रचना के भाव, विचार और आशय को प्राथमिकता दी जाती है। इसमें अनुवादक को अपनी भाषाई समझ, कल्पनाशीलता और अभिव्यक्ति क्षमता का उपयोग करना पड़ता है, ताकि मूल संदेश लक्ष्य भाषा में स्वाभाविक रूप से व्यक्त हो सके।
साहित्यिक अनुवाद अनुवाद का एक महत्त्वपूर्ण स्वरूप है। इसके अंतर्गत कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध और आत्मकथा जैसी साहित्यिक विधाओं का अनुवाद किया जाता है। साहित्यिक अनुवाद में केवल कथ्य का रूपांतरण पर्याप्त नहीं होता, बल्कि मूल रचना की संवेदना, कलात्मकता, सौंदर्य, शैली और सांस्कृतिक विशेषताओं को बनाए रखना भी आवश्यक होता है। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिक एवं तकनीकी अनुवाद में विषय से संबंधित तथ्यों, सिद्धांतों और पारिभाषिक शब्दावली की सटीकता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। कानूनी, प्रशासनिक, व्यावसायिक और पत्रकारिता संबंधी अनुवाद भी इसके महत्त्वपूर्ण स्वरूप हैं। इन सभी क्षेत्रों में अनुवाद की प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं।
अनुवाद की प्रक्रिया में दो भाषाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। जिस भाषा की सामग्री का अनुवाद किया जाता है, उसे स्रोत भाषा तथा जिस भाषा में अनुवाद प्रस्तुत किया जाता है, उसे लक्ष्य भाषा कहते हैं। एक सफल अनुवाद के लिए अनुवादक को दोनों भाषाओं के व्याकरण, शब्दावली, मुहावरों, लोकोक्तियों और सांस्कृतिक परिवेश का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। इसके साथ ही विषय की समझ, संदर्भों की पहचान तथा उपयुक्त शब्दों के चयन की क्षमता भी आवश्यक है। अनुवादक का प्रयास होना चाहिए कि मूल रचना की आत्मा सुरक्षित रहे और लक्ष्य भाषा में अभिव्यक्ति सहज, स्पष्ट, स्वाभाविक तथा प्रभावशाली बने।
वर्तमान वैश्वीकरण के युग में अनुवाद का महत्त्व निरंतर बढ़ रहा है। विभिन्न देशों और समाजों के बीच ज्ञान-विज्ञान, शिक्षा, साहित्य, तकनीक, व्यापार और संस्कृति का आदान-प्रदान अनुवाद के माध्यम से ही व्यापक स्तर पर संभव हो रहा है। यह भाषाई सीमाओं को कम करके विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी समझ, सहयोग और सद्भाव को बढ़ावा देता है।
इस प्रकार, अनुवाद केवल भाषांतरण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ज्ञान, विचार, संवेदना और संस्कृति के आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम है। इसका स्वरूप बहुआयामी होने के कारण यह साहित्य और समाज दोनों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
अनुवाद के स्वरूप को समझने के लिए अनुवाद को प्रायः दो संदर्भों में लिया जाता है – (1) व्यापक संदर्भ में तथा (2) सीमित संदर्भ में ।
अनुवाद व्यापक संदर्भ में
1) अन्तः भाषिक अनुवाद,
2) अन्तर भाषिक अनुवाद, तथा
3) अन्तर प्रतीकात्मक अनुवाद ।
अन्तःभाषिक अनुवाद
“अन्तःभाषिक” शब्द का अर्थ है अनुवाद की वह प्रक्रिया जो एक ही भाषा के अंतर्गत घटित होती है। यहाँ प्रतीक 1 तथा प्रतीक 2 एक ही भाषा के प्रतीक होते हैं। दोनों ही प्रतीकों का संबंध किसी एक भाषा की दो भिन्न व्यवस्थाओं से होता है। अर्थात् यहाँ अनुवादक एक ही बात को उसी भाषा में कुछ दूसरी तरह से व्यक्त कर देता है।
उदाहरण के लिए यदि कोई हिंदी कविता का अनुवाद हिंदी गद्य में या हिंदी गद्य का अनुवाद पद्य में करता है तो यह अन्तः भाषिक अनुवाद का उदाहरण माना जाएगा।
इस प्रकार जब एक ही भाषा की एक शैली से उसी भाषा की किसी दूसरी शैली में अनुवाद किया जाता है तो वह अन्तः भाषिक अनुवाद का उदाहरण होता है।
यह तो आप जानते ही हैं कि हिंदी तथा उर्दू दो भिन्न भाषाएँ नहीं हैं बल्कि एक ही भाषा से जन्मी दो शैलियाँ हैं जिनकी लिपि अलग-अलग है। “हिंदी शैली” में संस्कृत के तत्सम शब्दों का प्रयोग अधिक होता है तो “उर्दू शैली” में अरबी-फारसी के शब्दों का अधिक प्रयोग। हाँ यह बात अलग है कि हिंदी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है तो उर्दू फारसी लिपि में। लेकिन लिपि भिन्न हो जाने से भाषाएँ भिन्न-भिन्न नहीं हो जाती।
हम किसी भी भाषा को किसी भी लिपि में लिख सकते हैं। “Mohan ghar jata hai” (मोहन घर जाता है) वाक्य रोमन लिपि में लिख देने से वह अंग्रेजी भाषा का वाक्य नहीं बन गया। वह वास्तव में हिंदी भाषा का ही वाक्य है जो रोमन लिपि में लिखा गया है।
इसी तरह लिपियाँ समान हो जाने पर भी भाषाएँ परस्पर भिन्न हो सकती हैं। संस्कृत, मराठी, हिंदी, नेपाली सभी भिन्न-भिन्न भाषाएँ हैं पर लिखी देवनागरी लिपि में ही जाती हैं। अब यदि कोई व्यक्ति हिंदी शैली (प्रतीक 1) से उर्दू शैली (प्रतीक 2) में अनुवाद करता है तो वह अन्तः भाषिक अनुवाद कहा जा सकता है।
मुंशी प्रेमचंद ऐसे ही कहानीकार हैं जिन्होंने अपनी अनेक कहानियाँ पहले हिंदी या उर्दू में लिखीं और फिर उनका अन्तः भाषिक अनुवाद दूसरी शैली में किया।
“शतरंज के खिलाड़ी” का हिंदी रूप 1924 में पहले “माधुरी” पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। बाद में इसका अन्तः भाषिक अनुवाद उन्होंने उर्दू शैली में किया और यह अनुवाद “शतरंज की बाजी” के नाम से दिसंबर 1924 की “जमाना” पत्रिका में छपा।
कहानी से निम्नलिखित अंश के माध्यम से इसे भली-भांति समझा जा सकता है :
हिंदी शैली (“माधुरी” में प्रकाशित)
“अंधेरा हो चला था। बाजी बिछी हुई थी। दोनों बादशाह अपने-अपने सिंहासनों पर बैठे हुए मानों उन दोनों वीरों की मृत्यु पर रो रहे थे।”
उर्दू शैली (“ज़माना” में प्रकाशित)
“अंधेरा हो गया था। बाज़ी बिछी हुई थी। दोंनों बादशाह अपने-अपने तख्त पर रौनक अफरोज़ थे। उन पर हसरत छाई हई थी, गोया मक्तूलीन की मौत का मातम कर रहे थे।”
अन्तर भाषिक अनुवाद
दो भिन्न भिन्न भाषाओं की भिन्न भिन्न प्रतीक व्यवस्थाओं के बीच जो अनुवाद किया जाता है वह “अन्तर ‘भाषिक अनुवाद” कहलाता है। इसे “भाषान्तर” भी कहते हैं। यहाँ प्रतीक 1 तथा प्रतीक 2 दो भिन्न-भिन्न भाषाओं के होते हैं। यह अनुवाद का वह रूप है जिसका प्रयोग हम प्रतिदिन अपने कार्य कलापो में करते हैं।
उदाहरण के लिए हिंदी से अंग्रेज़ी, रूसी, चीनी या जापानी भाषा में यदि अनुवाद किया जाता है तो यह अनुवाद “अन्तरभाषिक अनुवाद” कहलाएगा।
जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है उसे स्रोत भाषा और जिस भाषा में अनुवाद किया जाता है उसे लक्ष्य भाषा कहते हैं। यहाँ अनुवादक से यह अपेक्षा की जाती है कि उसका दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार हो। न केवल वह स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा की संरचना संबंधी विशेषताओं एवं जटिलताओं से बखूबी परिचित हो बल्कि दोनों भाषाओं की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं; मान्यताओं; ऐतिहासिक तथ्यों, धार्मिक विश्वासों आदि सभी का ज्ञान होना चाहिए।
अनुवादक को दो भाषाओं के बीच अनुवाद करते समय यह ध्यान रखना होता है कि भाषा एक संरचना मात्र नहीं होती। भाषा तो प्रयोग की वस्तु है। विभिन्न प्रयोग संदर्भ उसे अर्थ के विभिन्न आयाम प्रदान कर सकते हैं। भाषा की संरचना में सामाजिक सांस्कृतिक मूल्य अंतर्मुक्त होकर आते हैं।
यदि कोई अंग्रेजी भाषी हिंदी की संरचना मात्र सीख कर बिना सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों को जाने अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करता है तो वह आदर्श अनुवाद नहीं कर सकता।
उदाहरण के लिए हिंदी भाषी सामाजिक- सांस्कृतिक मूल्यों से अपरिचित व्यक्ति My father is coming today. वाक्य का अनुवाद “आज मेरा पिता आ रहा है” कर सकता है क्योंकि संरचनागत नियम के अनुसार तो यह वाक्य ठीक है। परन्तु व्यवहार के स्तर पर हिंदी भाषी इस वाक्य को स्वीकार नहीं करेगा।
अनुवादक को संरचना तथा उसके नियमों के साथ यह भी जानना होगा कि हिंदी में सम्मान देने के लिए एक वचन कर्ता के साथ बहुवचन क्रिया रूप का प्रयोग किया जाता है और तब उपयुक्त अनुवाद होगा “आज मेरे पिताजी आ रहे हैं”।
अतः अन्तरभाषिक अनुवाद में अनुवादक को न केवल स्रोत भाषा पाठ की संरचना तथा बुनावट पर ध्यान देना होता है बल्कि उन सभी सामाजिक सांस्कृतिक मूल्यों की भी जानकारी रखनी होती है जो उस भाषाई समाज के अभिन्न अंग हैं। चूंकि प्रत्येक समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्य विशिष्ट होते हैं अतः भिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ वाली अभिव्यक्तियों का अनुवाद करना अनुवादक के लिए एक श्रमसाध्य कार्य होता है।
अन्तर प्रतीकात्मक अनुवाद
अन्तर प्रतीकात्मक अनुवाद में अनुवाद किसी भाषा की प्रतीक व्यवस्था से किसी अन्य भाषेतर प्रतीक व्यवस्था में अनुवाद किया जाता है। अर्थात् उपर्युक्त प्रथम दो प्रकार के अनुवादों में प्रतीक 2 का संबंध किसी भाषा व्यवस्था से था जबकि यहाँ प्रतीक 2 का संबंध भाषिक व्यवस्था से नहीं होता।
उदाहरण के लिए किसी कहानी या नाटक को फिल्म के रूप में अंतरित करना वस्तुतः अन्तर प्रतीकात्मक अनुवाद के अंतर्गत आता है।
इस प्रकार “गोदान”, “गबन”, “साहब बीबी और गुलाम”, “तीसरी कसम” आदि अनेक उपन्यासों, को लेकर जो फिल्में बनी हैं वे अन्तर प्रतीकात्मक अनुवाद का उदाहरण हैं।
इस तरह अन्तर प्रतीकात्मक अनुवाद में प्रतीक 1 तो भाषा से संबंधित ही रहता है परन्तु प्रतीक 2 का संबंध किसी अन्य माध्यम से हो जाता है।
“कामायनी” में जो कथ्य प्रसाद जी ने कविता के माध्यम से व्यक्त किया है उसी कथ्य को चित्रात्मक अभिव्यक्ति देकर जगदीश गुप्त ने प्रस्तुत किया है। यह भी अन्तर प्रतीकात्मक अनुवाद या प्रतीकान्तर का उदाहरण है। किसी कविता को संगीत के सुरों में ढालना भी ऐसा ही अनुवाद है।
अनुवाद सीमित संदर्भ में
व्यापक संदर्भ में अनुवाद के क्षेत्र में न केवल दो भाषाओं के बीच होने वाले अनुवाद को ही सम्मिलित किया गया था बल्कि एक ही भाषा की दो बोलियों या शैलियों के बीच होने वाले अनुवाद तथा भाषिक प्रतीक व्यवस्था तथा भाषिकेतर प्रतीक व्यवस्थाओं के बीच होने वाले अनुवाद को भी शामिल किया गया था।अनुवाद का यह बड़ा ही व्यापक स्वरूप है।
लेकिन सीमित संदर्भों में दो भाषाओं के बीच घटित होने वाले अनुवाद व्यापार को लिया जाता हैं। अर्थात् जिसे हमने “अन्तरभाषिक अनुवाद” की संज्ञा प्रदान की थी केवल वही अनुवाद सीमित संदर्भ में आता है। इसीलिए इसमें दो भाषाओं के बीच अनुवाद को ही वास्तविक अनुवाद माना जाता है।
इस प्रकार के अनुवाद (अंतर भाषिक अनुवाद) को भी दो आयामों में समझना होता है-
1) पाठ धर्मी आयाम
2) प्रभाव धर्मी आयाम
पाठधर्मी आयाम
पाठधर्मी आयाम के अंर्तगत अनुवाद करते समय स्रोत भाषा के पाठ या मूल पाठ को केन्द्र में रखा जाता है। यहाँ यह माना जाता है कि मूल भाषा पाठ स्वयं में एक स्वायत्त रचना होती है, अतः अनुवादक मूल पाठ की संरचना तथा बुनावट को ध्यान में रखकर ही अनुवाद करे तथा अनूदित पाठ की संरचना तथा बुनावट यथासंभव मूल पाठ के अनुरूप ही हो।
अनुवादक को यहाँ यह अनुमति नहीं है कि वह मूल भाषा पाठ के अभिलक्षणों से भिन्न कुछ भी अपनी ओर से अनूदित पाठ में जोड़ने-घटाने का कार्य करे। यहाँ तो अनुवादक से यही अपेक्षा की जाती है कि अनूदित पाठ की संरचना और बुनावट मूलभाषा पाठ के अनुरूप ही हो।
पाठधर्मी अनुवाद वस्तुतः भाषा के सापेक्षतावादी सिद्धांत पर आधारित है। यह सिद्धांत यह मानकर चलता है कि सांसारिक भौतिक सत्य तथा तथ्य तो संसार में सब के लिए समान ही होते हैं पर उनको देखने की दृष्टि हर भाषा भाषी-समाज की अपनी विशिष्ट होती है।
संसार का हर भाषा-भाषी भौतिक सत्य को समान रूप में ग्रहण करेगा यह आवश्यक नहीं है। यही कारण है कि एक ही भौतिक सत्य अलग-अलग भाषाओं में अलग अलग ढंग से व्यक्त किया जाता है।
उदाहरण के लिए विभिन्न भाषाओं में रिश्ते-नाते की शब्दावली को विभिन्न ढंग से व्यक्त किया जाता है। हिंदी में हमें विभिन्न रिश्ते-नातों के लिए जैसे चाचा, मामा, फूफा, ताऊ, मौसा, मौसी, मामी, चाची, ताई, बुआ आदि शब्द मिलते हैं। लेकिन अंग्रेजी भाषा में इन सभी रिश्ते-नातों के लिए दो शब्दों- “अंकल” तथा “आंटी” से काम चला लिया जाता है। उनके यहाँ चाचा, ताऊ, मामा, मौसा, आदि के लिए अलग-अलग शब्द नहीं है।
अलग शब्द न होने का यह अर्थ नहीं है कि अंग्रेजी भाषा-भाषी समाज के लोग इन संबंधों में अंतर करके नहीं चलते। भौतिक सत्ता या भौतिक संबंधों के धरातल पर तो ये लोग भी इन नाते-रिश्तों में अंतर करके चलते हैं और इनको अपने-अपने ढंग से भाषा में व्यक्त भी करते हैं। जैसे मामा के लिए Mother’s brother, Maternal Uncle तथा चाचा के लिए Father’s brother, Paternal Uncle आदि परन्तु भाषिक अभिव्यक्ति के स्तर पर उनके यहाँ अलग-अलग शब्द नहीं है।
इस प्रकार यदि हम यह तथ्य स्वीकार कर लेते हैं कि भौतिक जगत को देखने की हर भाषा की अपनी अलग दृष्टि होती है तो अनुवाद करते समय एक सवाल खड़ा हो जाता है।
अनुवाद के संदर्भ में एक बात बराबर कही जाती रही है कि “अनुवाद में स्रोत भाषा के पाठ में व्यक्त अर्थ को लक्ष्य भाषा पाठ में “अन्तरित” (transfer) किया जाता है” और यदि हम यह मान कर चलते हैं कि भौतिक तथ्यों को देखने की दृष्टि हर भाषा की अलग होती है तो यह मानना होगा कि एक भाषा में व्यक्त अर्थ यथावत् रूप में दूसरी भाषा में अंतरित हो ही नहीं सकता। जब भी अनुवादक एक भाषा के अर्थ को दूसरी भाषा में अंतरित करने का प्रयास करेगा, उसमें लक्ष्य भाषा की दृष्टि के अनुरूप कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य आ जाएगा या दूसरे शब्दों में “अर्थ” का रूपान्तरण हो जाएगा।
परन्तु अनुवाद तो “समतुल्यता” के सिद्धांत को लेकर चलता हैं। वहाँ अर्थ के रूपान्तरण की बात स्वीकार नहीं की जा सकती। अतः विद्वान यह मानने लगे हैं कि अनुवाद में अर्थ का अंतरण नहीं होता बल्कि अर्थ का प्रतिस्थापन (substitution) किया जाता है।
अतः भाषा का सापेक्षतावादी सिद्धांत यही मानकर चलता है कि “अनुवाद प्रक्रिया में स्रोत भाषा के पाठ के भाषिक अभिलक्षणों का लक्ष्य भाषा के पाठ में अंतरण नहीं किया जाता वरन् प्रयोजन और प्रकार्य के आधार स्रोत भाषा के अभिलक्षणों को लक्ष्य भाषा के अभिलक्षणों द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है।
इसीलिए मुहावरे, लोकोक्तियों सांस्कृतिक शब्दों एवं सामाजिक अभिव्यक्तियों आदि के अनुवाद में अंतरण प्रक्रिया की अपेक्षा प्रतिस्थापन प्रक्रिया अधिक कारगर सिद्ध होती।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अनुवाद का पाठ धर्मी आयाम अनुवाद के उस स्वरूप को प्रतिष्ठित करता है जहाँ – अनुवादक ऐसा अनूदित पाठ प्रस्तुत करे जिसकी प्रकृति स्रोत भाषा के पाठ की प्रकृति से मेल खाती हो। जिस तरह की संरचनाएँ मूल पाठ में आई हैं वैसी ही संरचनाएँ अनुवाद में भी प्रस्तुत की जाएँ।
प्रभाव धर्मी आयाम
जहाँ तक तकनीकी तथा सूचना प्रधान साहित्यिक पाठों के अनुवाद का प्रश्न है, पाठ धर्मी अनुवाद वहाँ कारगर हो जाता है, परन्तु जब बात सर्जनात्मक साहित्य के अनुवाद की आती है तब केवल पाठ धर्मी अनुवाद से काम नहीं चल पाता।
उदाहरण के लिए कविता के अनुवाद में अनुवादक से यह अपेक्षा करना कि वह अनूदित पाठ में वैसी ही संरचनाएँ, छन्द, लय आदि ले आए यह उचित नहीं है।
‘रामचरितमानस’ की चौपाइयों का किसी अन्य भाषा में चौपाई जैसे छंद में अनुवाद करें यह संभव नहीं होता। अतः अनुवाद का प्रभाव धर्मी आयाम इस मान्यता को लेकर चलता है (विशेष कर सर्जनात्मक साहित्य के अनुवाद में) कि अनुवादक मूल भाषा पाठ की संरचना तथा बुनावट की अपेक्षा उस प्रभाव को पकडने की कोशिश करे जो स्रोत भाषा के पाठकों पर पड़ा है। फिर अपने अनूदित पाठ के माध्यम से लक्ष्य भाषा के पाठकों के मन में भी वही प्रभाव उत्पन्न करने का प्रयास करे।
उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति प्रेमचन्द की किसी कहानी या उपन्यास का अनुवाद किसी विदेशी भाषा में करता है तो अनुवाद में यह ध्यान देने की अधिक आवश्यकता नहीं है कि वह प्रेमचन्द की कहानी की संरचना तथा बुनावट को ध्यान में रखकर अनुवाद करे। बल्कि, अनुवादक को यह देखना होता है कि प्रेमचंद की उस कहानी का हिंदी भाषा-भाषी पाठकों के मन पर क्या प्रभाव पड़ा है? उसका अनुवाद ऐसा होना चाहिए कि उस विदेशी भाषा के पाठकों के मन में भी अनूदित कृति के माध्यम से वही प्रभाव पड़े जो हिंदी के पाठक वर्ग के मन पर पड़ा है।
अतः अन्य सर्जनात्मक साहित्यिक विधाओं में भी विशेष रूप से कविता के अनुवाद में तो प्रभाव धर्मी अनुवाद का ही आश्रय लेना होता है। यहाँ यह मानकर चला जाता है कि “पाठ” तो पाठक तथा लेखक के बीच संबंध स्थापित करने वाला एक ऐसा उपकरण है जिसके आधार पर यह पता लगाया जाता है कि पाठक के मन पर क्या प्रभाव पड़ा है।
अनुवाद के प्रमुख लक्षण
उपर्युक्त विद्वानों द्वारा दिए गए परिभाषाओं के आधार पर निष्कर्ष रूप में हम अनुवाद के निम्नलिखित प्रमुख लक्षण बता सकते हैं –
- अनुवाद दो भिन्न भाषाओं के बीच होने वाली एक भाषिक प्रक्रिया है।
- जिस भाषा से अनुवाद किया जाता है उसे स्रोत भाषा तथा उसके पाठ को स्रोत भाषा पाठ या मूल पाठ तथा जिस भाषा में अनुवाद किया जाता है उसे लक्ष्य भाषा एवं उसके पाठ को लक्ष्य भाषा पाठ कहा जाता है।
- लक्ष्य भाषा पाठ को ही अनूदित-पाठ भी कहा जाता है।
- स्रोत भाषा पाठ या मूल पाठ के जिस अर्थ का अनूदित पाठ में अंतरण या प्रतिस्थापन किया जाता है वह अर्थ ही अनुवाद का संदेश कहलाता है।
- स्रोत भाषा पाठ तथा अनूदित पाठ दोनों के बीच एक संबंध स्थापित हो जाता है और इस संबंध का मुख्य आधार यह संदेश ही होता है, अर्थात् दोनों ही पाठ उसी संदेश या अर्थ को व्यक्त करने के कारण समानार्थी होते हैं।
- अनुवाद मूल भाषा पाठ के जिस अर्थ को लक्ष्य भाषा में अंतरित करता है उस का क्षेत्र व्यापक होता है। यह अर्थ केवल संरचना के अर्थ तक ही सीमित नहीं होता। इस के क्षेत्र में संरचनार्थ, संदर्भार्थ तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों से संबंधित सभी अर्थ आ जाते हैं।
- अनुवादक का मुख्य ध्येय यही है कि वह मूल पाठ के भाव को संप्रेषित करने का पूरा ध्यान रखे।
निष्कर्ष
आज सारे विश्व में अनुवाद की आवश्यकता का अनुभव किसी न किसी रूप में अवश्य किया जाता है । विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों के बीच संप्रेषण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण घटक बन कर अनुवाद हमारे सामने ‘आता है।
आज संसार के किसी भी देश में कोई नई खोज होती है, कोई नया विचार सामने आता है तो हर व्यक्ति यही चाहता है कि उसकी सूचना जल्दी से जल्दी वह अपनी भाषा के माध्यम से अपने देशवासियों को दे सके।
जिस प्रकार प्रत्येक भाषा संरचना अपने में विशिष्ट होती है उसी तरह से उस भाषा का सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ भी विशिष्ट होता है। अनुवाद दो भाषाओं को ही निकट लाने का कार्य नहीं करता बल्कि दो भिन्न संस्कृतियों को भी परस्पर निकट ले आता है।
अनुवाद के माध्यम से हम विश्व साहित्य का परिचय प्राप्त कर सकते हैं। उदाहरण के लिए पंचतंत्र की कहानियों का अनुवाद विश्व की अनके भाषाओं में हुआ। इन कहानियों ने आगे चल कर एशिया तथा यूरोप के कथा साहित्य को प्रभावित किया ।
कालिदास के “अभिज्ञान शाकुन्तलम्” नाटक का अनुवाद भी विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ है और इस नाटक से वहाँ के अनेक नाटककार अपने-अपने ढंग से प्रभावित हुए हैं।
इसी प्रकार द्वितीय विश्व युद्ध के आस-पास हिंदी के एक प्रसिद्ध रूसी विद्वान वारान्निकोव ने “रामचरितमानस” का अनुवाद रूसी भाषा में करके एक अद्भुत कार्य ही नहीं किया बल्कि उस अनुवाद ने अन्य रूसी लोगों में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य, संस्कृति, धर्म, दर्शन आदि के अध्ययन के प्रति रुचि पैदा कर दी।
इस शताब्दी में आकर तो अनुवाद हमारी अनिवार्यता ही बन गया है। विभिन्न राष्ट्रों के बीच नित्य नए-नए तरह के राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक संबंध स्थापित हो रहे हैं और नित्य विभिन्न प्रकार के दस्तावेज संबंध-पत्र दोनों देशों की भाषाओं में तैयार किए जाते हैं। यह सब कार्य अनुवाद के ही माध्यम से सुलभ हो पाता है।
यू० एन० ओ० में जो भी वक्तव्य पढ़ा जाता है उसका अनुवाद तुरंत ही विश्व की अनेक भाषाओं में उपलब्ध कराया जाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि आज विश्व मंच पर अनुवाद की कितनी महत्ता है हम स्वयं अनुभव कर सकते हैं।
भारत तो बहुभाषा-भाषी देश है। यहाँ अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। इन विभिन्न भाषा-भाषी भारतीयों के बीच भावात्मक एकता बनाए रखने के लिए तो अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है ही, साथ ही शिक्षा, कानून, प्रशासन, चिकित्सा, वाणिज्य एवं व्यवसाय, कृषि, पर्यटन, दूर संचार आदि के क्षेत्रों में भी सभी भारतीयों को एक सूत्र में बाँधे रखने के कार्य में अनुवाद की बहुत बड़ी भूमिका रही है।
गोपीनाथन के शब्दों में हम कह सकते हैं कि “अनुवाद एक ऐसा सेतु बंधन का कार्य है जिसके बिना विश्व संस्कृति का विकास संभव नहीं है। अनुवाद के द्वारा हम मानव के इस विश्व कुटुम्ब में संपूर्ण एकता एवं समझदारी की भावना विकसित कर सकते हैं, मैत्री एवं भाईचारे को विकसित कर सकते हैं और गुटबंदी, संकुचित प्रान्तीयतावाद आदि से मुक्त होकर मानवीय एकता के मूल बिंदु तक पहुँच सकते हैं।”
चूँकि अनुवादक दो अलग-अलग भाषा समाज के लोगों के बीच मध्यस्थता का कार्य करता है अतः अनुवाद का महत्व स्वतः ही सिद्ध हो जाता है। आज संप्रेषण-व्यापार के विभिन्न संदर्भों के बीच अनुवाद एक महत्वपूर्ण घटक बनकर हमारे सामने आ गया है। संसार का हर छोटा बड़ा देश दूसरे देश से जुड़ना चाहता है और इस जुड़ाव में अनुवाद की विशिष्ट भूमिका दिखाई देती है।
इसीलिए “यह कहा जा सकता है कि अनुवाद अपने प्रयोजन में बहुमुखी और बहुआयामी बन चुका है।”
पुराने समय में लोग प्रायः धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद करते थे और प्रायः वैयक्तिक रुचि ही अनुवाद का आधार होती थी। लेकिन आज अनुवाद मात्र वैयक्तिक रुचि तक ही सीमित नहीं रह गया है। आज अनुवाद व्यावसायिक सामाजिक आवश्यकता बन गया है। और उसका स्वरूप संगठित व्यवसाय के रूप में उभर कर सामने आया है।
आधुनिक युग में तो अनुवाद की आवश्यकता वैयक्तिक रुचि पर आधारित न होकर सामाजिक – राजनैतिक – आर्थिक आवश्यकताओं पर आधारित है। इन्हीं आवश्यकताओं के कारण अब अनुवाद व्यक्ति परिधि से निकल कर समाष्टि की परिधि में आ गया है। आज के समाज में अनुवाद की आवश्यकता इतनी अधिक बढ़ गई है कि अनुवाद का कार्य अब संगठित रूप में किया जाने लगा है अतः निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि अनुवाद का कार्य भी आज अन्य व्यवसायों की ही भाँति एक व्यवसाय बन गया है।

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