वर्तमान युग में ‘आलोचना’ नामक विधा का तीव्र गति से विकास हुआ है । आलोचना का वास्तविक उद्भव संस्कृत की काव्यशास्त्रीय परंपरा में मिलता है , किन्तु हिंदी में भारतेन्दु युग से ही हिंदी आलोचना का सूत्रपात मिलता है । भारतेन्दु ने ‘नाटक’ नामक सर्वप्रथम आलोचनात्मक ग्रंथ लिखा। आज हम Bhartenduyugin Hindi Alochana का विस्तार से अध्ययन करेंगे और इसे समझने का प्रयास करेंगे ।
भारतेन्दु युग जन-जागरण का युग था। इस युग में राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा साहित्य, दर्शन और चिंतन के क्षेत्र में समस्त भारतीय जनमानस में एक नवीन क्रांति आई।
इस युग के साहित्य में वैचारिक अभिव्यक्ति का उपयुक्त माध्यम गद्य ही हो सकता था। अतः गद्य की अनेक विधाएँ नाटक, कहानी, उपन्यास, निबंध की तरह आलोचना का भी विकास हुआ।
साहित्य का उपयोगितावादी दृष्टिकोण स्वीकार किया जाने लगा। साहित्य में सुरुचि, नैतिकता और बौद्धिकता को प्रधानता मिलने लगी। भारतेन्दु युग की आलोचना में इन्हीं तीन तत्वों को प्रमुखता दी गई।
राष्ट्र-प्रेम इस काल के साहित्य की प्रधान विशेषताओं में है। अतः आलोचनाओं में भी राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाया गया। जुलाई-अगस्त सन् 1898 ई. में ‘हरिश्चन्द्र चंद्रिका’ में एक उपन्यास की आलोचना हिन्दू-मुस्लिम समस्या को लेकर की गई है जिसमें जातियों के पारस्परिक मेल का समर्थन किया गया है।
भारतेन्दु युग में अधिकांश आलोचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से ही विकसित होती रहीं। ‘हरिश्चंद्र मैगज़ीन’, ‘हरिश्चंद्र चंद्रिका’, ‘भारत मित्र’, ‘सार सुधा निधि’, ‘ब्राह्मण’ आदि पत्रिकाओं में विविध विषयों पर लिखित लेख और टिप्पणियों से आलोचना दृष्टि का विकास हुआ।
इस युग में एक ओर जहाँ पत्र-पत्रिकाओं में व्यापक राष्ट्रीय हित एवं समाज कल्याण को दृष्टि में रखकर पुस्तकों की समीक्षा की जा रही थी, वहीं दूसरी ओर रीतिकालीन मूल्यों में विश्वास करने वाले कुछ विद्वान पिंगल, नायिका भेद, रस निरुपण और अलंकार विवेचन में लगे हुए थे।
डॉ.नगेंद्र के अनुसार इस युग में तीन प्रकार की आलोचनाओं की प्रधानता रही-
- 1) रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों की परंपरा की सैद्धान्तिक आलोचना ।
- 2) ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली- गद्य में लिखी गई टीकाओं के रूप में प्रचलित आलोचना।
- 3) इतिहास ग्रंथों तथा कवि-परिचय के रूप में लिखी गई आलोचना।
आइए अब हम इन सभी को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं ।
भारतेन्दुयुगीन आलोचना के विविध रूप
भारतेन्दुयुगीन हिंदी आलोचना को हम निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत विभाजित कर सकते हैं :
रीतिकालीन लक्षण ग्रंथों की परंपरा की सैद्धान्तिक आलोचना
पहले वर्ग के अंतर्गत पिंगल, अलंकार, रस, सम्पूर्ण काव्यशास्त्र पर लक्षण ग्रंथों की रचना की गई। उदाहरण के लिए जगन्नाथ प्रसाद भानु कृत ‘छंद प्रभाकर’ (1894 ई.) और जगन्नाथ दास रत्नाकर रचित ‘घनाक्षरी-नियम रत्नाकर’ (1897 ई.) इस युग में रचित उल्लेखनीय पिंगल ग्रंथ हैं।
कुछ महत्वपूर्ण अलंकार ग्रंथ हैं- लछिराम कृत ‘रावणेश्वर कल्पतरु’ (1892 ई.) और बिहारी लाल रचित ‘अलंकारादर्श’ (1897 ई.)।
रस ग्रंथों में साहब प्रसाद सिंह रचित ‘रस रहस्य’ (1887 ई.) और प्रतापनारायण सिंह का ‘रस कुसुमाकर’ (1894 ई.) उल्लेखनीय हैं। इसमें लक्षण खड़ी बोली गद्य में दिए गए हैं।
सम्पूर्ण काव्यशास्त्र को ध्यान में रखकर लिखा गया जानकी प्रसाद का ग्रंथ ‘काव्य सुधाकर’ (1886 ई.) उल्लेखनीय है।
ब्रजभाषा तथा खड़ी बोली- गद्य में लिखी गई टीकाओं के रूप में प्रचलित आलोचना
द्वितीय वर्ग की आलोचनाओं में टीकाएँ हैं, जिनमें कुछ प्रमुख हैं- ‘बिहारी सतसई’ पर की गई लल्लू लाल जी की टीका ‘लाल चंद्रिका’ (1819 ई.) जो ब्रजभाषा प्रभावित खड़ी बोली गद्य में है तथा ‘बिहारी सतसई’ पर ही प्रभुदयाल पाण्डेय ने भी 1896 ई. में खड़ी बोली गद्य में एक अच्छी टीका लिखी थी। इन टीकाओं में कहीं-कहीं काव्य गुणों के संकेत मिल जाते हैं।
इतिहास ग्रंथों तथा कवि-परिचय के रूप में लिखी गई आलोचना
तृतीय वर्ग के अंतर्गत दो इतिहास ग्रंथ इस काल में लिखे गए- शिव सिंह सेंगर रचित ‘शिवसिंह सरोज’ (1878 ई.) और जार्ज ग्रियर्सन लिखित ‘द मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ नार्दन हिंदुस्तान’ (1889 ई.)।
इन इतिहास ग्रंथों में दिए गए कवि परिचयों में आलोचना के तत्व नहीं के बराबर हैं। इसके अतिरिक्त प्राचीन आचार्यों और कवियों के आलोचनात्मक परिचय ‘हिंदी प्रदीप’ पत्रिका में प्रकाशित होते रहे।
दरअसल भारतेन्दु युग में पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित पुस्तक समीक्षाओं में ही आधुनिक आलोचना का रूप दिखाई पड़ता है। ‘आनंद कादंबिनी’ पत्रिका की ‘संयोगिता स्वयंवर’ और ‘बंग विजेता’ तथा ‘हिंदी प्रदीप’ पत्रिका की ‘सच्ची समालोचना’ इस शैली के प्रौढ़ उदाहरण हैं।
भारतेन्दु युग के मुख्य आलोचक
भारतेन्दु, बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ और बालकृष्ण भट्ट इत्यादि भारतेन्दु युग के प्रमुख आलोचक हैं । आइए अब इनके आलोचनात्मक योगदान को विस्तार से समझने का प्रयास करें ।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को अन्य गद्य विधाओं के साथ ही आलोचना की विधिवत शुरूआत का श्रेय भी दिया जाता है। उन्होंने नाट्यशास्त्र संबंधी महत्वपूर्ण कृति ‘नाटक’ (1883 ई.) की रचना कर आधुनिक हिंदी आलोचना का प्रारंभ किया।
इस निबंध में लगभग साठ पृष्ठों में नाटक का शास्त्रीय विवेचन और इतिहास प्रस्तुत किया गया है। यह निबंध यद्यपि संस्कृत नाट्य शास्त्र को आधार बनाकर लिखा गया है किंतु इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें प्राचीन नाट्य शास्त्र की जानकारी दी गई है। साथ ही युग प्रवृत्ति का ध्यान रखकर प्राचीन जटिल शास्त्रीयों नियमों से छूट लेने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र का यह मानना था –
‘संस्कृत नाटक की भाँति हिंदी नाटक में इनका अनुसंधान करना या किसी नाटकांग में इनको यत्नपूर्वक रखकर हिंदी नाटक लिखना व्यर्थ है, क्योंकि प्राचीन लक्षण रखकर आधुनिक नाटकादि की शोभा सम्पादन करने से उल्टा फल होता है और यत्न व्यर्थ हो जाता है।’
भारतेन्दु ने संस्कृत साहित्य से ब्रज साहित्य तक का गहन अध्ययन किया। उन्होंने संस्कृत और हिंदी के आचार्यों और कवियों – कालिदास, रामानुजाचार्य, शंकराचार्य, जयदेव, पुष्पदंताचार्य, वल्लभाचार्य तथा सूरदास पर जीवन-वृतांतीय आलोचना प्रस्तुत की और जगह-जगह अपनी तुलनात्मक दृष्टि का भी परिचय दिया। इस प्रकार भारतेन्दु ने अपने समकालीन लेखकों को आलोचना की ओर प्रवृत्त किया।
बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
भारतेन्दु मंडल के लेखकों में बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ का महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने श्रीनिवासदास रचित ‘संयोगिता स्वयंवर’ और गदाधर सिंह लिखित ‘बंग विजेता’ उपन्यास के हिंदी अनुवादों की विस्तृत आलोचना ‘आनंद कादम्बिनी’ पत्रिका में की थी। इसी से व्यावहारिक हिंदी आलोचना का सूत्रपात माना जाता है। इन्होंने अपनी आलोचना में पुस्तक के गुण-दोषों का तटस्थ और साहित्यिक, विश्लेषण किया है।
बालकृष्ण भट्ट
बालकृष्ण भट्ट जी ने संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन किया था। उन्होंने संस्कृत के अनेक कवियों एवं आचार्यों – भवभूति, कालिदास, श्रीहर्ष, क्षेमेन्द्र, वाराहमिहिर, आनंदवर्धन, भट्टनारायण, राजशेखर, बाणभट्ट, विल्हण, बाल्मीकि, व्यास, गोवर्धनाचार्य और जयदेव के जीवन वृतांत प्रस्तुत करते हुए आलोचना लिखी और रथान-स्थान पर उनकी साहित्यगत प्रवृत्तियों में साम्य-वैषम्य दर्शाकर अपनी तुलनात्मक दृष्टि का परिचय दिया।
उनकी आलोचना का माध्यम ‘हिंदी प्रदीप’ पत्रिका थी जिसका सम्पादन वे स्वयं करते थे। भट्ट जी ने सैद्धान्तिक विवेचन का उपयोग व्यावहारिक आलोचना में किया है। वे रचना की समीक्षा के मानदंड का उल्लेख सिद्धांतों के रूप में पहले कर देते हैं, फिर उसी आधार पर कृति का मूल्यांकन करते हैं। भट्ट जी की ‘सच्ची समालोचना’ इसका सुंदर उदाहरण है।
उन्होंने ‘नीलदेवी’, ‘परीक्षा गुरु’, ‘संयोगिता स्वयंवर’ तथा ‘एकांतवासी’ आदि कृतियों पर जो व्यावहारिक आलोचनाएँ लिखी हैं वे उल्लेखनीय हैं।
भट्ट जी कवि के परिचय में तो तटस्थ, गंभीर और विश्लेषणात्मक हैं लेकिन पुस्तकों की आलोचना में कहीं- कहीं मीठी चुटकियाँ भी ले लेते हैं। उनकी शैली व्यंग्य-प्रधान है।
निष्कर्ष
इस प्रकार भारतेन्दु काल के समीक्षकों का ध्यान काव्य के अत्यंत बाह्य और स्थूल रूप पर ही था। काव्य के भीतर भाव-जगत में प्रविष्ट होकर उन्होंने विश्लेषण नहीं किया। लेकिन इतना ज़रूर है कि नयी समीक्षा के भावी विकास का पूर्वाभास भारतेन्दु काल में मिलने लगा था। आगे द्विवेदी युग में हिंदी आलोचना को नया और विस्तृत स्वरूप मिला।

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