आलोचक के गुण | Alochak ke Gun

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आलोचना शब्द का प्रयोग किसी कृति के गुण-दोषों के विवेचन के लिए किया जाता है । सामान्यत: आलोचना का अर्थ लोग दोषदर्शन से ही लेते हैं, किन्तु आलोचना के व्युत्पत्तिपरक अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आलोचना का अभिप्राय गुण और दोष दोनों पर प्रकाश डालना है । आलोचना को समालोचना अथवा समीक्षा भी कहते हैं । इस लेख में हम एक अच्छे Alochak ke Gun को समझने का प्रयास करेंगे कि एक अच्छे आलोचक में कौन-कौन से गुण अपेक्षित होते हैं ।

अर्थात् किसी साहित्यिक रचना की सम्यक परीक्षा करना, उसके गुण-दोषों का उद्घाटन करना ही आलोचना है।

आलोचना का स्वरूप और कार्य

आलोचना के स्वरूप और कार्य को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है :

  • 1. आलोचना किसी रचना के गुण-दोषों का उद्घाटन करती है ।
  • 2. आलोचना के द्वारा रचना का मूल्यांकन किया जाता है ।
  • 3. आलोचना के द्वारा रचना की व्याख्या की जाती है और मन पर पड़े प्रभावों को व्यक्त किया जाता है ।
  • 4. आलोचना रचना का भावन (भावों को समझकर) या शंसन (प्रशंसा करना, मंगल कामना करना, पाठ करना) करके कृतिकार के उद्देशय को स्पष्ट करती है ।

आलोचक के गुण

आलोचक का कार्य काव्यास्वादन में पाठक की सहायता करना, कृति के गुण-दोषों का विवेचन करना और संयत आलोचना द्वारा कवि का पथ प्रशस्त करना है। नीर-क्षीर विवेक से युक्त आलोचक का कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं श्रमसाध्य होता है। विवेकपूर्ण आलोचना ही पाठकों का सहज पथ प्रदर्शन करती है। सम्यक् आलोचना करने के लिए आलोचक में कुछ गुणों का होना अत्यन्त आवश्यक है जिनका विवेचन यहाँ किया जा रहा है:

सहृदयता

आलोचक में जब तक सहृदयता का गुण नहीं होगा तब तक वह वाक्य के मर्म को समझ नहीं सकेगा। आचार्य राजशेखर ने आलोचक में ‘भावयित्री प्रतिभा’ का होना आवश्यक माना है। उनके अनुसार आहृदय पाठक या आलोचक में भावयित्री प्रतिभा होती है । यह प्रतिभा उसे सहृदय बनाती है और कवि के साथ तादात्म्य स्थापित करने में सहायता देती है। सहृदय आलोचक काव्य के मर्म को समझकर उसे सुधी पाठकों तक पहुँचाता है।

आचार्य राजशेखर के अनुसार प्रतिभा के दो भेद होते हैं : 1.कारयित्री और 2. भावयित्री । कारयित्री प्रतिभा जन्मजात होती है तथा इसका संबंध कवि से है । भावयित्री प्रतिभा का संबंध सहृदय पाठक या आलोचक से है ।

तुलसी के रामचरितमानस को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसा सहृदय समीक्षक ही अपेक्षित था जो उसे समझकर पाठकों तक उसके गुण-दोष पहुँचा पाने में समर्थ हो सका है।

निष्पक्षता

आलोचक को सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए तथा निष्पक्ष आलोचना करनी चाहिए। अनावश्यक निन्दा एवं अनावश्यक प्रशंसा से आलोचक को बचना चाहिए। भावना के प्रवाह में बहकर अथवा ईर्ष्या-द्वेष से युक्त होकर आलोचना नहीं करनी चाहिए।

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के अनुसार- “मित्रता के कारण किसी की पुस्तक की अनुचित प्रशंसा करना विज्ञापन करने के सिवाय और कुछ नहीं। ईर्ष्या, द्वेष अथवा शत्रुभाव के वशीभूत होकर किसी की कृति में अमूलक दोषोद्भावना करना उससे भी बुरा काम है।”

सहज प्रतिभा

आलोचक को प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति होना चाहिए। काव्य एवं शास्त्र के गूढ़ अध्ययन के साथ-साथ उसमें नीर-क्षीर विवेक करने की प्रतिभा होनी परम आवश्यक है।

‘बिहारी सतसई’ को समझ पाना सामान्य पाठक के लिए तब तक संभव नहीं हो सकता जब तक लाला भगवानदीन और जगन्नाथ दस रत्नाकर जैसे प्रतिभा सम्पन्न आलोचकों की टीकाओं की सहायता न ली गई हो ।

आलोचक की पर्यवेक्षण शक्ति सूक्ष्म होती है, वह विषय का मर्मज्ञ होने के साथ-साथ शास्त्रीय ज्ञान से सम्पन्न भी होता है साथ ही भावयित्री प्रतिभा से सम्पन्न होने के कारण काव्य को समझ सकने की शक्ति भी उसमें औरों की अपेक्षा अधिक होती है। रचना के मर्म को वह अपनी सहज प्रतिभा से समझकर पाठकों के समक्ष उसके सौन्दर्य को उद्घाटित करता है।

विस्तृत ज्ञान

आलोचक को जब तक विषय का व्यापक एवं गम्भीर ज्ञान नहीं होगा तब तक वह विषय के मर्म से पाठकों को परिचित नहीं करा सकता।

वस्तुतः उसे बहुज्ञ होना चाहिए। साहित्य के आलोचक को समाजशास्त्र, काव्यशास्त्र, कामशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, इतिहास, दर्शन, ज्योतिष, मनोविज्ञान की जानकारी जब तक नहीं होगी तब तक वह काव्य की सम्यक् समीक्षा नहीं कर सकता।

लोकजीवन की परम्पराओं का ज्ञान उसे अवश्य होना चाहिए। अन्यथा काव्य में वर्णित ऐसे प्रसंगों की व्याख्या करने में वह सक्षम नहीं हो सकता। इस प्रकार एक समर्थ समीक्षक को लोक, शास्त्र एवं आलोच्य विषय में पारंगत होना परम आवश्यक है।

अभिव्यंजना कौशल 

जब तक आलोचक के पास समर्थ भाषा नहीं होती तब तक वह कृति की सम्यक् समीक्षा नहीं कर सकता। अपने हृदय पर पड़े प्रभावों की अभिव्यंजना कर पाना आलोचक का अनिवार्य गुण है। यह कार्य वह तभी कर सकता है जब उसके पास अभिव्यंजना कौशल हो।

(अभिव्यंजना = विचारों और भावों को प्रकट करना)

सूक्ष्म, सांकेतिक, संयत, प्रौढ़ भाषा का प्रयोग करते हुए ही वह किसी कृति की सम्यक् समीक्षा कर पाएगा। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को आलोचना में जो सफलता मिली उसके पीछे उनका अभिव्यंजना कौशल ही था।

निष्कर्ष

आलोचक की रुचि परिष्कृत होनी चाहिए साथ ही उसमें सत्य को व्यक्त करने का साहस भी होना चाहिए। वचन माधुरी, व्यंग्य निपुणता, निर्णय करने की शक्ति, अदम्य साहस एवं निर्भीकता एक श्रेष्ठ आलोचक के अन्य गुण बताए गए हैं।

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