हिंदी नवगीत का उद्भव और विकास | Hindi Navgeet Ka Udbhav Aur Vikas

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Hindi Navgit Ka Udbhav Aur Vikas

समकालीन हिंदी कविता में नवगीत की अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान है। ‘नई कविता’, ‘नई कहानी’ और ‘नई आलोचना’ की तर्ज पर ‘नवगीत’ का उदय 1948-50 ई. के आसपास हुआ। इसे नयागीत, प्रगीत, अगीत, कबीरगीत, लोकगीत इत्यादि विविधि नामों से भी अभिहित किया गया है। इस लेख में हम Hindi Navgit Ka Udbhav Aur Vikas का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।

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काव्य प्रयोजन | Kavya Prayojan | भारतीय काव्यशास्त्र | Bhartiya Kavyashastra

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Kavya Prayojan

किसी भी कार्य को करने के पीछे उसके कर्त्ता का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है । इसी प्रकार काव्य की रचना करने के पीछे उसके सर्जक का या कवि का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है । यही उद्देश्य काव्य का प्रयोजन कहलाता है और इसी से प्रेरित होकर वह काव्य लिखता है। Bhartiya Kavyashastra के अंतर्गत आज हम Kavya Prayojan को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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काव्य हेतु | भारतीय काव्यशास्त्र | Kavya Hetu | Bhartiya Kavyashastra | Bharteeya Kavyashastra

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Kavya Hetu

किसी भी वस्तु के निर्माण के लिए कुछ आवश्यक साधन ज़रूरी होते हैं, जिनके अभाव में उस वस्तु का सृजन संभव नहीं हो सकता। जिन साधनों या कारणों से वस्तु का निर्माण होता है, वस्तुतः ये साधन (हेतु) कहलाते हैं। काव्य या साहित्य की सर्जना के लिए कुछ आवश्यक कारण (हेतु) होते हैं । आज हम भारतीय काव्यशास्त्र के अंतर्गत Kavya Hetu को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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काव्य के लक्षण |भारतीय काव्यशास्त्र | Kavya ke Lakshan | Bhartiya Kavyashastra |Bharteeya Kavyashastra

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Kavya ke Lakshan

संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य के लक्षण पर पर्याप्त विचार-विमर्श हुआ है, जिससे विभिन्न काव्य सम्प्रदायों का विकास हुआ और काव्य के प्रमुख तत्वों की चर्चा करते हुए काव्य का लक्षण निर्धारित करने का प्रयास किया गया। आज काम Kavya ke Lakshan को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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डॉ. नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि | Dr Namvar Singh Ki Alochana Drishti

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Dr Namvar Singh Ki Alochana Drishti

डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह ने शुक्ल-द्विवेदी विवाद को दूसरी पीढ़ी तक ले जाने और उसे जारी रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । दोनों ही प्रगतिवादी या मार्क्सवादी आलोचक हैं और दोनों की यह समान विशेषता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को रूढ़ि के रूप में स्वीकार कारण के बजाए उदार प्रगतिशील चेतना को लेकर हिंदी आलोचना को एक नया आयाम दिया । आज के इस लेख में हम Dr Namvar Singh Ki Alochana Drishti को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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कॉलरिज का कल्पना सिद्धान्त | Coleridge Ka Kalpana Siddhant

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Coleridge Ka Kalpana Siddhant

कॉलरिज का पूरा नाम सैमुअल टेलर कॉलरिज (Samuel Taylor Coleridge) है। इनका जन्म 21 अक्टूबर 1772 में इंग्लैंड के सेंट मेरी नामक स्थल पर हुआ । इस लेख के माध्यम से हम आज Coleridge Ka Kalpana Siddhant को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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शुक्ल युगीन हिंदी आलोचना | Shukla Yugin Hindi Alochana

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shukla yugin hindi alochana

वास्तव में हिंदी आलोचना का पूर्ण रूप शुक्ल युग  में ही निखर पाया और इसका श्रेय इस युग के प्रमुख आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल को है। आज के इस लेख में हम Shukla Yugin Hindi Alochana को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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काव्य का स्वरूप | Kavya Ka Swarup

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kavya ka swarup

कवि की रचना को काव्य कहते हैं। कवि जीवन और जगत् की अनुभूति को शब्द और अर्थ के सामञ्जस्य का आधार लेकर अपनी प्रतिभा के बल पर रमणीय, रसात्मक और आह्लादकारी बनाकर प्रस्तुत करता है। उसकी पुनः सृष्टि करता है। उसकी यह अभिनव सृष्टि ही काव्य है। आज इस लेख में हम Kavya Ka Swarup का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।

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सन्त काव्यधारा के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ |Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen

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Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen

‘भक्ति’ का उल्लेख सर्वप्रथम श्वेताश्वेतर उपनिषद में मिलता है । मोनियर विलियम्स के अनुसार ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘भज’ धातु से हुई है । भक्ति का उदय दक्षिण में हुआ । इस लेख में हम आज Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen का अध्ययन करेंगे ।

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टी.एस.इलियट की परम्परा की अवधारणा | T S Eliot Ki Parampara Ki Avadharna

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t s eliot ki parampara ki avadharna

आधुनिक काल के पाश्चात्य समीक्षकों में टी.एस.इलियट (1888-1965 ई.) का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनका जन्म सेन्ट लुई (अमेरिका) में हुआ, किन्तु शिक्षा पेरिस और लंदन में हुई । बाद में वे लंदन में बस गए । वे बीसवीं सदी के महान कवियों और आलोचकों में गिने जाते हैं। उन्हें 1948 ई. में साहित्य का … Read more

द्विवेदीयुगीन हिंदी आलोचना | Dwivediyugin Hindi Alochana

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dwivediyugin hindi alochana

हिंदी आलोचना को विकसित करने में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान सराहनीय है। उन्हीं का अनुसरण करते हुए द्विवेदी युग के अन्य लेखक भी आलोचना की ओर अग्रसर हुए। आज हम Dwivediyugin Hindi Alochana को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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भारतेन्दुयुगीन हिंदी आलोचना | Bhartenduyugin Hindi Alochana

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bhartenduyugin hindi alochana

वर्तमान युग में ‘आलोचना’ नामक विधा का तीव्र गति से विकास हुआ है । आलोचना का वास्तविक उद्भव संस्कृत की काव्यशास्त्रीय परंपरा में मिलता है , किन्तु हिंदी में भारतेन्दु युग से ही हिंदी आलोचना का सूत्रपात मिलता है । भारतेन्दु ने ‘नाटक’ नामक सर्वप्रथम आलोचनात्मक ग्रंथ लिखा। आज हम Bhartenduyugin Hindi Alochana का विस्तार से अध्ययन करेंगे और इसे समझने का प्रयास करेंगे ।

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किशोरावस्था की समस्याएं और उनका समाधान | Kishorawastha ki Samasyaen aur Unka samadhan

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kishorawastha ki samsyaen aur unka samadhan

किशोरावस्था जीवन का वह पड़ाव है जहाँ बचपन धीरे-धीरे पीछे छूटता जाता है और युवावस्था की आहट सुनाई देने लगती है। यह केवल उम्र का बदलाव नहीं होता, बल्कि सोच, शरीर, भावनाओं और सपनों का भी नया जन्म होता है।

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सिद्ध साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ । Siddha Sahitya Ki Pramukh Visheshataen  

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adikalin siddha sahitya ki pramukh visheshataen

वज्रयानी-परंपरा के सिद्धाचार्यों की वे रचनाएँ, जो दोहा तथा चर्यापदों के रूप में उपलब्ध हैं और जिनमें बौद्ध तांत्रिक मान्यताओं को वाणी मिली है, ‘सिद्ध-साहित्य’ है। सिद्ध-साहित्य बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के प्रचार हेतु रचा गया था।

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डॉ.रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि | Dr Ramvilas Sharma ki Alochana Drishti

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Dr Ramvilas Sharma ki Alochana Drishti

आज हम मार्क्सवादी आलोचना के शिखर-पुरुष डॉ.रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि पर विचार करेंगे । उन्होंने हिंदी की मार्क्सवादी  आलोचना में ‘हिंदी जाति’, ‘हिंदी जाति की सांस्कृतिक चेतना’, ‘भाषा-समाज-संस्कृति-साहित्य’, ‘हिंदी नवजागरण’ जैसी अनेक नवीन अवधारणाओं पर नया चिंतन प्रस्तुत किया है। तो आइए अब Dr Ramvilas Sharma ki Alochana Drishti को विस्तार से समझने का प्रयास करें ।

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आई ए रिचर्ड्स का व्यावहारिक (समीक्षा) सिद्धांत | I A Richards ka vyavaharik samiksha siddhant

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I. A. Richards ka vyavaharik samiksha siddhant

1929 ई. में आई.ए.रिचर्ड्स का ‘प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म’ ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। इसे हिंदी में व्यावहारिक आलोचना (समीक्षा) कहते हैं। I. A. Richards ka vyavaharik samiksha siddhant को समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें ।

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समकालीन कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ | Samkalin Kavita ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen

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samkalin kavita ki pramukh pravrittiyan aur visheshtyaen

‘समकालीन’ शब्द अंग्रेजी के ‘contemporary’ का पर्याय है तथा ‘समसामयिक’ का अर्थ बोधक है । इससे प्रतीत होता है कि समकालीन कविता समसामयिक संदर्भों से संबद्ध है । साथ ही, इसे युग-विशेष के संदर्भों के अनुसार बदली हुई चेतना या मानसिकता का द्योतक माना जाता है ।

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जनवादी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ | Janvadi Kavita ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen

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Janvadi Kavita ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen

जनवादी कविता से आशय एक विशेष दौर की कविताओं से है जिनमें जनता के प्रति प्रतिबद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। जनता के प्रति यही प्रतिबद्धता जनवादी कविता को क्रांतिधर्मी चेतना से लैस करती है। इस विशेष दौर की कविता का नामकरण चीन की जनवादी क्रांति की प्रेरणा पर की गई क्योंकि माओवादी विचारधारा इस काव्यांदोलन के वैचारिक आधार को निर्मित करती है। यह प्रगतिवादी काव्यांदोलन की तार्किक परिणति है, फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ पर वैचारिक प्रतिबद्धता का आग्रह नहीं है। आज हम Janvadi Kavita ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen को विस्तार से समझने और उसका विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे ।

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आलोचना के प्रकार |alochana ke prakar |आलोचना के भेद | alochana ke bhed

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alochana ke prakar

किसी साहित्यिक रचना की सम्यक् परीक्षा करना, उसके गुण-दोषों का उद्घाटन करना आलोचना है । आज हम alochana ke prakar या alochana ke bhed को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

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