हिंदी नवगीत का उद्भव और विकास | Hindi Navgeet Ka Udbhav Aur Vikas

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समकालीन हिंदी कविता में नवगीत की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है। ‘नई कविता’, ‘नई कहानी’ और ‘नई आलोचना’ की तर्ज पर ‘नवगीत’ का उदय 1948-50 ई. के आसपास हुआ। इसे नयागीत, प्रगीत, अगीत, कबीरगीत, लोकगीत इत्यादि विविधि नामों से भी अभिहित किया गया है। इस लेख में हम Hindi Navgeet Ka Udbhav Aur Vikas का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।

नवगीत परंपरा की घोषणा वीरेंद्र मिश्र (1957) ने की। ‘नवगीत’ की संज्ञा सबसे पहले संभवतः राजेन्द्र प्रसाद सिंह द्वारा दी गई। 5 फरवरी, 1958 को प्रकाशित ‘गीतांगिनी’ का संपादन करते हुए इन्होंने अपने संपादकीय लेख में ‘नवगीत’ के विषय में विस्तार से चर्चा की।

इस प्रकार, नवगीत 1958 ई० तक साहित्य में पूरी तरह अपना पैर पसार लिया था और प्रतिष्ठित हो गया था।

1959 ई. में ‘तीसरा सप्तक’ के प्रकाशन के साथ ‘नवगीत विधा‘ की प्रतिष्ठापना हुई। यह पूर्ववर्ती गीतिकाव्य से भिन्न एवं एक विशिष्ट विधा के रूप में विकसित हुई।

1964 ई. में नवगीत का एक नया संकलन (कविता-1964) प्रकाशित हुआ। नये गीतकारों ने गीत को भावुकता, तुकबंदी, रूढ़ियों तथा प्रचलित शब्दावली के दायरे से निकालकर उसे एक नया रंग, नयी भंगिमा, नवीन कथ्य एवं नये शिल्प का विधान किया।

नवगीत में गीतिकाव्य के तत्त्वों – भावात्मकता, अनुभूति की सहजता लयात्मकता, वैयक्तिकता, एकान्विति के साथ-साथ निम्न विशेषताएँ मिलती हैं-

  • 1. बौद्धिकता का अतिरेक
  • 2. असामाजिक भावनाओं की अभिव्यक्ति
  • 3. काम-कुंठाओं का अतिशय वर्णन
  • 4. आधुनिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक एवं नवीन युगबोध
  •  5. नवीन बिंबयोजना
  •  6. भाषा की सरलता इत्यादि।

नवगीत की प्रमुख परिभाषाएँ

नवगीत की कुछ प्रमुख परिभाषाएं निम्नानुसार हैं :

डॉ० ओमप्रभाकर

नवगीत आज के सम्पूर्ण जीवनबोध की कविता है। वह न तो केवल लोकगीतात्मक रचना है। और न केवल नगर बोध की कविता। इसके शिल्प और कथ्य का आस्वाद एक कठोर और खुरदरे हाथ के स्नेहमय स्पर्श का आस्वाद है।

डॉ० इंदीवर पाण्डेय

पारम्परिक गीतों से भिन्न नवगीत आधुनिक हिंदी-काव्य की वह विधा है, जो युगबोध सम्पन्न जीवन-मूल्यों की भोगी और झेली हुई अनुभूतियों को उसके भारतीय परिवेश में आधुनिक जीवन-दृष्टि एवं लयात्मक संवेदन प्रदान करती है।

राजेंद्र प्रसाद सिंह

नयी कविता के प्रगीत का पूरक बनकर नवगीत के निकाय ने जन्म लिया। नवगीत के 5 विकसनशील तत्त्व हैं – जीवनदर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तिबोध, प्रीतितत्व और परिसंचय। ये 5 तत्त्व नवगीत का स्वरूप रचने में सचेष्ट है।

डॉ० उमा शंकर तिवारी

नवगीत कई मायने में नई कविता के आगे की विधा है, जो नये आयामों के द्वार खोलती हई आज के युग की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बन गई है। वह ‘पापुलर राइटिंग’ से परे कलात्मक होते हुए भी लोक सम्पृक्त कविता है।

‘नई कविता’, ‘नई कहानी’ और ‘नई आलोचना’ के समान ही ‘नवगीत’ का भी प्रादुर्भाव हुआ है। 1948-50 के मध्य नवगीत-लेखन की परंपरा प्रकाश में आई। आधुनिकता और वैज्ञानिक युगबोध सौंदर्य के दावेदार तथाकथित नवगीतकारों ने अपने गीतों को ‘नवगीत’, ‘नयागीत’, ‘अगीत’, ‘प्रगीत’, ‘लोकगीत’, ‘कबीरगीत’ आदि नामों से अभिहित किया। 1959 ई० में ‘तीसरा सप्तक’ के प्रकाशन के साथ ही नवगीत-विधा की पूर्ण स्थापना हुई।

इस संदर्भ में द्रष्टव्य है कि प्रयोगवादी ‘नई कविता’ नाम के अनुकरण पर हिंदी के कतिपय नवीन गीतकारों ने अपने गीतों को पूर्ववर्ती गीतिकाव्य से भिन्न और विशिष्ट सिद्ध करने के लिए उन्हें ‘नवगीत’ की संज्ञा प्रदान की थी।

नवगीत और नई कविता में यदि देखा जाए, तो कोई तात्त्विक भिन्नता नहीं है, सिवाय इसके कि नवगीत जहाँ छंदबद्ध रचना है, वहीं नई कविता मुक्त छंद या छंदमुक्त रचना।

जिस प्रकार आधुनिक भाव-बोध पर आधारित कविताओं को पारम्परिक कविताओं से भिन्न पहचान देने के लिए ‘नई कविता’ संज्ञा का इस्तेमाल किया गया, उसी प्रकार परम्परागत गीतों से भिन्न पहचान देने के लिए आधुनिक भावबोध पर आधरित गीतों को नवगीत कहा गया।

राजेंद्रप्रसाद सिंह, डॉ० शंभुनाथ सिंह, गिरिजाकुमार माथुर, वीरेंद्र मिश्र, त्रिलोचन शास्त्री, रवींद्र भ्रमर आदि ने ‘नवगीत’ की चर्चा आरंभ की और परिणामस्वरूप ‘कविता-1964′ नामक संकलन में ‘नवगीत‘ का नया संकलन सामने आया। कुछ दिनों तक नवगीत की काफी चर्चा होती रही और विभिन्न विद्वानों ने इसके इतिहास, विशिष्ट व्यक्तित्व, नवीन उपलब्धि और संभाव्यता पर प्रकाश डाला।

एक प्रकार से ‘नवगीत‘ को प्रयोगवादी ‘नई कविता‘ का पूरक स्वीकार किया गया; क्योंकि इन गीतकारों ने प्रतीक, अप्रस्तुतविधान, छंद और भाषा के नए रूपों को अपनाया था।

वस्तुतः, इस ‘नवगीत’ में गीतिकाव्य के विशिष्ट गुण- भावात्मकता, अनुभूति की सहजता, लयात्मकता और प्रेषणीयता – यथावत् रूप में स्वीकार किए गए हैं। भाषा में लोकभाषा की सहज भंगिमा और लोकगीतों की संगीतात्मकता को अपनाया गया।

‘नवगीत’ की एक बानगी (नमूना) द्रष्टव्य है-

आ गए बादरे !

केश बिखरे हुए, आँख अंजन-अँजी,

कंठ में दोलड़ा स्वर्ण-कंठी सजी।

दूबरी-दूबरी, झाँवरी-झाँवरी-

आ गए हैं धरा को लगाने गरे।

आ गए बादरे !

‘नवगीत‘ की कुछ उल्लेखनीय विशेषताएँ हैं-

  • (1) बौद्धिकता का अतिरेक,
  • (2) काम-कुंठाओं का अतिशय वर्णन,
  • (3) अनिश्चित जीवन-दृष्टि,
  • (4) असामाजिक भावनाओं की निराधार अभिव्यक्ति,
  • (5) नवीनता, आधुनिकता, ऐतिहासिकता और वैज्ञानिक युगबोध,
  • (6) लोकजीवन के तत्त्वों का गीतों में अनुबंधन,
  • (7) नवीन बिंबयोजना,
  • (8) सरल भाषा एवं संक्षिप्तता।

नवगीतकारों के उल्लेखनीय नाम हैं- अज्ञेय, नरेश मेहता, हरिनारायण व्यास, धर्मवीर भारती, सर्वेश्वरदयाल, विजयदेवनारायण, केदारनाथ सिंह, वीरेंद्र मिश्र, जगदीश गुप्त, श्रीकांत वर्मा, कैलाश वाजपेयी, सोम ठाकुर, चंद्रमौलि उपाध्याय, ओम प्रभाकर, देवेंद्र कुमार, मलयज, मुद्राराक्षस, बुद्धिनाथ मिश्र, रवींद्र भ्रमर, ठाकुरप्रसाद सिंह, राजेंद्र किशोर, नीरज, राही, रमानाथ अवस्थी, रामावतार त्यागी, शलभ, घनश्याम अस्थाना इत्यादि।

नवगीत : सामान्य परिचय

गीत गेय होता है और यह गेयता छन्दबद्धता के कारण आती है। गीत में तुक और लय का निर्वाह होता है, जबकि कविता-छन्दबद्ध और छन्दमुक्त दोनों हो सकती है। तुकान्त भी हो सकती है और अतुकान्त भी; गेय भी हो सकती है और अगेय भी। गेय कविता ही गीत है।

गीत और नवगीत में अन्तर

परम्परागत गीत प्रबल भावावेग पर आधारित होते हैं और इसी कारण मर्मस्पर्शी भी। परम्परागत गीतों की भाषा कोमल और मधुर शब्दों से युक्त होती है। इसके विपरीत नवगीत नए युग की जटिलता, भाषा की सांकेतिकता, और बिम्बात्मकता के साथ-साथ प्रतीकों और उपमानों को लेकर आता है। परम्परागत भाषा, घिसे-पिटे छन्दों और भावों के प्रति विद्रोह करके नवगीत आम जनता की भाषा में बिम्बों और प्रतीकों के माध्यम से यथार्थ जीवन की अनुभूतियों और मानवीय दशाओं को अभिव्यक्ति देता है। लोक-जीवन से सम्बद्धता नवगीत को गीत से भिन्न पहचान देती है।

जिस प्रकार नई कविता पारम्परिक कविता से भिन्न है, उसी प्रकार नवगीत पारम्परिक गीतों से। आधुनिक भावबोध विभाजक रेखा का काम करता है। नवगीत और नई कविता में यदि देखा जाए, तो कोई तात्त्विक भिन्नता नहीं है, सिवाय इसके कि नवगीत जहाँ छंदबद्ध रचना है, वहीं नई कविता मुक्त छंद या छंदमुक्त रचना।

नवगीत की शुरूआत

कई आलोचक निराला के गीत ‘मैं अकेला‘ से नवगीत की शुरूआत मानते हैं। वास्तविक अर्थों में 1960 के दशक में नवगीतकार अपनी भिन्न पहचान के लिए संघर्ष करते रहे और अन्ततः 1970 के दशक में उन्हें यह भिन्न पहचान मिली।

नवगीत न सिर्फ नयेपन की तलाश है और न ही कविता का कोई नया संस्करण वरन् यह परम्परागत गीतों के साथ-साथ नई कविता से भिन्न एवं स्वतंत्र एक नई विधा है जिसे लोक चेतना और जातीय-चेतना से सम्पृक्ति एक विशिष्ट पहचान प्रदान करती है।

आँचलिक या लोक-जीवन से सम्बद्धता जहाँ परम्परागत गीतों से नवगीत को भिन्न पहचान देती है, वहीं छन्दबद्धता नई कविता से।

जिस प्रकार आधुनिक भाव-बोध पर आधारित कविताओं को पारम्परिक कविताओं से भिन्न पहचान देने के लिए ‘नई कविता’ संज्ञा का इस्तेमाल किया गया, उसी प्रकार परम्परागत गीतों से भिन्न पहचान देने के लिए आधुनिक भावबोध पर आधरित गीतों को नवगीत कहा गया।

भाषागत वैशिष्ट्य, आधुनिक भावबोध और प्रतीकात्मक बिम्ब योजना नवगीत को उत्तर-छायावादी कवियों से भिन्न पहचान देते हैं।

यद्यपि नवगीतकारों ने सप्तक-कवियों के अनुकरण के आरोप का खण्डन किया है, फिर भी उन्होंने नवगीत दशक 1,2,3 प्रकाशित करके नवगीत को पृथक् काव्यांदोलन के रूप में मान्यता दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

1986 में ‘नवगीत-अर्द्धशती‘ का प्रकाशन हुआ जिसमें नवगीत आंदोलन के प्रस्तुतकर्ता डा. शंभुनाथ सिंह ने नवगीत की शुरूआत निराला और माखन लाल चतुर्वेदी से मानी। इन्होंने निराला की कविता ‘मैं अकेला’ (1940) से नवगीत की शुरूआत मानी-

मैं अकेला / देखता हूँ आ रही मेरे दिवस की सांध्यबेला,

पके आधे बाल मेरे / हुए निस्प्रभ गाल मेरे

चाल मेरी मंद होती जा रही है हट रहा मेला।

आगे चलकर ‘बेला‘ काव्य संकलन में निराला ने अजनबीपन की भावना को अभिव्यक्ति दी जिसके कारण नवगीत का संबंध अस्तित्ववादी भावबोध से जुड़ता है-

बाहर मैं कर दिया गया हूँ, भीतर पर भर दिया गया हूँ,

ऊपर यह बर्फ गली है, नीचे यह नदी चली है,

सख्त तने पर नर्म कली है,  इसी तरह हर दिया गया हूँ।

सप्तक कवियों ने नवगीत को व्यवस्थित रूप देने का काम किया जिनमें भवानीप्रसाद मिश्र, केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल आदि प्रमुख हैं।

नवगीत के विकास के विभिन्न चरण

शंभुनाथ सिंह ने नवगीत के विकास को चार चरणों में बाँटा है ।

प्रथम चरण (1935-50)  

प्रथम चरण को ये उद्भव काल की संज्ञा देते हैं जिस दौरान नवगीत की विशेषताएँ उभरने तो लगी थी, लेकिन नवगीत संज्ञा का इस्तेमाल नहीं हुआ था।

रोमांटिकता नवगीत की विशिष्ट पहचान है। इसे अभिव्यक्ति मिली है- प्रेमचेतना के धरातल पर और दूसरे चरण में आंचलिकता के प्रति रूझान के रूप में।

यद्यपि रोमांटिकता की प्रवृत्ति उत्तर छायावादी कवियों के यहाँ भी मौजूद है, पर नवगीत की रोमांटिकता उत्तर छायावादी रोमांटिकता से भिन्न है।

जहाँ प्रेम की पीड़ा को अभिव्यक्ति उत्तर छायावादी बच्चन के यहाँ भी मिली है और उन्होंने इसे जिजीविषा और मृत्यु-बोध के साथ जोड़कर नवगीत को दार्शनिक आधार प्रदान करने का काम किया, वहीं शंभुनाथ ने प्रेम की वैयक्तिक अनुभूतियों को विरह के आवरण में लपेटकर प्रस्तुत किया –

प्यार किस देवता से कम मेरा, प्यार की आरती है गम मेरा।  

ज़िंदगी  की अंधेरी गलियों में, इनकी पूजा है हर कदम मेरा।

याद करता हूँ इसलिए हरदम, जाने कब टूट जाए दम मेरा।

‘घर नियराया‘ में ओम प्रभाकर इसी प्रेम को अभिव्यक्ति देते हुए लिखते हैं –

दिया तुम्हारा चेहरा ऐसे/ जैसे छाया कमल-कोष की

आँगन की देहरी पर बैठी/ लिए बुनाई नाल ओस की

मेरी आँखें जुड़ी रह गयी / बालों में सावन लहराया

लेकिन, यथार्थ के हल्के आघात से यह रूमानी प्रेम छिन्न-भिन्न हो जाता है-

धारा-सी प्रीति बढ़ रही है / बालू-सी भीत ढह रही है।

प्रेम चित्रण के क्रम में इन्होंने लोक जीवन से सम्बद्ध उपकरणों का भी सहारा लिया है-

एक सर और जाल के फेंक रे मछेरे,

जाने किस मछली में बंधने की चाह हो।

संगीतात्मकता नवगीत की विशिष्ट पहचान है, जो इसे नई कविता से अलग करती है। गेयता के इस आग्रह के कारण नवगीत छन्दबद्धता की विशेषता को लेकर आता है, पर नई कविता छन्दमुक्तता पर जोर के साथ सामने आती। आरम्भ में छन्दबद्धता और लयात्मकता पर जोर के कारण यह संगीतात्मकता के गुण को लेकर आती है। यह गेयता गीत का स्वभाव भी है, लेकिन परवर्ती चरण में कुछ नवगीतकारों ने अपने गीतों को लयात्मकता के गीति स्वभाव से मुक्त करने की कोशिश भी की। इसका उदाहरण कैलाश गौतम का यह गीत है-

पीली कोठी की मुंडेर / उल्टा पल्ला है

आँख की किरकिरी / क्या कहें मुहल्ला है

 दाँत की सुपारी में हैसियत हमारी है।

दूसरा चरण (1951-60)  

इसके विकास का दूसरा चरण 1951 से 1960 का था। इसे विकास काल की संज्ञा दी गयी। इस दौरान आंचलिकता या लोक-जीवन से जुड़ाव नवगीत की विशिष्ट पहचान बन कर आती है।

प्रथम चरण में जहाँ लयात्मकता, संवेदनशीलता, रागात्मकता और आधुनिकता नवगीत की पहचान बनती है तो द्वितीय चरण में इसके शिल्पगत और भाषागत वैशिष्ट्य उजागर होते हैं। इसी दौर में शंभुनाथ सिंह ने इस दौर के गीतों के लिए नवगीत संज्ञा का इस्तेमाल किया।

तीसरा चरण (1961-70)  

नवगीत के विकास का तीसरा चरण 1961-70 का है। जिस दौरान नवगीत को अपनी पृथक् पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ा। यदि कुछ आलोचकों ने नवगीत को नई कविता से भिन्न मानने से इंकार किया, तो कुछ ने इसे कविता मानने से ही इंकार किया।

आधुनिक भावबोध से जुड़ाव इस दौर के नवगीत की प्रमुख विशेषता है। इस दौर के नवगीतकारों ने यथार्थ जीवन की त्रासदी को अभिव्यक्ति देने का काम किया। इस दौर में नवगीत नई कविता से भिन्न पहचान बनाने का आग्रह लेकर आती है।

उ‌द्भ्रांत ने ‘नवगीत सप्तक’ में लिखा है, ‘संघर्ष के दौर में कभी-कभी भावनायें क्षण-दो-क्षण के लिए कौंधती हैं। ऐसे समय में फिर गीत जन्मता है। मगर निश्चय ही इस गीत का स्वरूप पहले के गीत से भिन्न होता है।”

जीवन के कठोर यथार्थ से मार खाते-खाते उसके शिल्प, उसके कथ्य, उसकी भाषा-सभी में परिवर्तन आ जाता है। यह गीत अनुभवी होता है। पहले के गीत की तरह उत्तेजनाएँ नहीं लिए होता।

‘शहर से ऊबकर‘ में उ‌द्भ्रांत लिखते हैं-

यह शहर जिसको हृदय में प्यार से मैंने बसाया,

घुटन बनकर रह गया है ज़िंदगी  के वास्ते,

चलूँ इसको छोड़ अपना गाँव ले लूँ।

स्पष्ट है कि नवगीत आधुनिकीकरण की प्रक्रिया, आधुनिकता और आधुनिक शहरी सभ्यता से मोहभंग को लेकर आता है। इस मोहभंग का कारण है शहरी जीवन का घुटन और संत्रास। इसी पृष्ठभूमि में आधुनिकता की बैसाखियाँ ज़िंदगी के लिए ग्रहण बन जाती है :

आधुनिकता की कई बैसाखियाँ दिल में लगी थीं

ग्रहण अब वे बन गई हैं ज़िंदगी के वास्ते

छोड़ दूँ प्राचीनता के पाँव ले लूँ

अपना गाँव ले लूँ।

ओम प्रभाकर ‘डूब गया दिन‘ में लिखते हैं-

डूब गया दिन। जब तक पहुँचे तेरे द्वारे।

भारी था मन। हम थे काफी टूटे-हारे।

सूना आँगन, सूनी द्वारी। तुलसी का चौरा सूना सूना।

ऐसे सुनेपन में हमें हुआ। खुद सांसें लेने में दुख दूना।।

नईम ‘डगे नहीं सालबीज‘ में लिखते हैं

दीवारों पर खूंटी-कील-सा हुका हूँ मैं।

चुनने को कहते। चुन लेता ऊँचा आसन,

आधा अब धंसा हुआ। आधा है कुण्ठित मन।

अगर नईम मन के कुण्ठित होने का संकेत देते, तो ओम प्रभाकर टूटन, पराजय बोध और सूनेपन को अभिव्यक्ति देते हुए आते।

शंभुनाथ सिंह ‘रोशनी के लिए‘ में रोशनी की चाह में भले ही जीने की बात कर रहे हैं, पर वहाँ भी आधुनिक जीवन की विसंगतियाँ छुपाए नहीं छुपती-

यों अंधेरा अभी पी रहा हूँ / रोशनी के लिए जी रहा हूँ।

एक अन्धे कुएँ में पड़ा हूँ / पाँव पर किन्तु अपने खड़ा हूँ,

कह रहा मन कि कद से कुएँ के/  मैं यकीनन बहुत ही बड़ा हूँ।

कविता के मध्य तक आते-आते यह चाह भी शेष नहीं रह जाती –

तेज बदबू, सड़न और मैं हूँ /  हर तरफ है घुटन, और मैं हूँ।

यों अकेला नरक भोगता भी / मैं सभी के लिए जी रहा हूँ।

कैसी विडम्बना है आधुनिक जीवन की, अपने लिए जीना दुश्वार है, पर आत्म प्रवंचना का आलम यह है कि सभी के लिए जीने की चाह बनी हुई है।

चौथा चरण (1971 के बाद)  

1971 के बाद का चौथा चरण उत्थान काल है, जब नवगीत को पृथक् काव्यांदोलन के रूप में पहचान मिलती है। इस दौर में आकर एक ओर नवगीत में विषयों की विविधता आती है, तो दूसरी ओर भाषा को लेकर प्रयोगशीलता भी। नवगीत के सैद्धांतिक आधार का निर्माण इसी दौर में हुआ।

आधुनिकता और भारतीयता को जोड़ते हुए नवगीत आधुनिक काव्यधारा के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाती है। इस दौर में शंभुनाथ सिंह ने अपनी विशिष्ट पहचान की तलाश की है। इसके लिए उन्हें अतीत में जाना पड़ा-

ये समय का खण्डहर है / जहाँ ज़िंदगी गड़ी है

बिखरी हुयी सतह पर / सदियाँ भरी पड़ी है।

अतीत में जाकर इन्होंने भारतीय सांस्कृतिक-अस्मिता की पहचान की और भारतीय सांस्कृतिक-परम्परा की अविच्छिन्नता का संकेत दिया-

देश हैं हम / महज राजधानी नहीं

हम बदलते हुए भी / न बदले कभी

लड़खडाए कभी /  और संभले कभी

हम हजारों वर्षों से जी रहे हैं /

ज़िंदगी वह नई या पुरानी नहीं

उन्होंने भारत द्वारा मानव और मानवता के नाम पर करूणा के लिए दिए गए संदेश में जाकर भविष्य की आशा को तलाशने की कोशिश की-

युग युग से देते आए / इतिहास को नई दिशाएँ,

देश-देश में लहराती हैं / करूणा की शांति ध्वजायें,

नीलकंठ से हम पीते / मानव की सिसकियाँ कराहें।

एक ओर अस्मिता की पहचान तो दूसरी ओर आज की ज़िंदगी के असली अर्थ-

एक जलता शहर हो गई ज़िंदगी /  आग का गुलमोहर हो गई ज़िंदगी,

हर तरफ है अंधेरी सुरंगे यहाँ / हैं भटकती हुई सिर्फ रूहें यहाँ,

आधुनिकता और अतीतोन्मुखता का यहाँ अजीब द्वन्द्व है। एक ओर आधुनिक जीवन का द्वन्द्व –

खिंची हुयी प्रत्यंचा-सी, यह नीली नसों का तनाव।

तो दूसरी ओर अतीत, जिसकी कटु स्मृतियाँ भी वर्तमान में मधुर बनकर आती हैं –

सहलाएगी दुखता से /  यादों की यादों की याद।

प्रकृति और लोक जीवन से जुड़ाव नवगीत की प्रमुख विशेषता है। 1950 के दशक में आँचलिकता की जिस प्रवृति का उभार होता है, उसका प्रभाव इस दौर में लिखे जा रहे गीतों पर भी पड़ता है और यह नवगीत की विशिष्ट पहचान बन जाती है। इस आंचलिकता बोध को अभिव्यक्ति ठाकुर प्रसाद सिंह के यहाँ मिली है। उन्होंने प्रकृति के जिस सौंदर्य का अभी-अभी साक्षात्कार किया है, उसे प्रिया की अनुपस्थिति से जोड़कर नाटकीय बना दिया है –

आधी रात बाग में पिडकुल,

डुमर-डुमर स्वर आधी रात।

यहाँ मैं आकुल, तुम आओ घर।

रमेश रंजक ने आधुनिक मनुष्य के जीवनगत यथार्थ को लोक जीवन से सम्बद्ध कर अभिव्यक्ति दी है-

रंग के भाग में ठिठोली लिखी है / रूप के भाग में चीर;

अपने तो भाग मजूर के भाग हैं / भाल पर श्याम लकीर।

इसी प्रकार शंभुनाथ सिंह ने भी विरह के उद्दीपन के रूप में लोक जीवन से जुड़े उपादानों का चित्रण किया है-

पुट-पुट धन पांडुक रटता / चातक पी-पी रटता

कोयलिया की कुहू कुहू से / अलसाया दिन कटता

एक मौन जपता विरहिन का / यौवन कोटा रे।

पिया न आए / आमों में आ गया टिकोरा रे।

यद्यपि आधुनिक भावबोध नवगीत को नई कविता के करीब लाता है, लेकिन लोकजीवन से गहरे स्तर पर जुड़ाव (संपृक्ति) और आंचलिक जीवन के प्रति रागात्मकता नई कविता में कहीं देखने को नहीं मिलती। इसलिए यह नवगीत की विशिष्ट पहचान बन जाती है।

नवगीतकारों की भाषा में अद्भुत लोच और मादक लय का संयोजन देखने को मिलता है। लय के निर्वाह के लिए वे लोक धुनों और आंचलिक शब्दावली का प्रयोग करते हैं। यह प्रयोग उनके गीतों को लयात्मकता प्रदान करने के साथ मर्मस्पर्शी भी बना देती हैं। आधुनिक भावबोध को अभिव्यक्ति देते समय भी नवगीतकार सरल एवं सहज शब्दों के प्रयोग की ही प्राथमिकता देते हैं जिससे नवगीत नई कविता से भिन्न और विशिष्ट हो जाती है।

हिंदी के प्रमुख नवगीतकार और उनकी रचनाएँ

हिंदी के कुछ प्रमुख नवगीतकार और उनकी रचनाएं निम्नलिखित हैं:

नवगीत की प्रमुख विशेषताएँ

नवगीत की प्रमुख विशेषताएं निम्नानुसार है :

काव्य की नवीनता

नवगीतों में परंपरागत गीतों के घिसा-पिटा, बासीपन रूप के बजाय एक नयी ताजगी और युगीन भावबोध प्रकट हुआ। कथ्यगत नवीनता नवगीत को एक नये दायरे में प्रतिष्ठित करती है।

नवगीत के फलक में भक्तिकालीन गीति-परंपरा के भक्ति, अध्यात्म, श्रृंगार इत्यादि भावों अथवा द्विवेदीयुगीन-छायावादयुगीन आध्यात्मिकता, देशप्रेम, राष्ट्रीयता, वैयक्तिकता, मानवीय प्रेम इत्यादि के स्थान पर सामाजिक जीवन की विसंगतियों, भोगी गयी कड़वी अनुभूतियों, नैतिक विघटन, मूल्यहीनता, मानवतावादी जीवन-मूल्यों के संकटबोध इत्यादि सर्वथा नवीन कथ्य समाविष्ट हुए। उदाहरण के लिए-

1. टुकड़े-टुकड़े नाते रिश्ते

धज्जी धज्जी प्यार

हुई जिंदगी बनिये के

खाते की रकम उधार।  –  सुरेश

2. ये मूल्यों की टकराहट और ये रिक्तता बोध

हम मूल्यहीन लोग क्या करें?   – अमरनाथ श्रीवास्तव

3. अब न कोई गा रहा मस्ती भरा गाना

खुल गया है क्योंकि मेरे गाँव में थाना।

कुछ लुटेरे इस तरह के, रोज आते हैं

हाथ से रोटी छिनकर, मुस्कुराते हैं

आदमी चुपचाप रहकर खा रहा खाना।   – मयंक श्रीवास्तव

आधुनिकता बोध

आधुनिक युगबोध नवगीत की प्रमुख विशेषता है। आधुनिकता बोध ही नवगीत का प्राण है। आधुनिकताबोध वह चेतना है जो नवगीत में नवीन रागबोधों और नयी अभिव्यंजना-पद्धति को विकसित करती हैं।

इस दृष्टि से नवगीतों में नये जीवन मूल्यों, नयी जीवनानुभूतियों, नये बौद्धिक प्रयत्नों, नयी मनः स्थितियों के साथ-साथ अस्तित्ववाद, अलगावबोध अजनबीपन, व्यर्थता. संत्रास इत्यादि के प्रति विशेष आग्रह दिखाई पड़ता है। उदाहरण के लिए –

इन ओढ़े हुए मुखौटों पर संशय

यह महज औपचारिकता, यह अभिनय

जीविका हेतु यांत्रिकी व्यस्तताएँ

अपराध पतन या नैतिक हत्याएँ

नारे, सभा, जुलूस, प्रदर्शन-क्रोध

त्रास, तनाव, यह उत्पीड़क युगबोध ।     – चंद्रसेन विराट

सामाजिक विसंगतियाँ

नवगीत में सामाजिक विसंगतियों, अन्याय-शोषण के प्रति क्षोभ एवं विद्रोह के स्वर के साथ-साथ व्यंग्य की तीखी मार मिलती है। नवगीतकारों ने सामाजिक जीवन की विसंगतियों को अपने गीतों के माध्यम से वाणी दी, जिसे मनुष्य अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में क्षण-क्षण देखता, सुनता, अनुभव करता और भोगता है। उदाहरण के लिए –

जग आदमखोर

जीवन की लढ़िया

जब कीच में फँसी

भूल गये लोकगीत

खेल और हँसी

लाठी का जोर।      – अनिल गौड़

नये राजनीतिक संदर्भ

नवगीत में नये राजनीतिक संदर्भों को प्रमुखता से स्थान मिला है। नवगीतकारों ने राजनीति-जगत् में व्याप्त अवसरवादिता, चाटुकारिता, अनैतिकता, मूल्यहीनता, स्वार्थपरता, शक्ति-संभावनाओं की होड़, दाव-पेंच की राजनीति, राजनीतिक भ्रष्टाचार इत्यादि अनेक संदर्भों को व्याख्यातित किया । उदाहरण के लिए –

1. मुखिया थे मुख से

सरपंच हुए पेट से

बातों की एवज

संबंध जुड़े टेंट से।      – गुलाब सिंह

2. शब्दों के हाथी पर / ऊँघता महावत है।

गाँव इधर / लाठी और भैंस की कहावत है।

घोड़ों के लिए उगी/घास है, बगीचा है/

कुर्सी के पाँव तले/गुदगुदा गलीचा है/

हर पाँचवें साल / प्रजातंत्र की सजावट है।    –  गुलाब सिंह

जातीय जीवन की सहज अभिव्यक्ति

नवगीत पूर्णतया भारतीय (जातीय) संस्कारों का काव्य है। नवगीतों ने अपने प्रस्फुटनकाल से नवगीत को जातीय संस्कारों से लयबद्ध रूप में प्रकट किया है। नवगीत में जातीय संदर्भों की प्रचुरता है तो दूसरी ओर सम्पूर्ण जातीय संदर्भों की अभिव्यक्ति भी।

नयी कविता जहाँ जातीय संदर्भों से कटी है, वहीं नवगीत इससे गहरे रूप में जुड़ी हुई है। नवगीत में लोकजीवन, लोकचेतना, आंचलिकता, लोकतत्त्व, दृश्यात्मकता एवं लोकरंग की छटा अद्भुत है। उदाहरण के लिए –

1. उपलें पाथेगी बासन माजेगी

 पारबती अपने दिन, यों ही काटेगी। आंटा गूथेगी, चूल्हा फूंकेगी रात गये मुर्दे सी पड़ सो जायेगी।                      – अखिलेश कु० सिंह

2. ऊँख जैसी यह गृहस्थी गांठ का रस बाँटती निर्वन्ध यह गरीबी और जांगर तोड़ मिहनत हाथ दो सौ छेद जैसे नाव में।     – बुद्धिनाथ मिश्र

प्रकृति के प्रति नवीन दृष्टिकोण

नवगीतकारों ने प्रकृति के प्रति सर्वथा नवीन दृष्टिकोण का परिचय दिया। कुछ उदाहरणों द्वारा इसे भलीभाँति देखा जा सकता है

1. धूप दिन जलते पठारों पर पलट कर आ गये हैं गुलाबों की पंखुरी पर

आंच फिर दहका गये हैं।             – माहेश्वर त्रिपाठी

2. ताम पत्र अमराई बाँचे सुधि सुंगध भर रही कुलाचें

टेंसू प्यार जताने लगे फागुन के।           – बुद्धिनाथ मिश्र

प्रणय के प्रति व्यापक दृष्टिकोण

नवगीतकारों ने प्रकृति के साथ-साथ प्रणय के प्रति नवीनता और व्यापकता का परिचय दिया है। इनके प्रणय के प्रति दृष्टिकोण को इस प्रकार देखा जा सकता है-

1. चीजों के कोने टूटे, बातों के स्वर डूब गए हम कुछ इतना अधिक मिले मिलते-मिलते ऊब गये।

2. आओ उस मौन को दिशा दे दें जो अपने होठों पर अलग-अलग पिघलता है।

शिल्पगत विशेषताएँ

 कथ्य और शिल्प दोनों धरातल पर नवगीत ने हिंदी -कविता की गीत-विधा को नवीनता और मौलिकता प्रदान कर उसे सशक्त और समृद्ध आयाम प्रदान किया। लोकभाषा, लोकशब्दावली, लोकधुनों का समावेश, नवगीत की शिल्पगत कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ हैं, जो नवगीत को प्राणवान् बनाती है। लोकपरिवेश, लोकसंस्कृति एवं आंचलिक शब्दों का चयन, मौलिक बिम्ब-विधान, प्रतीकों का सफल एवं सामंजस्यपूर्ण प्रयोग, अप्रस्तुत विधानों की मौलिक अभिव्यंजना, गीत-शिल्प का अभिनव प्रयोग इत्यादि नवगीत की शैल्पिक विशेषताओं को इस प्रकार देखा जा सकता है-

शब्दचयन

नवीनगीतकारों में शंभुनाथ सिंह, नईम, कुमार शिव, गुलाब सिंह इत्यादि ने लोकपरिवेश, लोक संस्कृति के शब्दों का चयन किया है तो वीरेन्द्र मिश्र, राजेन्द्र गौतम, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र इत्यादि ने नवगीतों में तत्सम शब्दों का बहुल प्रयोग हुआ है। यथा-

लोक परिवेश, लोक-संस्कृति के शब्द : सांझ भोर, ओसारा, डीह, मुआ, भिनसार, नथुनी, परधान, दौरी, कजरी, पुरवैया, क्वार, पाख, डलिया, पतोहू, पत्तल, सूप, शिकनी, जोतदार, मसुरी दीठ, मांडने कढ़ा, चौखट, मुड़ेर, बंसवारी, निवाणे इत्यादि।

तत्सम शब्द :  ऋचा, कापालिक, प्रमदा, सिन्धुजा, मत्स्यगंधाएँ, कीचक-निकुंज, पुष्प धन्वा, वानीर ग्रामिका, चन्द्रपीड़, सदानीरा, शंखपुष्पी, मंदाकिनी धूमवलयांकित, खंडित tu gy रत्नमुकुट, नागवेणी इत्यादि।

बिम्ब विधान

नवगीत में प्रयुक्त बिम्ब-विधान परंपरागत बिम्ब-विधान भन्न एवं नयापन लिये हुए है। नवगीत में जिन मौलिक, नवीन एवं ताजे बिम्ब-विधान सृजित हुए हैं. उनमें सांकेतिक बिम्बों की छटा निराली है। नवगीत के सांकेतिक बिम्ब-विधान स्वयं प्रस्तुत होने के साथ-साथ किसी अप्रस्तुत अर्थ को भी ध्वनित करते हैं। यथा-

हाथों में लेकर जो फूल चले थे हम शहरों में आते ही बने बही खाते।

 – कुँवर बेचैन

कुँवर बेचैन के उक्त कथन में हाथों में फूल लेकर चलने और शहर में प्रवेश करते-करते अनेक समस्याओं, परेशानियों, कठिनाइयों से जुड़ जाने का सांकेतिक बिम्ब का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत हुआ है।

प्रतीक

नवगीत में रूढ़ एवं परंपरागत प्रतीकों की जगह नये प्रतीकों को ग्रहण किया गया है। नवगीत में यदि कहीं परंपरागत, रूढ़ इत्यादि प्रतीक प्रयुक्त हुए हैं, तो वे भी नये परिवेश एवं नये संदर्भों के साथ। प्रतीक का एक उदाहरण देखें-

दूध से नहा रही निर्वसना चाँदनी, किरण में निचोड़ धवल मर-मर की शिला पर, वसन को सुखा रही निर्वसना चाँदनी।

अप्रस्तुत विधान

नवगीत की काव्यभाषा मौलिक अप्रस्तुत विधानों के माध्यम से सशक्त रूप से प्रकट हुई है। नवगीत में अप्रस्तुत विधान में उपमेय और उपमान की मूर्तता के लिए अमूर्त और अमूर्तता के लिए मूर्त की सुंदर अभिव्यंजना हुई है। यथा-

1. उड़ गये अनजान नभ में

विहग से चहके हुए दिन।                 – राजेन्द्र गौतम

2. चढ़ते हुए दिन सा तुम्हारा रूप ढलता हुआ सूरज हमारा मन।

                                  – विजय किशोर मानव

मानवीकरण

नवगीत की शिल्पगत प्रवृत्तियों में ‘मानवीकरण’ की विशेषता भी प्रमुख है। मानवीकरण का एक उदाहरण देखना पर्याप्त होगा-

तुम भी कितने बदल गये

ओ पिता सरीखे गाँव।                  – राजेन्द्र गौतम

छंद-विधान

लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने नवगीत के छंद-विधान के विषय में लिखा है कि- “नवगीत में कहीं कोई सामान्य छंद, कहीं मुक्त छंद, कहीं उसके साथ टेक, कहीं उर्दू बहरों और लोकगीतों की लय-पद्धति का प्रयोग हुआ है। नवगीत का आग्रह शब्द और लय पर होता है।”

डॉ. इंदीवर पाण्डेय के अनुसार- “नवगीत ने लयों की विविधता, आंतरिक गठन, सहज प्रवाह, निर्दोषता, परम्परा विनिर्मुक्तता, औदात्य और पौरुष आदि छंद विधान की विशिष्टताओं को अपने अंतर्गत समाविष्ट किया। ये विशेषताएँ नवगीत की छान्दसिक चेतना का निजी व्यक्तित्व एवं अस्तित्व प्रमाणित करती हैं।”

नवगीत की उपलब्धियाँ

हिंदी काव्य में नवगीत का विकास अपनी परम्पराओं एवं परिवेशगत चुनौतियों के आधार पर सहज स्वाभाविक रूप में हुआ; उसका आरोपण पाश्चात्य काव्य की प्रवृत्तियों के आधार पर कृत्रिम रूप में नहीं हुआ।

यही कारण है कि नवगीत की स्थापना किसी एक नेता द्वारा किसी निश्चित तिथि से विधिवत् घोषणा-पूर्वक नहीं हुई – यह दूसरी बात है कि इसके स्वतन्त्र अस्तित्व को अनुभव करते हुए इसके विभिन्न प्रचलित नामों में से किसी एक को चुनकर इसका नामकरण संस्कार अवश्य हुआ।

जैसा कि अन्यत्र संकेत किया जा चुका है कि नवगीत की आधार भूमि छायावादी काव्य है, जिसे परवर्ती युग में बच्चन एवं भगवतीचरण वर्मा जैसे व्यक्तिवादी कवियों ने विकसित करके नई दिशा प्रदान की।

यह सही है कि इन कवियों के द्वारा छायावादी काव्य का व्यक्तिवाद और अधिक सघन हो गया किन्तु साथ ही वह सूक्ष्मता से स्थूलता की ओर, कल्पना से वास्तविकता की ओर तथा मानसिकता से शारीरिकता की ओर अग्रसर हुआ। निश्चय ही इससे छायावाद का उदात्त सौन्दर्य-स्वप्न एवं भव्य प्रणय का स्वरूप भंग हो गया, किन्तु वह गगन की असीम उच्चता से अवतरित होकर यथार्थ की लौकिक भूमि पर आ गया।

इन कवियों द्वारा इसकी शैली में भी विकास हुआ। जहाँ पूर्ववर्ती छायावादी कवियों की शैली संस्कृत-गर्भित अधिक थी, वहाँ अब वह लोक प्रचलित शब्दावली के निकट आ गई।

नवगीत ने इस व्यक्तिवादी काव्य की यथार्थवादी दृष्टि, लौकिक भावभूमि एवं सरल शैली का समन्वय अपने काव्य में एक सीमा तक किया जिससे वह छायावादी कल्पना एवं अयथार्थता के आक्षेप से मुक्त रहा। आगे चलकर प्रगतिवाद के प्रभाव से नवगीत में वैयक्तिकता के स्थान पर सामाजिकता, कल्पना के स्थान पर यथार्थ एवं पलायन के स्थान पर संघर्ष का प्रादुर्भाव हुआ।

सामाजिक जीवन की असंगतियों, आर्थिक विषमताओं एवं साम्राज्यवादियों के शोषण आदि का चित्रण नवगीतकारों ने भी पूरी शक्ति से किया, किन्तु उन्होंने साम्यवादी विचारधारा की प्रतिबद्धता एवं प्रगतिवाद की प्रचारात्मकता को स्वीकार नहीं किया ।

प्रयोगवाद की स्थापना के अनन्तर नवगीतकारों का सम्बन्ध इससे भी स्थापित हुआ । प्रारम्भ में प्रयोगवाद के नेताओं ने नवगीत को नयी कविता का ही अंग माना किन्तु जब उन्होंने देखा कि नवगीत लोकप्रियता में नयी कविता से भी आगे बढ़ रहा है तो उन्होंने इस आधार पर कि इसमें बौद्धिकता, आधुनिकता और यथार्थवादिता का अभाव है, इसे अकाव्य घोषित कर दिया।

इस प्रकार नवगीत के अस्तित्व के लिए भी संकट उपस्थित हो गया, किन्तु नवगीतकारों ने इस चुनौती का भी सामना किया और उन्होंने सिद्ध कर दिया कि आधुनिक बोध, बौद्धिक चिन्तन एवं जीवन के यथार्थ चित्रण की दृष्टि से नवगीत किसी से भी पीछे नहीं है।

इस प्रकार हम देखते हैं, कि नवगीत अपनी विकास यात्रा में छायावाद से चलकर मार्ग में पड़ने वाले अनेक वादों व्यक्तिवाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नयी कविता आदि से सम्पर्क रखता हुआ तथा उनसे बहुत कुछ ग्रहण करता हुआ आगे बढ़ा है। इसलिए हम नवगीत में आधुनिक काव्य की विभिन्न विशेषताओं का समन्वय सहज स्वाभाविक रूप में देखते हैं।

प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की भाँति वह एकाएक आरोपित ‘वाद’ नहीं है, अपितु वह सहज स्वाभाविक रूप में विकसित है, इसलिए उसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और वह अधिक स्थिरता, गम्भीरता एवं स्थायित्व प्राप्त कर सका है

नवगीत के पक्ष में एक विशेष बात यह निःसंकोच कही जा सकती है कि भले ही उसने विभिन्न आयातित काव्य आन्दोलनों से आवश्यकतानुसार प्रभावग्रहण किया हो किन्तु फिर भी वह अपनी परम्परा एवं अपने परिवेश से गहराई से जुड़ा रहा है।

उसके बाह्य रूप-रंग में हमें कहीं-कहीं पाश्चात्य आन्दोलनों की झलक दिखाई पड़े किन्तु उसकी आन्तरिक चेतना मूलतः भारतीय है।

परम्पराओं की विमुखता ने जहाँ प्रगतिवाद एवं प्रयोगवाद को खोखला कर दिया वहाँ अतीत के स्वस्थ दाय की स्वीकृति ही नवगीत की शक्ति बन गई है।

इन संदर्भ में वीरेन्द्र मिश्र का कथन उल्लेखनीय है- “नवगीत अपनी परम्परा से जुड़ी हुई एक जीवन शक्ति है। कविता की तरह पश्चिम के दर्शन पर आधारित-आयातित मूल्यों का प्रतिबिम्ब नहीं। नवगीत आस्था-शील अनुभूतियों का निर्बन्ध समवेत स्वर है।”

नवगीत ने साहित्य, समाज और जीवन के प्रति भी स्वस्थ, व्यापक एवं संतुलित दृष्टिकोण का परिचय दिया है। साहित्य के क्षेत्र में उसने आधुनिक युग के अनुरूप बौद्धिक चिन्तन को अपनी अभिव्यक्ति का आधार बनाया है, किन्तु ऐसा करते समय वह रागात्मकता की उपेक्षा करना आवश्यक नहीं समझता । बालस्वरूप ‘राही‘ के शब्दों में मेरी कोशिश यह है कि वस्तु तो बौद्धिक हो जिससे वह हमारे युग की सच्चाई के अधिक निकट होगी किन्तु अभिव्यंजना रागात्मक होनी चाहिए।

नवगीति-परम्परा : स्वातन्त्र्योत्तर गीति-काव्य

बौद्धिक अनुभूतियों को पचाकर और उन्हें संवेदनात्मक रूप देकर ही कविता में व्यक्त किया जा सकता है।’ अन्यथा कविता में काव्यात्मकता का संचार नहीं होगा। बौद्धिकता और रागात्मकता की भाँति ही वैयक्तिकता एवं सामाजिकता, कल्पना एवं यथार्थ, वस्तु एवं शिल्प का भी समन्वय इनमें दृष्टिगोचर होता है। यही कारण है कि नवगीत केवल अपने रचयिताओं के लिए ही नहीं अपितु पाठकों और श्रोताओं के लिए भी आकर्षक, प्रभावोत्पादक एवं मार्मिक सिद्ध हो सका ।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि नवगीतकारों ने आधुनिकता की चुनौती को स्वीकार करते हुए भी उसके पाश्चात्य पुरोधाओं के वर्चस्व को स्वीकार नहीं किया ।

प्रयोगवादियों की भाँति उन्होंने आधुनिकता का मानदण्ड केवल पाश्चात्य भौतिकतावाद, सार्त्र के अस्तित्ववाद, फ्रायड के यौनवाद एवं अंग्रेजी कविता के बिम्बवाद एवं प्रतीकवाद अथवा फ्रेंच चित्रकला के अतियथार्थवाद को ही स्वीकार नहीं किया।  अपितु उसने भारतीय परिवेश के अनुरूप आधुनिक भाव-बोध एवं व्यापक चिन्तन पर आधारित विचारों एवं मूल्यों को आधार बनाया है।

वस्तुतः नवगीतकार विदेशों से आयातित आधुनिकता एवं आरोपित बौद्धिकता का विरोधी है, जिसकी अभिव्यक्ति उसके काव्य में भी अनेक स्थलों पर हुई है; यथा-

1. हमको क्या लेना है, परदेशी केशर से, बूढ़े हिमपात सड़ते तालाबों में खिले हुए बासी जलजात से, हम को तो लिखने है गीत नये ! पिघले इस्पात से ।                – बाल स्वरूप राही

2. यह कब हुआ कि हमने अपने अनुभव से सीखा हो

कुछ उधार के लिए भाव, कुछ ओढ़ लिया चिन्तन को । –  पुष्पा राही

नवगीत की विषय-वस्तु

नवगीत की विषय-वस्तु का क्षेत्र बहुत व्यापक है; उसमें प्रकृति, नारी सौन्दर्य, प्रेम, विरह आदि के परम्परागत विषयों का तो निरूपण हुआ ही है किन्तु साथ ही दाम्पत्य, पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की भी विभिन्न स्थितियों का भी अंकन सहजता से हुआ है।

यहाँ पर भी उल्लेखनीय है कि परम्परागत विषयों को भी नवगीतकारों ने नई दृष्टि से ग्रहण करते हुए नये रूप में प्रस्तुत किया है। यथा – प्रकृति एवं नारी के सौन्दर्य एवं प्रेम का चित्रण छायावादी काव्य में भी अतिशय गम्भीरता से हुआ है, किन्तु उसमें सर्वत्र कल्पना की प्रमुखता होने के कारण वह वास्तविकता से दूर प्रतीत होता है; जबकि नवगीत में कल्पना के स्थान पर यथार्थ का आश्रय ग्रहण किया गया है।

इस दृष्टि से सर्वप्रथम इनके प्रकृति-चित्रण को देखा जा सकता है। प्रकृति पर मानवीय भावनाओं को आरोपण करने की प्रवृत्ति परम्परागत गीत एव नवगीत दोनों में मिलती हैं, किन्तु फिर भी नवगीत में कल्पना का रंग इतना गहरा नहीं है कि उससे प्रकृति का यथार्थरूप सर्वथा आवृत हो जाय।

नवगीतकारों ने प्रकृति को निजी भावनाओं के रंग में रंगकर इस भाँति प्रस्तुत किया है जिससे प्रकृति और मानव दोनों का अस्तित्व घुल-मिल-सा गया है। यहाँ कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-

चाँदनी :

दूध से नहा रही निर्वसना चाँदनी

किरण में निचोड़ धवल मर-मर की शिला पर वसन को सुखा रही निर्वसना चाँदनी

– चन्द्रसेन “विराट”

संध्या :

वही शाम पीले पत्तों की गुमसुम और उदास,

वही रोज का मन खोजने का एहसास

टांग रही है मन को एक नुकीले खालीपन से         – नरेश सक्सेना

रात्रि :

स्याह-स्याह रात ने कहा मुझे लाल-लाल प्रात अभी दूर है। – वीरेन्द्र मिश्र

कहीं-कहीं प्रकृति मानवीय भावनाओं एवं क्रियाकलापों के आरोपण से इस तरह अतिरंजित हो गई है कि वह कवि की अनुभूति को व्यक्त करने का माध्यम बन गई है।

यहाँ प्रभात का एक दृश्य प्रस्तुत है-

‘गगन से धरा पर सुबह छन रही है, दिये बुझ गए हैं, नयन जल गये हैं, किरण डोर खींचे बिना तन रही है, सपन उठ गये हैं, नयन मिल गये हैं।

हवा देखकर ही सुनाना तराना, सुमन ने कहा पर भ्रमर ने न माना ।’

– वीरेन्द्र मिश्र

उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि नवगीत में प्रकृति का सौन्दर्य एवं वैभव कम नहीं है किन्तु वह मानवीय भावनाओं से सर्वत्र ओत-प्रोत है ।

नारी का चित्रण पूर्ववर्ती गीति-काव्य में प्रेयसी के रूप में ही अधिक हुआ है; जबकि नवगीत में वह सखी, सहचरी, पत्नी एवं अन्य रूपों में भी चित्रित हुई है।

पुरुष और नारी का सम्बन्ध नवगीत में कोरी कल्पना पर आधारित न होकर यथार्थ की भूमि पर है, इसलिए इसमें नारी केवल पूजा की वस्तु न रहकर शारीरिक एवं मानसिक तृप्ति का भी साधन बन गई है।

नारी एवं पुरुष के दैनिक संसर्ग के अनेक चित्र नवगीतकारों ने प्रस्तुत किए हैं, किन्तु उनकी विशेषता यह है कि उनमें चित्रण अत्यन्त संकेतात्मक ढंग से किया गया है जिससे उनमें कहीं भी स्थूलता, शारीरिकता नग्नता या अश्लीलता प्रत्यक्ष नहीं होती, अपितु सम्पूर्ण अनुभूति प्राकृतिक बिम्बों एवं प्रतीकों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में व्यंजित होती है।

इसी प्रकार विरह की अभिव्यंजना भी नवगीत में हुई किन्तु इसका आधार काल्पनिक प्रेयसी न होकर वास्तविक पत्नी है। दूसरे, उसका विरह कल्पना और वेदना के उस व्यापक एवं गम्भीर रूप का भी स्पर्श नहीं करता जोकि छायावाद में दृष्टिगोचर होता है; न तो इसमें विरही की आह से गीत फूटते हैं और न ही उसके अश्रुओं से कोई गंगा बहती है। उनका विरह सीधा, सादा और स्पष्ट है, जो कि जीवन के यथार्थ से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। यहाँ कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-

1. चन्द्रमा उगा करवा चौथ का तुमने भी अर्घ्य दिया होगा मेरे लिए निर्मल उपवास किया होगा मेरे लिए प्रियतम !, परदेश में न सो सका । भरी-भरी आँख ही संजो सका ।              – उमाकान्त मालवीय

2. टूटे आस्तीन का बटन/या कुर्ते के खुले सिवन कदम-कदम पर मौके, तुम्हें याद करने के । फूल नहीं बदले गुलदस्तों के / धूल मेजपोश पर जमी हुई, जहाँ-तहाँ पड़ी दस किताबें, घनी सौ उदासियाँ थमी हुईं ।

यहाँ पत्नी की याद का निरूपण सर्वथा जीवन की वास्तविकता पर आधारित है। यथार्थ रूप में किया गया है जो कि जहाँ छायावादी कवि की दृष्टि नारी के केवल एक ही रूप – प्रेयसी या पत्नी पर ही केन्द्रित थी वहाँ नवगीतकार ने उसके अन्य रूपों को भी लिया है।

इसलिए इनके काव्य में केवल दाम्पत्य जीवन की ही नहीं पारिवारिक जीवन की भी झलक मिलती है।

 डॉ० शान्ति सुमन के शब्दों में – (छायावाद में), आत्मरति के कारण परिवार के अन्य सम्बन्ध क्षीण हो गये थे। छायावादोत्तर काल में परिवार भाव को जागृत करने की चेष्टा हुई। सुख-दुःख के क्षणों में परिवार का महत्त्व महसूस किया गया पर लगातार अस्तित्ववाद, दुःखवाद एवं व्यक्तिवाद के विचलन ने इस सम्बन्ध पर कशा-घात किए । पत्नी-प्रेमिका के सम्बन्ध में द्वन्द्व की स्थिति बनी  रही। नवगीत ने पहली बार पिता, पुत्र, पत्नी, भाई, बहन, माँ तथा अन्य सामाजिक सम्बन्धों का पुर्नसंस्कार किया । सम्बन्ध की इस प्रगाढ़ता को नवगीतकार ने जैसा अप्राण महसूस किया वह पहले की रचनाओं में दुर्लभ है।”

इसके यहाँ कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-

गृहस्थ जीवन :

“माँ की परछाईं-सी लगती गोरी दुबली शाम, पिता सरीखे दिन के माथे चूने लगता धाम ।

उजले-पीले कई-कई संदर्भ सलोने-से टूटी जिद पर गुस्से लगते काँच-खिलौने-से नूपुर पहन बहन का हँसना, फिरना सारा गाम ।।” 

– डॉ० शान्ति सुमन

यहाँ माँ, पिता, बहन से युक्त परिवार की झलक प्रकृति के विभिन्न दृश्यों के माध्यम से प्रस्तुत की गई है।

इसी प्रकार सोम ठाकुर ने बुआ, जीजी आदि का चित्रण भारतीय जीवन के सन्दर्भ में अत्यन्त यथार्थ रूप में किया है-

‘कहाँ गये बड़ी बुआ वाले ने आरते, कहाँ गये गेरू काढ़े सतिये द्वार के, कहाँ गये थापे वे जीजी के हाथों के, कहाँ गये चिकने पत्ते बन्दरवार के ।’

– ‘नवगीत दशक‘

इस प्रकार हम देखते हैं कि नवगीत में भारतीय गार्हस्थ्य एवं पारिवारिक जीवन के विभिन्न दृश्यों का चित्रण आकर्षक रूप में हुआ है जो कि इसके रचयिताओं की व्यापक चेतना का द्योतक है।

नवगीत में सामाजिक-जीवन की विभिन्न स्थितियों, परिस्थितियों, विषमताओं विकृतियों आदि का चित्रण भी यथार्थ रूप में हुआ है। नवगीत में चित्रित समाज सामान्यतः भारतीय मध्य वर्ग से सम्बन्धित है। इसलिए इसमें इस बर्ग की आशाओं, आकांक्षाओं, निराशाओं, कुठाओं एवं विभिन्न विकृतियों का भी चित्रण स्वाभाविक रूप में हुआ है।

आज के मध्यवर्गीय समाज में जीवन की मधुरता की अपेक्षा निराशाजन्य कटुता की ही प्रधानता है। आर्थिक विषमताओं के कारण मध्य वर्ग के सपने प्रायः यथार्थ की धरती से टकराकर चकनाचूर हो जाते हैं। इसी स्थिति का अंकन अलग-अलग कवियों ने किया है; जैसे-

‘घिस गये ज़िंदगी के सारे मनसूबे दफ्तर की सीढ़ी चढ़ते और उतरते ।’

– बालस्वरूप राही

कुछ को चूहे खा गए कुछ को झींगुर चाट गए, नये-नये संकल्पों के/जो भी जाल हमने बुने ।

– कुँअर बेचैन

मध्यमवर्गीय जीवन की विभिन्न स्थितियों के साथ ही महानगरीय जीवन का बोध भी नवगीत में घनीभूत रूप में व्यक्त हुआ है। शहरी जीवन की कृत्रिमता, दिखावटीपन, औपचारिकता, यांत्रिकता, घुटन, संत्रास आदि के सम्बन्ध में, तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त हुई है। यथा-

नगर-जीवन का सर्वांगीण बोध:

“इन ओढ़े हुए मुखौटों पर संशय यह महज औपचारिकता, यह अभिनय जीविका हेतु यान्त्रिकी व्यस्तताएँ अपराध, पतन या नैतिक हत्याएँ

नारे, सभा, जुलूस, प्रदर्शन-क्रोध त्रास, तनाव, यह उत्पीड़क युगबोध।”

– चन्द्रसेन विराट

अजनबीपन :

बाँह से जुड़ती न कोई बाँह जैसे आए हों हम किसी बन्दी शिविर में

–भगवानः स्वरूप

टूटते हुए रिश्ते :

भीड़ से होकर गुजरते हुए रिश्ते मोड़ पर नींबू निचोड़े दूध जैसे फट रहे हैं।

– उमाकान्त मालवीय

नवगीत में सामाजिक चेतना के साथ-साथ आर्थिक वैषम्य एवं राजनैतिक भ्रष्टाचार का भी उ‌द्घाटन अत्यन्त सशक्त रूप में हुआ है। अनेक गीतकारों ने विभिन्न सन्दर्भों में राजनीतिक स्थितियों पर तीखे व्यंग्य किये हैं। यहाँ कुछ उक्तियाँ प्रस्तुत हैं-

चाटुकारिता :

आ गर फिर चारणों के दिन

लोट आये चारणों के दिन सिर धुने चाहें गिरा पछताय फूल क्या, सौगन्ध भी असहाय ।

– उमाकान्त मालवीय

नेताओं के आश्वासन :

बड़े-बड़े आश्वासन हैं। तोता मैना के किस्से । लाठी, गोली, अश्रुगैस/इतना ही जम के हिस्से ।

जनता की भूमिका यही/जूठन से मात कुछ बिने ।

– ‘सुबह रक्त पलाश की‘

बहुमत

भारत के माने है केवल कौरव सभा बहुमत का मतलब / घृतराष्ट्र है।

– ‘सुबह रक्त पलाश की‘

वस्तुतः विभिन्न राजनीतिक स्थितियों की प्रतिक्रिया तीखी आलोचनात्मक एवं व्यंग्यात्मक शैली में व्यक्त करना नवगीतकार के स्वभाव का अंग है। इसलिए उसने आधुनिक राजनीति की विद्रूपताओं का उद्घाटन सशक्त रूप में किया है।

यहाँ तक कि उसने आपातकालीन स्थिति के सम्बन्ध मे भी अन्य वर्ग के कवियों की भाँति मौन की नीति न अपनाकर उसकी भर्त्सना संकेतात्मक ढंग से की है; देखिए-

देहरी मत लाँघ जाना तुम/धूप ने कर्फ्यू लगाया है।

“कल मरे थे बेवजह चार, एक बिन्दी खा गया अखबार” “सत्य क्या है देवता जाने / मरे हैं या हो गये हैं गुम”

धूप ने कर्फ्यू लगाया है।

– मिट्टी बोलती है,’ (रमेश रंजक)

यहाँ आपात्‌काल में पत्र-पत्रिकाओं पर लगे हुए प्रतिबन्ध का चित्रण व्यंग्यात्मक रूप में हुआ है तो साथ ही सत्ताधारी नेताओं के द्वारा जनता पर किए जाने वाले अत्याचारों का भी निरूपण द्रष्टव्य है-

चन्द बुलडोजर, सड़क की पीठ पर तैनात हाँफती-सी, काँपती-सी, आदमी की जात ।

– मिट्टी बोलती है,’ (रमेश रंजक)

इस प्रकार हम देखते हैं कि नवगीतकार की चेतना अत्यन्त व्यापक है; वह जनजीवन की सामान्य स्थितियों से लेकर उच्च वर्ग की विभिन्न असंगतियों, सामाजिक व आर्थिक जीवन की विषमताओं एवं समकालीन राजनीतिक जीवन की विद्रूपताओं का भी उद्घाटन पूर्ण सजगता एवं सशक्तता से करता है।

जहाँ छायावादी कवि लोकजीवन से विमुख हो गया था, प्रगतिवादी कवि एक राजनीतिक दल से जुड़कर शुष्क एवं अनुभूतिशून्य नारों की उद्घोषणा में लीन हो गया था और प्रयोगवादी कवि पाश्चात्य यथार्थवाद, फ्रायडवाद एवं अस्तित्ववाद के रंग में रंगकर स्वदेशीय जीवन की विभिन्न परिस्थितियों एवं परिवेशगत स्थितियों से कटकर उनसे विमुख हो गया था, वहाँ नवगीतकार ने पूर्ण तल्लीनता से अपने युग और समाज की विसंगतियों एवं विकृतियों का उद्घाटन करके अपनी सच्ची आधुनिकता का परिचय दिया है।

इस दृष्टि से निश्चय ही नवगीतकार उपयुक्त तीनों ही वर्गों के कवियों से बहुत आगे है, फिर भी उसकी विशेषता यह है कि इससे उसकी काव्यात्मकता में कहीं भी कोई कमी नहीं आई है- न तो उसकी रचनाओं ने कहीं शुष्क तर्कों का रूप धारण किया है और न ही कहीं बौद्धिक प्रवचनों का।

इसका कारण यह है कि उसकी हर उक्ति उसके आत्मानुभव व्यक्तिगत निरीक्षण एवं संवेदनात्मक संस्पर्श से समन्वित है। उसका बोध यथार्थ की भूमि पर आधारित है। उसकी दृष्टि बौद्धिक है किन्तु वह हृदय की रागात्मकता से शून्य नहीं है। इसीलिए उसकी उक्तियों के साथ सर्वमान्य का साधारणीकरण होता है।

वैचारिक व्यापकता एवं भावात्मक गम्भीरता के साथ-साथ ‘नवगीत’ की अभिव्यंजना-शिल्प एवं शैली सम्बन्धी उपलब्धियाँ भी अप्रतिम हैं। यहाँ इसके कतिपय उद्धरण प्रस्तुत हैं-

(क) आंचलिक शब्दावली:

‘निदिया सतावे मोहे संशही से सजनी ।’

प्रेम बतकही तनकहूँ न भावे ।’

(ख) लोक भाषा का प्रयोग:

‘निमिया की डार में फर-फर फूल झरे।’

(ग) अनुकरणात्मक एवं ध्वन्यात्मक प्रयोग:

‘बदरिया झिमिर-झिमिर-झिम बरसे, जैसे मोतियन लर टूटे ।’

(घ) आधुनिक उपमान:

अधर-अधर को ढूंढ़ रही है, यह भोली मुस्कान, जैसे कोई महानगर में ढूंढे नया मकान ।’

(ङ) सांस्कृतिक संदर्भों पर आधारित उपमान:

‘धूल किसी रावणरथ पर, रोती सोता-सी अम्बर में ।’ ‘चिन्तन की लक्ष्मण-रेखा को, थोड़ा आज लाँघना होगा ।’ ‘लड़ना है अन्याय कंस से ।’

इसी प्रकार नवगीत में विशेषण-विपर्यय एवं विशेषण-वक्रता के द्वारा उसकी लाक्षणिकता एवं व्यंजकता में पर्याप्त वृद्धि की गयी है; यथा- ‘लूले संकल्प’, ‘बीमार यादें’, घिसे हुए मनसूबे’ आदि ।

निष्कर्ष

वस्तुतः ‘नवगीत’ का महत्त्व न केवल बौद्धिकता एवं रागात्मकता, परम्परा एवं आधुनिकता, ग्रामीण एवं आंचलिक जीवन की संवेदना एवं महानगरीय जीवन की संवेदना एवं महानगरीय जीवन का बोध जैसे परस्पर विरोधी समझे जाने वाले तत्वों के समन्वय की दृष्टि से है अपितु व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की विभिन्न विषमताओं, असंगतियों एवं विद्रूपताओं को उद्घाटित करने, की दृष्टि से भी है।

उसमें जहाँ अतीत की स्वस्थ परम्पराओं एवं उसके मूल्यवान दाय के प्रति स्वीकृति का भाव है; वहाँ वर्तमान की विभीषिकाओं एवं विद्रुपताओं के प्रति तीव्र विरोध, आक्रोश एवं विद्रोह की भी भावना परिलक्षित होती है। फिर भी भविष्य के प्रति वह निराश नहीं है- उसका स्वर सर्वत्र आशा, विश्वास एवं आस्था का संचार करता है। इसका यही स्वस्थ एवं व्यापक दृष्टिकोण उसकी काव्य-चेतना को भी एक ऐसा वैशिष्ट्य प्रदान कर देता है जो इस युग के अनेक अन्य काव्यान्दोलनों में सुलभ नहीं है।

अतः, वैचारिक औदात्य, संवेदनात्मक माधुर्य एवं कलात्मक वैभव-इन सभी दृष्टियों से नवगीत को स्वातन्त्र्योत्तर हिंदी  कविता की गौरवपूर्ण उपलब्धि के रूप में स्वीकार किया जा सकता है – इसमें कोई सन्देह नहीं।

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