तुलसीदास का प्रादुर्भाव ऐसे समय में हुआ जब धर्म, समाज, राजनीति, आदि सभी क्षेत्रों में विषमता, विभेद एवं वैमनस्य व्याप्त था। शैवों और वैष्णवों में पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष बढ़ता जा रहा था। तुलसीदास से पूर्व सन्त कवियों ने सारे भारत में भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रयास किया, किन्तु तुलसीदास ने इस विषमता को दूर करने के लिए समन्वय का अनूठा प्रयास किया।
उनके इस योगदान की प्रशंसा करते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें बुद्ध देव के बाद भारत का सबसे बड़ा लोकनायक मानते हुए कहा है– “लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय कर सके। तुलसी का सम्पूर्ण काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है।”
तुलसीदास ने समाज, धर्म, आचार-व्यवहार एवं भक्ति के क्षेत्र में व्याप्त विषमताओं को दूर कर उनमें समन्वय लाने का अद्भुत प्रयास किया। समन्वय का अभिप्राय है- विरोध दूर करके, पारस्परिक भेदभाव को मिटाकर समरसता उत्पन्न करना।
तुलसीदास के काव्य में विविध क्षेत्रों में समन्वय का प्रयास किया गया है, जिसका विवेचन निम्न शीर्षकों में किया जा सकता है :
शैव और वैष्णव का समन्वय
भारतीय विचारधारा में त्रिदेव की परिकल्पना ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के रूप में की गई है; जिसमें ब्रह्मा सृष्टि को उत्पन्न करते हैं, विष्णु उसका पालन करते हैं जबकि शिव उसका संहार करते हैं।
विष्णु के भक्त वैष्णव तथा शिव के भक्त शैव कहलाते हैं। कालान्तर में वैष्णव विष्णु को सृष्टि का उत्पादक, पालनहार एवं संहारक मानने लगे तो शैवों ने इन तीनों के लिए शिव को उत्तरदायी मानते हुए उन्हें सर्वशक्तिमान मानकर महिमा मण्डित कर दिया।
धीरे-धीरे शैवों और वैष्णवों का यह वैमनस्य इतना बढ़ा कि वे एक-दूसरे के आराध्य देवता को हेय और तुच्छ बताने लगे।
तुलसीदास के समय में यह विद्वेष अपने चरम पर था। अतः उन्होंने ‘रामचरितमानस’ में शिव को विष्णु के अवतार राम का उपासक दिखलाकर शिव से यह कहलवाया :
सोइ मम इष्ट देव रघुवीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।
तो दूसरी ओर ‘राम’ भगवान शिव को अपना आराध्य मानकर ‘रामेश्वरम’ में उनकी स्थापना करते हैं। यही नहीं अपितु वे यह भी कहते हैं :
सिव द्रोही मम दास कहावा। सो नर मोहि सपनेहूं नहिं भावा।
राम को शिव का अनन्य भक्त सिद्ध करते हुए तुलसीदास ने शैव और वैष्णव मतों का अनूठा समन्वय किया है। तुलसीदास ने राम और शिव में अभेद मानते हुए कहा है:
“हरिहर पद रति मति न कुतरकी”
अर्थात् जो राम (विष्णु) और शिव के चरणों में प्रेम करते हैं तथा जिनकी बुद्धि कुतर्क नहीं करती, वे ही ईश्वर को प्रिय हैं। जो राम से प्रेम करते हैं, किन्तु शंकर से द्रोह करते हैं ऐसे मूर्ख को कल्पभर नरक में वास करना पड़ता है:
संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास।
ते नर करहिं कलप भरि घोर नरक महं वास ।।
अतः तुलसीदास का मत है कि केवल शंकर या केवल राम की भक्ति करने वाला तथा दूसरे से द्रोह करने वाला सच्चा ईश्वर भक्त नहीं है। उसे किसी के प्रति द्रोह नहीं करना चाहिए। तुलसीदास ने इस प्रकार शैवों और वैष्णवों में समन्वय स्थापित करने का भरसक प्रयास किया।
सगुण और निर्गुण का समन्वय
तुलसीदास से पहले भक्तों में इस बात पर भी संघर्ष चल रहा था कि ईश्वर सगुण है या निर्गुण। सूरदास ने ‘भ्रमरगीत’ प्रसंग में ईश्वर को सगुण साकार मानते हुए गोपियों द्वारा निर्गुण का खण्डन करवाया और सगुण की महत्ता प्रतिपादित की, किन्तु तुलसीदास ने सगुण और निर्गुण के प्रश्न पर व्याप्त विद्वेष एवं वैमनस्य को दूर करते हुए उन दोनों में समन्वय करने का प्रयास किया।
वे कहते हैं कि यद्यपि ब्रह्म निर्गुण, निराकार, अनघ, अद्वैत, अव्यक्त, अविरल, अनामय, अमल है तथापि वह दयालु, दीनबन्धु, करुणावत्सल, भक्तवत्सल है तथा भक्तों पर कृपा करने के लिए, धर्म की संस्थापना के लिए सगुण रूप में प्रकट होता है। भक्तों के प्रेम के वशीभूत होकर वही निर्गुण ब्रह्म सगुण साकार हो जाता है:
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।।
तुलसीदास कहते हैं कि जैसे जल, बर्फ और ओले बाहर से अलग-अलग दिखकर भी मूलतः एक ही तत्व ‘जल’ के विविध रूप हैं, उसी प्रकार एक ही ब्रह्म कभी निर्गुण तो कभी सगुण रूप में दिखाई देता है। इस प्रकार तुलसीदास ने अपने साहित्य में निर्गुण और सगुण ईश्वर में समन्वय स्थापित करने का स्तुत्य प्रयास किया।
ज्ञान और भक्ति का समन्वय
तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में ज्ञान और भक्ति का समन्वय भी किया है, जबकि उनसे पूर्व यह विवाद चलता था कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है- ज्ञान मार्ग या भक्ति मार्ग। ज्ञानीजन ज्ञान मार्ग को तो भक्तजन भक्ति मार्ग को श्रेष्ठ प्रतिपादित करते थे, किन्तु तुलसीदास ने ज्ञान की कठिनता का उल्लेख करते हुए भी भक्ति के लिए ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित की और इस प्रकार इन दोनों का समन्वय किया।
वे कहते हैं कि ज्ञान मार्ग तलवार की धार के समान पैना है:
ग्यान पंथ कृपान के धारा।
जबकि भक्ति मार्ग सरल, सहज एवं सुगम है तथापि भक्ति और ज्ञान दोनों ही सांसारिक कष्टों से मुक्ति दिलाने में समर्थ हैं :
भगतिहिं ग्यानहिं नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव सम्भव खेदा।।
उत्तरकाण्ड में निरूपित ज्ञान-भक्ति प्रसंग में तुलसीदास ने ‘ज्ञान’ को ‘दीपक’ तथा ‘भक्ति’ को ‘मणि’ माना है और यह बताया है कि ज्ञान का दीपक बड़ी कठिनाई से प्रज्वलित होता है जो मोह-मद, आदि शलभों को जलाकर राख कर देता है, परन्तु विषय रूपी वायु के चलने पर बुझ जाता है जबकि भक्ति रूपी मणि निरन्तर देदीप्यमान रहती है, विषय-विकार रूपी वायु उसे बुझा नहीं पाती।

तुलसीदास ने भले ही भक्ति मार्ग की सरलता एवं श्रेष्ठता प्रतिपादित की हो, किन्तु वे सूरदास की भांति ज्ञान की न तो खिल्ली उड़ाते हैं और न उसे व्यर्थ बताते हैं। उनके अनुसार भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त होकर शोभा पाती है :
कहहिं भगति भगवंत के संजुत ग्यान-विराग।
वे यह भी कहते है कि वेदों में जिस भक्ति का प्रतिपादन किया गया है वह भी ज्ञान एवं वैराग्य से संयुक्त होकर शोभा पाती है:
श्रुति सम्मत हरि-भगति पथ संजुत विरति विवेक ।।
इस विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि तुलसीदास ने सर्वत्र ज्ञान-भक्ति का समन्वय किया है।
दार्शनिक क्षेत्र में समन्वय
तुलसीदास से पूर्व सभी विचारकों ने शंकर द्वारा प्रतिपादित ‘अद्वैतवाद’ का खण्डन किया। रामानुजाचार्य ने ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ का, मध्वाचार्य ने ‘द्वैतवाद’ का, विष्णु स्वामी ने ‘शुद्धाद्वैतवाद’ का तथा निम्बार्काचार्य ने ‘द्वैताद्वैतवाद’ का प्रचार करके अद्वैतवादी विचारधारा का खण्डन किया, किन्तु तुलसीदास ने अद्वैतवाद एवं विशिष्टाद्वैतवाद में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया।
‘विनय पत्रिका’ में तुलसीदास ने ‘शंकराचार्य’ के ‘अद्वैतवाद’ के अनुरूप ही ब्रह्म को अज, सर्वज्ञ, सत्य माना तथा जीव और जगत को सोपाधिक एवं मिथ्या निरूपित करते हुए अद्वैतवादी विचारधारा का समर्थन किया।
यही नहीं अपितु उन्होंने ‘माया’ का स्वरूप भी ‘शंकर’ के अनुसार ही निरूपित किया तथापि वे रामानुजाचार्य द्वारा प्रवर्तित ‘विशिष्टाद्वैतवाद’ के अनुयायी थे तथा इसी कारण जीव को ईश्वर का अंश मानकर ईश्वर की ही भांति उसे चेतन, अमल एवं अविनाशी मानते हैं :
ईस्वर अंस जीव अविनासी। चेतन, अमल, सहज सुख रासी ।।
सो मायावस भयेहु गोसांई। बंधेहु कीर मरकट की नांई।
संसार को भी उन्होंने शून्य में निर्मित चित्र मानकर विशिष्टाद्वैतवादी विचारधारा का समर्थन किया। वे संसार के विषय में अपना मत व्यक्त करते हुए कहते हैं:
कोउ कह सत्य झूठ कहि कोऊ जुगल प्रबल कोउ मानैं।
तुलसिदास परिहरै तीनि भ्रम सो आपन पहिचानैं।।
वस्तुतः दार्शनिक क्षेत्र में व्याप्त वितण्डावाद को दूर कर तुलसीदास सभी विचारधाराओं का समन्वय करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं।
राजा और प्रजा का समन्वय
तुलसीदास का प्रादुर्भाव जिस समय हुआ उस समय देश में मुसलमानों का शासन था। राजा और प्रजा के बीच गहरी खाई बन रही थी। राजा अपने कर्तव्य का भली-भांति पालन नहीं करता था तथा प्रजा अनेक कष्टों को भोग रही थी।
तुलसीदास ने इस स्थिति का निरूपण ‘रामचरितमानस’ के ‘उत्तरकाण्ड’ में ‘कलियुग वर्णन‘ के माध्यम से किया है। रामराज्य की परिकल्पना करते हुए उन्होंने आदर्श शासन व्यवस्था का एक प्रारूप भी प्रस्तुत किया है। शासक के कर्तव्यों एवं दायित्वों का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं:
मुखिया मुख सो चाहिए खान-पान कौं एक।
पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित विवेक।।
दूसरी ओर सेवक हाथ, पैर और आंखों की तरह होने चाहिए :
सेवक कर पद नयन से, मुख सो साहिबु होय।
इस प्रकार रामचरितमानस में तुलसीदास ने एक ओर प्रजा के कर्तव्य का वर्णन किया तो दूसरी ओर शासक को उसके दायित्व का बोध कराते हुए राजा-प्रजा में समन्वय का प्रयास किया ।
पारिवारिक क्षेत्र में समन्वय
तुलसीदास ने धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में ही नहीं अपितु पारिवारिक क्षेत्र में भी समन्वय का अनूठा प्रयास किया। पारिवारिक एवं नैतिक मूल्यों के पक्षधर तुलसीदास मर्यादावादी कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनका रामचरितमानस व्यवहार का दर्पण है।
उनके पात्र परिवार के आदर्श को प्रस्तुत करते हैं। राम के रूप में उन्होंने एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श मित्र का स्वरूप प्रस्तुत किया।

1. निर्गुण और सगुण का समन्वय
2. शैव और वैष्णव का समन्वय
3. ज्ञान और भक्ति का समन्वय
4. राजा और प्रजा (शासक-शासित) का समन्वय
5. सामाजिक और वर्ग समन्वय
6. पारिवारिक संबंधों का समन्वय
7. भाषा और शैली का समन्वय
8. भोग और त्याग (गार्हस्थ और वैराग्य) का समन्वय
भरत भ्रातृत्व भावना के आदर्श हैं तो लक्ष्मण अग्रज के प्रति सेवा भाव के। हनुमान सेवक धर्म के आदर्श हैं तो विभीषण सच्चे भक्त के और सुग्रीव मैत्री धर्म के आदर्श हैं।
तुलसीदास ने उन जीवन मूल्यों को रामचरितमानस में प्रस्तुत किया है जो भारतीय संस्कृति का पोषण करने वाले हैं तथा उसके उदात्त स्वरूप को प्रस्तुत करते हैं। यहां राज्य पाने के लिए संघर्ष नहीं है अपितु इस बात के लिए राम और भरत में मतभेद है कि राम अयोध्या का राजा बनना नहीं चाहते, भरत को राज्य ग्रहण करने के लिए कहते हैं तो भरत उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं। अन्ततः चित्रकूट सभा में यह निर्णय हुआ कि अयोध्या के राजा राम ही होंगे, किन्तु वनवास की अवधि में भरत राजा के प्रतिनिधि बनकर अयोध्या की देखभाल करेंगे।
पिता के वचन का पालन करते हुए चौदह वर्षों तक वनवास में रहकर राम ने आदर्श पुत्र होने का जो उदाहरण प्रस्तुत किया वैसा विश्व में अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं पड़ता।
साहित्यिक क्षेत्र में समन्वय
तुलसीदास ने अपने समय में प्रचलित दोनों काव्य भाषाओं अवधी और ब्रज में काव्य रचना करके समन्वय का अनूठा प्रयास किया।
उन्होंने रामचरितमानस, बरवै रामायण, पार्वती मंगल, जानकी मंगल, रामलला नहछू की रचना शुद्ध साहित्यिक परिनिष्ठित अवधी भाषा में की तो विनय पत्रिका, कवितावली, दोहावली, गीतावली में ब्रजभाषा का प्रयोग किया।
अपने समय में प्रचलित सभी काव्य-शैलियों का प्रयोग भी तुलसीदास ने किया है।
रामचरितमानस दोहा-चौपाई शैली में लिखा गया महाकाव्य है तो विनयपत्रिका की रचना पद शैली में हुई है। कवितावली कवित्त-सवैया शैली में, गीतावली पद शैली में, दोहावली दोहा शैली में तो बरवै रामायण बरवै शैली में रची गई कृतियां हैं।
‘रामचरितमानस’ एवं ‘विनयपत्रिका’ की स्तुतियों में कवि ने संस्कृत का प्रयोग करते हुए भाषा एवं संस्कृत का समन्वय किया। स्तोत्रों का प्रयोग स्तुतियों में करते हुए उन्होंने कथा-शैली एवं स्तोत्र शैली का समन्वय किया। इस विवेचन से स्पष्ट है कि तुलसीदास ने रामचरितमानस में साहित्यिक क्षेत्र में समन्वय का अनूठा प्रयास किया।
नर और नारायण का समन्वय
तुलसीदास ने ‘राम’ को दशरथपुत्र के रूप में स्वीकार करते हुए परब्रह्म परमात्मा के रूप में भी स्वीकार किया है। धर्म की स्थापना एवं असुरों के विनाश के लिए भगवान विष्णु ही राम के रूप में प्रकट हुए हैं :
भए प्रकट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप विचारी।।
वे राम भले ही ‘नरलीला’ कर रहे हो, किन्तु अन्ततः वे अखण्ड, अनन्त, अज, अनवद्य, अरूप एवं अचल ब्रह्म है। भक्तों के हित के लिए वे दीनबन्धु ही असुर संहार करने हेतु पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं :
बिप्र धेनु, सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुण गो पार।।
राम मन, वाणी और बुद्धि से ‘अतर्क्य’ हैं जो धर्म की रक्षा के लिए तथा असुरों का संहार करने के लिए अवतार लेते हैं और सज्जनों का दुःख दूर करते हैं :
राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।।
जब जब होइ धर्म के हानी। बाढ़हिं असुर अधम अभिमानी।।
करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं विप्र, धेनु सुर धरनी॥
तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।
निष्कर्ष
गोस्वामी तुलसीदास की समन्वय भावना को और अधिक विस्तार से समझने के लिए, यहाँ मुख्य आठ बिंदु दिए गए हैं:
1. निर्गुण और सगुण का समन्वय
• तुलसीदास ने निराकार (निर्गुण) और साकार (सगुण) भक्ति के बीच के विवाद को समाप्त किया।
• उनका मानना था कि दोनों एक ही ईश्वर के दो रूप हैं; जैसे पानी और पाला (बर्फ) में कोई अंतर नहीं होता।
2. शैव और वैष्णव का समन्वय
• मध्यकाल में शिव के भक्तों (शैव) और विष्णु के भक्तों (वैष्णव) में गहरा मतभेद था।
• तुलसीदास ने राम से शिव की पूजा करवाई (रामेश्वरम में) और शिव के मुख से राम नाम का जप करवाकर दोनों संप्रदायों को एक सूत्र में बांधा।
3. ज्ञान और भक्ति का समन्वय
• ज्ञान मार्ग को कठिन और भक्ति मार्ग को सुलभ बताते हुए भी उन्होंने दोनों को एक-दूसरे का पूरक माना।
• उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची भक्ति के बिना सच्चा ज्ञान नहीं मिल सकता और बिना ज्ञान के भक्ति अंधी होती है।
4. राजा और प्रजा (शासक-शासित) का समन्वय
• उन्होंने ‘रामराज्य’ की परिकल्पना के माध्यम से राजा और प्रजा के आदर्श संबंधों को दिखाया।
• इसमें राजा का कर्तव्य प्रजा की भलाई करना है, और प्रजा का कर्तव्य राजा के न्यायपूर्ण नियमों का पालन करना है।
5. सामाजिक और वर्ग समन्वय
• उन्होंने ऊंच-नीच और जाति-पाति के भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया।
• श्रीराम द्वारा केवट को गले लगाना, शबरी के जूठे बेर खाना और निषादराज को मित्र मानना इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।
6. पारिवारिक संबंधों का समन्वय
• उन्होंने समाज की सबसे छोटी इकाई ‘परिवार’ में आदर्श संतुलन स्थापित किया।
• पति-पत्नी (राम-सीता), भाई-भाई (राम-लक्ष्मण-भरत) और माता-पुत्र के बीच त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा दिखाकर एक आदर्श पारिवारिक ढांचा तैयार किया।
7. भाषा और शैली का समन्वय
• तुलसीदास ने संस्कृत के क्लिष्ट (कठिन) ज्ञान को लोकभाषा (अवधी और ब्रज) के माध्यम से आम जनता तक पहुँचाया।
• उन्होंने उस समय की सभी काव्य शैलियों (जैसे दोहा, चौपाई, पद और सवैया) का अपनी रचनाओं में सुंदर मिश्रण किया।
8. भोग और त्याग (गार्हस्थ और वैराग्य) का समन्वय
• उन्होंने न तो संसार को पूरी तरह छोड़ने (वैराग्य) को सही बताया और न ही संसार में पूरी तरह डूबने (भोग) को।
• उन्होंने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी अनासक्त भाव (बिना मोह के) से ईश्वर भक्ति करने का मार्ग दिखाया।
निष्कर्ष यह है कि तुलसीदास अपने समय के महान समन्वयवादी थे। उन्होंने जीवन और जगत के हर क्षेत्र में समन्वय करते हुए सबको साथ लेकर चलने का स्तुत्य प्रयास किया।
खण्डन-मण्डन की प्रवृत्ति से परे रहकर, अक्खड़ता को नकारकर तुलसीदास ने समन्वयवादी दृष्टि का परिचय दिया तथा समाज में व्याप्त कटुता, विषमता, विद्वेष, वैमनस्य को दूर कर पारस्परिक स्नेह, सहानुभूति, सौहार्द, समता का वातावरण बनाया। वे सच्चे अर्थों में महान समाज सुधारक, समन्वयकर्ता एवं लोकनायक थे।

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