आई ए रिचर्ड्स का व्यावहारिक (समीक्षा) सिद्धांत | I A Richards ka vyavaharik samiksha siddhant

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1929 ई. में आई.ए.रिचर्ड्स का ‘प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म’ ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। इसे हिंदी में व्यावहारिक आलोचना (समीक्षा) कहते हैं। I. A. Richards ka vyavaharik samiksha siddhant को समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़ें । इसके संबंध में और भी विस्तार से समझने के लिए इसके लेख के साथ संलग्न वीडियो भी अवश्य देखें ।

इस ग्रन्थ की रचना के पीछे तीन उद्देश्य हैं:

  • 1. समकालीन सांस्कृतिक स्थिति में अभिरुचि रखने वाले आलोचकों, दार्शनिकों, शिक्षकों, मनोविज्ञानियों या जिज्ञासुओं के लिए एक नए ढंग का संलेखन (documentation) प्रस्तुत करना।
  • 2. वैसे लोगों को आलोचना की एक नई प्रविधि (technique) देना जो स्वयं इस बात की मीमांसा करना चाहते है कि काव्य के संबंध में वे क्या सोचते-विचारते हैं और किसी काव्य को वे ‘पसंद या नापसंद’ करें तो क्यों ?
  • 3. शैक्षिक प्रणालियों का एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करना जो प्रचलित जो प्रचलित प्रणालियों से अधिक उपयुक्त हो। साथ ही, हम जो सुनते तथा पढ़ते हैं, उसके बोध एवं विवेचन को विकसित करने में सहायक हो ।

तात्पर्य यह है कि सांस्कृतिक, वैचारिक तथा शैक्षिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रिचर्ड्स ने इस ग्रन्थ की रचना की थी।

रिचर्ड्स के अनुसार इस ग्रन्थ का प्रमुख प्रयोजन है – काव्य का तथा उन साधनों का निरूपण करना जो काव्य के मूल्याँकन के लिए अपेक्षित है। वे लिखते हैं “काव्य स्वयं संप्रेषण का एक प्रकार है। वह किस वस्तु का कैसे संप्रेषण करता है और संप्रेषित वस्तु का क्या मूल्य है, यही देखना आलोचना का विषय है।” वे आगे लिखते हैं- “सभी आलोचनात्मक प्रयासों, सारी व्याख्या, परिशंसन (apreciation), प्रबोधन (exhortation) का एक और एकमात्र लक्ष्य संप्रेषण में सुधार लाना है।”

*निरूपण का अर्थ है = विवेचना करना, अच्छी तरह से समझाना, निर्णय करना।

उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि व्यावहारिक आलोचना एक तरह से संप्रेषण सम्बन्धी मान्यताओं के समर्थन का प्रयोग है । इसमें उन्होंने यह दिखाने का प्रयत्न किया है कि सम्प्रेषण की सफलता किन कारणों से बाधित होती है।

चूँकि मुख्य रूप से संप्रेषण का निरूपण ही आलोचना का मेरुदण्ड है, अतः संप्रेषण सम्बन्धी कठिनाइयों को दूर करने के लिए रिचर्ड्स ने आलोचक और आलोचना के सन्दर्भ में अपना मत व्यक्त किया है।

आलोचक –  आलोचक का कार्य है काव्य का बोध प्राप्त करना और उसका मूल्याँकन करना। किसी रचना को अच्छी तरह समझने के लिए आलोचक को चाहिए कि वह रचना को उसके वास्तविक रूप में देखे (he should know how to read poetry) और ऐसी मानसिक दशा उत्पन्न करे जो रचना के अनुकूल हो।

इसके लिए रिचर्ड्स ने एक विस्तृत प्रक्रिया निश्चित की है। उनका कहना है किसी रचना के अर्थ में होती तो कई धाराएँ हैं पर उनमें से चार महत्त्वपूर्ण होती है :

मुख्यार्थ (Sense) 

मुख्यार्थ को ही अभिधेय कह सकते हैं जो किसी रचना में शब्दों द्वारा कहा जाता है। हम शब्दों द्वारा पाठक का ध्यान किसी वस्तुस्थिति की ओर आकर्षित करते हैं, कुछ बातें इसलिए कहते हैं कि वह उन पर मनन करे और उसके सम्बन्ध में उसके विचार उत्तेजित हों। इसे ही आशय कहते हैं।

वैज्ञानिक लेखों में आशय अधिक महत्त्वपूर्ण होता है किन्तु काव्य में उनका महत्त्व गौण होता है और भावनाप्रधान कविता में वह बहुत ही कम हो जाता है। बच्चों को सुनाने के लिए जो लोरियाँ रची जाती हैं और जिन्हें नर्सरी गीत कहते हैं इसी प्रकार की रचनाएँ है। इनमें आशय बहुत कम होता है।

अर्थ तत्त्व के सम्बन्ध में रिचर्ड्स का कहना है कि काव्य में अर्थतत्त्व शब्द के चमत्कार से पूर्ण होने के कारण अलंकृत रूप धारण करता है और अर्थव्यंजना का समावेश हो जाता है। वह अर्थ, कल्पना और अनुभूति को सजग करता चलता है। व्यंग्यार्थ काव्य में प्रधान हो जाता है, अतः शब्दों के सामान्य अर्थों से काम नहीं चलता।

भावना या कल्पना (Feelings)

भावना और कल्पना तो काव्य में प्रमुखतया रहते हैं। काव्य में कल्पना और अनुभूति का माध्यम होने से अर्थतत्त्व या मुख्यार्थ भी प्रभावित होता है।

अलंकारों में रुपक, उपमा, उत्प्रेक्षा, अतिशयोक्ति आदि कल्पना प्रेरित होते हैं। इसलिए काव्य के शब्द विधान में वाक्यरचना और शब्द-क्रम का व्याकरणिक महत्त्व नहीं रहता।

आलोचक को अर्थग्रहण करने के लिए अपने अनुभव का सहारा लेना पड़ता है। प्रसंग, परम्परा और प्रयोग के आधार पर हम काव्यगत अभिव्यक्ति के सौन्दर्य का मूल्याँकन कर सकते हैं। इसके बिना यह संभव नहीं है ।

काव्यगत अर्थ, सामान्य अर्थ से भिन्न होता है क्योंकि इस अर्थ में भाव और कल्पना का समावेश होता है।  काव्य में संगीत, चित्रकला और मनोविज्ञान की विशेषताएँ पाई जाती हैं। यह विशेषता विज्ञान आदि विषयों में नहीं होती। गणित में तो भाव होता ही नहीं।

ध्वनि या वचन-भंगी (Tone)

जिस प्रकार के पाठक या श्रोता होते हैं लेखक अनजाने या जानबूझकर उसी प्रकार की भाषा का प्रयोग करता है (He chooses or arranges the words differently as his audience varies)। इसे ही वचन-भंगी या ध्वनि कहते हैं। ग्रे और ड्राइडन की कविता में यह ध्वनि पर्याप्त मिलती है जिसके कारण उनकी कृतियाँ आकर्षक हो उठी हैं।

उद्देश्य

उद्देश्य से अभिप्राय काव्य का वह प्रभाव, जो शब्दों द्वारा लेखक अपने पाठकों या श्रोताओं पर डालना चाहता है । प्रत्येक रचना का कोई-न-कोई उद्देश्य होता है । इस उद्देश्य के कारण ही काव्य की भाषा नियंत्रित होती है। इस उद्देश्य को समझ लेना किसी रचना को समझने के लिए अत्यधिक आवश्यक है। इस उद्देश्य को भूलने से अनेक वितर्क पैदा होते हैं।

विभिन्न प्रकार की अभिव्यक्तियों में इन तत्त्वों की कमी या अधिकता देखी जा सकती है। एक वैज्ञानिक रचना के लिए अर्थतत्त्व या मुख्यार्थ ही सर्वोपरि महत्त्व का है। उसका कल्पना और ध्वनि से कोई सम्बन्ध नहीं है। हाँ उद्देश्य अवश्य उसके अर्थ का पथप्रदर्शन करता है।

किन्तु एक साहित्यकार और वक्ता के लिए भावना या कल्पना का तत्त्व महत्त्वपूर्ण है। कविता में रमणीयता के लिए ध्वनि या वचनभंगी (tone) का ही सहारा लेना पड़ता है। उपदेशात्मक कथनों में उद्देश्य प्रधान होता है। इस प्रकार विभिन्न अभिव्यक्तियों की प्रकृति के अनुसार उक्त चारों तत्त्वों की प्रधानता या उनकी अपेक्षा रहती है।

काव्य में उक्त चारों तत्त्वों का सामंजस्यपूर्ण समन्वय रहता है। काव्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में सभी तत्त्व विद्यमान नहीं रहते। विज्ञान और दर्शन में अर्थ और बुद्धितत्त्व की ही प्रधानता रहती है, कभी-कभी कल्पना का भी समावेश हो जाता है।

शास्त्रीय, धार्मिक और नैतिक विषयों में भी यही बात देखी जाती है। अतः वह काव्य ही है जिसमें चारों तत्त्वों का प्रभावपूर्ण सम्मिश्रण देखा जाता है। अतः सभी उक्तियों में काव्योक्ति को ही महत्त्वपूर्ण माना गया है।

आलोचना की संप्रेषण सम्बन्धी कठिनाईयाँ

व्यावहारिक आलोचना की संप्रेषण सम्बन्धी कठिनाईयाँ निम्नलिखित हैं :

सामान्य अर्थबोध की कठिनाई

  1. साधारण से लेकर अच्छे काव्य-पाठक तक इस कठिनाई से मुक्त नहीं हैं। यही नहीं, वे बार-बार अर्थबोध में असफल रहते हैं।

किसी भी कविता का यथार्थ तात्पर्य ग्रहण करना आवश्यक है। अधिकांश आलोचक कविता का अर्थ या तात्पर्य नहीं समझ पाते। जब काव्य का अर्थबोध ही कठिन है तो वहाँ भावना (feeling), वचनभंगी (tone) और उद्देश्य (intention) के ग्रहण में भूल होना स्वाभाविक है।

किसी भी समीक्षा के लिए काव्य का अर्थबोध या अर्थज्ञान तो प्रारंभिक आवश्यकता है। किन्तु इस कठिनाई से कोई बरी नहीं है न तो प्रसिद्ध विद्वान और न सरलकाव्य।

ऐन्द्रिक प्रभाव के ग्रहण की कठिनाई (difficulties of sensual apreciation)

  1. दूसरी कठिनाई है कविता के ऐन्द्रिक प्रभाव के ग्रहण की। यह तथ्य है कि कविता में शब्दों का क्रम गद्य के शब्दक्रम से भिन्न होता है और कविता का एक लयात्मक या ध्वन्यात्मक प्रभाव होता है।

इस प्रभाव को ग्रहण करने के लिए हमारी श्रवणशक्ति की योग्यता आवश्यक है। यदि आलोचक में लयात्मक संस्कार नहीं है तो वह काव्य के लयात्मक प्रभाव को नहीं समझ सकता। जो सहृदय और संवेदनशील आलोचक हैं उनके लिए तो इसका ग्रहण सुकर होता है और जो वैसे नहीं है उनके लिए दुष्कर होता है।

बिम्बविधान (imagery) की कठिनाई

तीसरी कठिनाई है बिम्बविधान की। इसका सम्बन्ध चाक्षुष बिम्बविधान (visual imagery) से है। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि एक व्यक्ति के मन में जो बिम्बविधान (imagery) जाग्रत होता है वह बिल्कुल उसी रूप में दूसरे व्यक्ति के मन में जाग्रत नहीं होता, और हो भी नहीं सकता। आलोचना में अंतर का यह एक जबर्दस्त कारण है।

असंगत स्मृतियाँ (memoric irrelevances)

आलोचना पर इसका भी व्यापक प्रभाव पड़ता है। काव्य पढ़ते समय बहुत बार ऐसा होता है कि अतीत का कोई व्यक्तिगत दृश्य या घटना, साहचर्य या भाव मन में उपस्थित होकर काव्य की रसानुभूति में विघ्न डालने लगता है।

तात्पर्य यह है कि बहुत बार काव्य के आस्वाद में अप्रासंगिक स्मृतियाँ विघ्न डालती हैं जिसके परिणामस्वरूप अर्थभंग हो जाता है। इसमें किसी मिलती-जुलती पहले पढ़ी हुई रचना की स्मृति सहसा जाग्रत हो जाए तो अर्थग्रहण में कठिनाई होती है।

घिसी-पिटी अनुक्रियाएँ (stock responses)

ये अर्थग्रहण में तब कठिनाई उत्पन्न करती हैं जब रचना में ऐसे भावों और विचारों का समावेश होता है जो आलोचक के मन में पहले से ही पूरी तरह विद्यमान हैं।

उदाहरण के लिए धर्म के सम्बन्ध में प्रत्येक व्यक्ति की निजी धारणाएँ हैं।  उनसे मेल नहीं खाने वाला काव्य जब सामने आता है तो काव्य के अर्थ तक पहुँचने में रुकावट होती है। ऐसी स्थिति में काव्य के अर्थ के बदले हम अपने मत को ही काव्य का अर्थ मान लेते हैं जो उस काव्य से सर्वथा भिन्न है।

अति भावुकता (sentimentality)

आलोचना के क्षेत्र में अति भावुकता एक बहुत बड़ी कठिनाई है। अति भावुकता के कारण ही अनेक रचनाओं का हम ठीक-ठीक अर्थ ग्रहण नहीं कर पाते।

भावुकता के अतिरेक से मानसिक संतुलन ठीक नहीं रहता जिसका प्रभाव आलोचना पर पड़ता है। इस भावुकता के कारण निश्चित ही रचना में या तो हम ऐसी अच्छाईयाँ देखने लगते हैं जो उसमें हैं नहीं या हम प्रसंग से पूर्णतया बहक जाते हैं।

अवरोध (inhibition) या निरोध

यह भावुकता का विलोम है। जहाँ भावुकता में मन अनायास द्रवित हो जाता है वहाँ अवरोध में प्रयास करने पर भी मन द्रवित नहीं होता, अड़ियल घोड़े की तरह अपनी जगह से डिगता नहीं।

ये आलोचक अरसिक होते हैं जो कवि के उत्साह पर पानी फेर देते हैं। अतः समीक्षा में इस अरसिकता की स्थिति से भी सावधान रहने की आवश्यकता है। संस्कृत के आलंकारिकों ने वृद्ध मीमांसकों, वैयाकरणों  आदि को इसी अरसिक श्रेणी में रखा गया है।

सैद्धान्तिक आग्रह (doctrinal adhesion)

किसी विशेष सम्प्रदाय, धर्म या दर्शन में आस्था भी अर्थग्रहण में बाधा पहुँचाती है। उदाहरण के लिए यदि हम कृष्णभक्त हैं तो कृष्ण काव्य प्रिय लगेगा, चाहे वह भले ही काव्य की दृष्टि से हीन हो। अतः हम उसका मूल्याँकन नहीं कर पाएँगे। अधिकतर धार्मिक काव्यों के मूल्याँकन में यही कठिनाई होती है। इससे मूल्याँकन अस्त-व्यस्त हो जाता है।

प्राविधिक पूर्वकल्पनाएँ (technical presuppositions)

प्राविधिक अर्थात् रचना कौशल सम्बन्धी पूर्व कल्पनाएँ भी अर्थग्रहण करने में बाधक होती हैं। यह संप्रेषण की सफलता में भी बाधक है।

किसी आलोचक को कोई प्रविधि या रचना कौशल रुचिकर प्रतीत हुई तो हम चाहते हैं कि आगे भी वह उसी रूप में काम में लायी जाय। इसी प्रकार जब हम किसी काव्यरूप को विफल होते देखते हैं, तो नहीं चाहते कि वह पुनः प्रयुक्त हो। यदि कोई लेखक उसी काव्यरूप का सफलतापूर्वक प्रयोग करता है तो हम इस पूर्वाग्रह के कारण ही उसे मान्यता नहीं देते, उसकी प्रशंसा नहीं करते।

रिचर्ड्स का मानना है कि हम इस प्रकार साधन को साध्य की अपेक्षा अधिक महत्त्व दे डालते हैं। तात्पर्य यह है कि रचनाकौशल सम्बन्धी पूर्व कल्पनाओं के कारण सुन्दर रचनाओं के प्रति भी उदासीनता दिखाई जाती है।

सामान्य आलोचनात्मक पूर्वग्रह (general critical preconceptions)

कुछ सिद्धान्त आलोचकों के मन में न जाने कब किधर से घर कर लेते हैं, जैसे-कविता में गाम्भीर्य होना चाहिए व कविता संदेश देने वाली हो, कविता विचारोत्तेक हो, कविता आनंद प्रदान करने वाली हो, काव्य का मूल्य ऐसा होना चाहिए आदि ‘सामान्य आलोचनात्मक पूर्वग्रह’ अर्थग्रहण में बाधक होती हैं।

रिचर्डस आलोचक को परामर्श देते हैं कि वह इन सब धारणाओं से दूर रहे, तभी तटस्थ आलोचना संभव है।

रिचर्ड्स के अनुसार किसी कृति के मूल्याँकन में ये दस प्रमुख बाधाएँ या कठिनाईयाँ हैं जो व्यावहारिक आलोचना के क्षेत्र में उपस्थित होती हैं।

व्याख्या और आलोचना में अन्तर

व्यावहारिक समीक्षा के प्रसंग में ही रिचर्ड्स ने व्याख्या और आलोचना में अन्तर बताते हुए निम्नलिखित बातों पर ध्यान देने को कहा है :

  • 1. व्याख्या ग्रहणशील होती है जबकि आलोचना क्रियाशील होती है, वह मूल्याँकन करती है, मानदण्ड निर्धारित करती है।
  • 2. व्याख्या में प्रायः तुलना नहीं होती, आलोचना में तुलना बराबर रहती है। आलोचना यह बताती है कि एक कृति की श्रेष्ठता या हीनता का निर्णय करना आलोचना व्यापार का मुख्य अंग है।
  • 3. व्याख्याता साहित्यकार की चित्रसृष्टि का पुनर्निर्माण करता है, उस पर निर्णय नहीं देता, जबकि आलोचक उस चित्रसृष्टि पर निर्णय भी देता है।
  • 4. व्याख्या आलोचना से पहले की चीज है। आलोचक पहले रचना को पढ़ता है, फिर उसे ध्यान में रखता है और तब उसके गुण-दोषों पर अपना निर्णय देता है, जबकि व्याख्याता किसी कृति में गहराई तक प्रवेश कर जाता है।  

निष्कर्ष

रिचर्ड्स संप्रेषण को आलोचना का चरम लक्ष्य मानते हैं। उनके अनुसार मूल्य क्या है? और वह संप्रेषण में कितना सफल और प्रभावशाली है। वे अतिरंजना 9 अतिशयोक्ति) की आशंका को स्वीकार करते हुए भी कहते हैं कि सभी आलोचनात्मक प्रयासों का एक और एकमात्र उद्देश्य संप्रेषण में सुधार लाना है।

प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)


प्रश्न 1. आई ए रिचर्ड्स का मूल्य सिद्धांत क्या है?

उत्तर : आई ए रिचर्ड्स के मूल्य सिद्धांत की मूल मान्यताएं निम्नानुसार हैं :
1. ऐसी कोई भी वस्तु मूल्यवान है जो समान या महत्वपूर्ण इच्छा को कुंठित किए बिना किसी इच्छा को तुष्ट करती है ।
2. मूल्य और मूल्य की अनुभूति पर्याय है ।
3. मानव-मन आवेगों का तंत्र है । चेतनावस्था में आवेगों की उत्पत्ति चलती रहती है । आवेग दो प्रकार के होते हैं : (क) प्रवृत्तिमूलक आवेग और (ख) निवृत्तिमूलक आवेग। जो हमारे प्रवृत्तिमूलक आवेगों को संतुष्ट करता है, वही हमारे लिए मूल्यवान है ।
4. साहित्य का मूल्य हमारे उद्वेगों (आवेगों) में संगति और संतुलन स्थापित करने में निहित होती है। वह काव्य मूल्यवान है, जो ऐसी आकांक्षाओं को तुष्ट करती है, जिनमें कम-से-कम वृतियाँ क्षुब्ध होती हैं ।


प्रश्न 2. आई ए रिचर्ड्स का संप्रेषण सिद्धांत क्या है?

उत्तर : आई ए रिचर्ड्स ने सम्प्रेषण की जो परिभाषा दी है और उसकी प्रक्रिया का जो वर्णन किया है, वह व्याख्या-सापेक्ष है । इसे निम्न बिंदुओं के आधार पर भली-भाँति समझा जा सकता है :
1. प्रभावी अभिव्यंजना को ही सम्प्रेषण कहते हैं और सम्प्रेषण में समर्थ व्यक्ति को ही कलाकार ।
2. सम्प्रेषण के लिए आवश्यक है कि एक मन की अनुभूति से दूसरा मन प्रभावित हो अर्थात उसमें भी वैसी ही अनुभूति उत्पन्न होने की भूमिका बन जाए ।
3. दोनों अनुभूतियों में समानता हो अर्थात जिस अनुभूति से प्रभाव स्वरूप दूसरी अनुभूति उत्पन्न हो, वे दोनों समान
हों ।
4. दूसरी (उत्पाद्य) अनुभूति पहली (उत्पादक) अनुभूति से प्रेरित हो अर्थात दूसरी अनुभूति स्वतंत्र रूप से उत्पन्न न होकर पहली अनुभूति से उत्पन्न हो ।

प्रश्न 3. आई ए रिचर्ड्स का काव्यभाषा-सिद्धांत क्या है?

उत्तर : आई ए रिचर्ड्स के काव्यभाषा-सिद्धांत की प्रमुख मान्यताएं निम्नानुसार हैं :
1. भाषा-प्रयोग के वैज्ञानिक या तथ्यात्मक (Referentia) एवं रागात्मकता (Emotive) दो रूप होते हैं ।
2. समृद्ध और समर्थ भाषा में चार प्रकार के अर्थ अर्थात अभिधार्थ, भाव, ध्वनि और अभिप्राय होते हैं ।
3. जिस भाषा में रूपकों का प्रयोग किया जाता है, वह भाषा सर्वाधिक उच्च स्तर की होती है ।
4. भाषा में श्लेष-प्रयोग का महत्व है । श्लेष के प्रयोग द्वारा भाषा को अधिकाधिक अभिव्यंजनापूर्ण बनाया जा सकता है ।
5. कविता की भाषा में छंद और लय अपरिहार्य है ।

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