कवि की रचना को काव्य कहते हैं। कवि जीवन और जगत् की अनुभूति को शब्द और अर्थ के सामञ्जस्य का आधार लेकर अपनी प्रतिभा के बल पर रमणीय, रसात्मक और आह्लादकारी बनाकर प्रस्तुत करता है। उसकी पुनः सृष्टि करता है। उसकी यह अभिनव सृष्टि ही काव्य है। आज इस लेख में हम Kavya Ka Swarup का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।
मनुष्य का जीवन और उसके सामने फैला हुआ यह विराट् जगत् दोनों ही रहस्यमय हैं। दोनों ही परिवर्तनशील और गत्यात्मक हैं। समय के साथ मनुष्य के ज्ञान और संवेदना में भी परिवर्तन होता है। जगत् और जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण बदलता है। इसलिए कवि की अनुभूति और संवेदना में भी परिवर्तन होता है।
आदिम काल के मनुष्य का जीवन सरल था। प्रकृति के साथ उसके सम्बन्धों में भी किसी प्रकार का द्वन्द्व नहीं था। प्रकृति के रहस्यों को देखकर वह कभी भयभीत, कभी चमत्कृत और कभी आह्लादित होता था। उसके परिचय की परिधि में आने वाली प्रकृति उसकी आत्मीय बन गई थी। इसलिए अपने सुख-दुःख की अनुभूतियों को वह सीधे-सादे ढंग से व्यक्त कर लेता था।
आज स्थिति दूसरी है। मनुष्य के ज्ञान का क्षेत्र विस्तृत हो चुका है। जगत् के अनेक रहस्यों को वह सुलझा चुका है। अपनी अपराजेय जिजीविषा के बल पर उसने प्रकृति पर विजय प्राप्त करने का संकल्प कर लिया है। दीर्घ काल से जीवन को सुखमय बनाने के प्रयत्न में उसने अनेक उपकरण जुटा लिये हैं। उसकी बुद्धि विकसित हो चुकी है। उसने अनेक संस्थाओं को जन्म दिया है। धीरे-धीरे उसने ऐसी जीवन पद्धति विकसित कर ली है जिसकी व्याख्या के प्रयत्न में नये-नये शास्त्र जन्म ले रहे हैं।
आज वह सुख-दुःख-मूलक उत्साह, प्रेम, क्रोध, भय जैसे मनोवेगों से चालित न होकर अनेक जटिल मनोभावों एवं संश्लिष्ट मनःस्थितियों से उद्वेलित है। कवि भी मनुष्य ही है। वह भी एक सामाजिक प्राणी है। इसलिए उसकी अनुभूति और संवेदना भी जटिल और संश्लिष्ट हो गई है। इसलिए आज उसकी रचना का (काव्य का) स्वरूप भी बदल चुका है।
जिन रचनाओं को लक्ष्य में रखकर भामह, दण्डी, उद्भट, वामन, रुद्रट, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, राजशेखर, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, मम्मट, विश्वनाथ कविराज और पण्डितराज जगन्नाथ ने काव्य का स्वरूप निर्धारित किया था, आज उससे भिन्न प्रकार की रचनाएँ हमारे सामने हैं। इसलिए काव्य के स्वरूप में भी परिवर्तन हो गया है। आज पुराने लक्षण अप्रासंगिक माने जा रहे हैं। फिर भी वर्तमान को समझने के लिए अतीत का विश्लेषण आवश्यक है। अतीत के गर्भ से ही वर्तमान का जन्म हुआ है।
इसलिए हम कुछ प्राचीन आचायों द्वारा निर्धारित काव्य-लक्षणों को सामने रखकर काव्य के स्वरूप को स्पष्ट करना चाहेंगे।
संस्कृत के विद्वानों के द्वारा काव्य का स्वरूप विवेचन
- 1. शब्दार्थौ सहितौ काव्यं गद्यं-पद्यं तत् द्विधा । – भामह
- 2. काव्य शब्दोऽयं गुणालङ्कारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोर्वर्तते । – वामन
- 3. तददोषौ शब्दार्थों सगुणावनलङ्कतीः पुनः क्वापि। – मम्मट
- 4. वाक्यं रसात्मकं काव्यं । – विश्वनाथ
- 5. रमणीयार्थ-प्रतिपादकः शब्दः काव्यम्। -पंडितराज जगन्नाथ
पहला लक्षण ‘भामह’ का है। उनके अनुसार शब्द और अर्थ दोनों का सहभाव ही काव्य है। अर्थात् जहाँ रचना में वर्णित अर्थ के अनुरूप शब्दों का प्रयोग हो या शब्दों के अनुरूप अर्थ का वर्णन हो वहाँ शब्द और अर्थ के सहभाव के कारण काव्य की स्थिति मान्य है। यह काव्य गद्य और पद्य दो प्रकार का होता है।
आचार्य ‘भामह’ की यह परिभाषा अत्यन्त संक्षिप्त है। इससे काव्य के स्वरूप का पूरा बोध नहीं होता। शब्द और अर्थ का सहभाव तो इतिहास, पुराण और शास्त्र सभी में अपेक्षित है। अर्थ के अनुरूप शब्द और शब्द के अनुरूप अर्थ तो प्रत्येक सार्थक एवं प्रभावी अभिव्यक्ति में होता है। इससे काव्य के व्यावर्तक धर्म का बोध नहीं होता।
इसलिए आचार्य कुन्तक ने आगे चलकर शब्द और अर्थ के सहभाव (सहितौ) का अर्थ ‘काव्य-सौन्दर्य के लिए उनकी न्यूनता या अधिकता से रहित मनोहर स्थिति’ बताया है।
आचार्य वामन ने अपने लक्षण में शब्द और अर्थ के ‘सहभाव’ के साथ गुण और अलङ्कार और जोड़ दिया है।
वस्तुतः आचार्य वामन द्वारा निरूपित काव्य-लक्षण को समझने के लिए उनके द्वारा कथित कुछ अन्य सूत्रों पर भी ध्यान देना होगा। वे कहते हैं-‘काव्यं ग्राह्यम् अलङ्कारात्’ । अलंकार के योग से काव्य ग्राह्य होता है और अलंकार सौन्दर्य के आधायक तत्त्व को कहते हैं। ‘सौन्दर्यमलङ्कारः’।
सौन्दर्य का विधान दोषों के परित्याग और गुण तथा अलङ्कारों के उपादान से होता है। गुण और अलंकार दोनों को सौन्दर्य का आधायक मानते हुए भी वामन ने गुणों को विशेष महत्त्व दिया है। उनके अनुसार काव्य की शोभा करने वाले धर्म गुण हैं तथा उसका (गुण द्वारा उत्पन्न शोभा का) अतिशय करने वाले धर्म अलङ्कार।
‘काव्य शोभायाः कर्तारो धर्माः गुणाः तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः । काव्य-सौन्दर्य-वृद्धि में गुणों और अलङ्कारों की भूमिका ठीक वैसी ही है जैसी रमणी की सौन्दर्य-वृद्धि में उसके यौवन और उसके द्वारा धारण किये गये हार, कङ्कण, नूपुर आदि आभूषणों की।
आचार्य वामन की एक विशेषता और है। उन्होंने सबसे पहले काव्य की आत्मा का प्रश्न उठाया है। उनके अनुसार काव्य की आत्मा ‘रीति’ है-‘रीतिरात्मा काव्यस्य’ ।
‘रीति’ कहते हैं विशेष प्रकार की पदरचना-शैली को- ‘विशिष्टपदरचना रीति’। विशेष से तात्पर्य ‘गुण-युक्त’ से है- ‘विशेषो गुणात्मा’। गुण, शब्द और अर्थ दोनों के धर्म हैं। इसलिए गुणों का विशेष महत्त्व है।
‘श्लेष’, ‘प्रसाद’, ‘समता’, ‘समाधि’, ‘माधुर्य’, ‘ओज’, ‘पद सौकुमार्य’, ‘अर्थव्यक्ति’, ‘उदारता’ और ‘कान्ति’ इन्हीं गुणों के समावेश से पद-रचना विशिष्ट होती है। इस प्रकार अन्ततः ये गुण ही काव्य की आत्मा के आधार तत्त्व हैं। इसी निष्कर्ष पर पहुँच कर आचार्य वामन ने अपने काव्य-लक्षण में ‘गुणालङ्कारसंस्कृतयोः शब्दार्थयोः’ पद का प्रयोग किया है।
आचार्य मम्मट के काव्य-लक्षण को इसी क्रम में देखना चाहिए। उनके अनुसार शब्द और अर्थ का सहभाव काव्य है किन्तु यह सहभाव दोष-रहित, गुण- युक्त और अलंकृत होना चाहिए। कहीं-कहीं अलंकार न होने पर भी काव्य हो सकता है। दोष का परिहार पहली शर्त है। जैसे अंधा, लँगड़ा, काना (दोष-युक्त) मनुष्य सुन्दर नहीं माना जाता वैसे ही श्रुतिकटुत्व, क्लिष्टत्व, अश्लीलत्व, ग्राम्यत्व आदि दोषों से युक्त काव्य सुन्दर नहीं कहा जा सकता।
गुणों का सद्भाव (होना) दूसरी शर्त है। जिस प्रकार आकार-प्रकार से निर्दोष होने के साथ ही यदि मनुष्य वीरत्व, औदार्य, शील, विनय आदि गुणों से युक्त भी हो तो उसके व्यक्तित्व का आकर्षण बढ़ जाता है उसी प्रकार निर्दोष होने के साथ ही यदि काव्य में ‘ओज’, ‘माधुर्य’, ‘प्रसाद’ आदि गुणों का भी समावेश हो तो काव्य-सौन्दर्य द्विगुणित हो जाता है।
जहाँ तक अलंकारों का प्रश्न है, वे हों तो ठीक; न हों तो भी विशेष हानि नहीं। जिस प्रकार रूप-लावण्ययुक्त युवती अलंकृत भी हो तो क्या कहना? उसका सौन्दर्य तो सभी प्रकार से श्लाघ्य है किन्तु यदि वह हार आदि आभूषणों से सज्जित न हो तो भी उसके सहज सौन्दर्य का आकर्षण कम नहीं होता।
यही स्थिति काव्य की है। यदि वह निर्दोष तथा गुण-अलंकार-युक्त हो तो क्या कहना ? किन्तु यदि उसमें उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि का विधान न हो तो भी उसका सहज सौन्दर्य उसकी रमणीयता में कमी नहीं आने देता।
परवर्ती आचार्यों ने मम्मट के काव्य-लक्षण की आलोचना की है। किन्तु उनकी आलोचना में तत्त्व की बात कम, स्पर्धाजन्य-पाण्डित्य-प्रदर्शन अधिक है।
‘साहित्यदर्पणकार’ कविराज विश्वनाथ ने शब्द और अर्थ के सहभाव के स्थान पर ‘वाक्य’ पद का प्रयोग किया है और ‘सगुणौ’ के स्थान पर ‘रसात्मक’ विशेषण का। उनके अनुसार शब्द और अर्थ के सहभाव की आवश्यकता तो सभी प्रकार की अभिव्यक्ति में होती है। कवि जो कुछ लिख दे वह काव्य नहीं हो सकता। काव्य तो तभी होगा जब वाक्य रसात्मक होगा। ‘रस’ ही काव्य की आत्मा है। ‘रस’ के अन्तर्गत भाव, भावाभास, रसाभास आदि सभी का समावेश मान्य है।
यदि यह कहा जाय कि ‘सगुण’ कहने से ‘सरस’ की सिद्धि स्वतः हो जाती है क्योंकि गुण बिना रस के रह ही नहीं सकते तो इस दशा में भी ‘सरसौ’ विशेषण उपयुक्त होगा। सबसे बड़ी बात यह है कि शब्द और अर्थ काव्य के शरीर-मात्र हैं। गुणों के अभिव्यंजक शब्द और अर्थ भी काव्य-स्वरूप के आधायक नहीं हो सकते। वे केवल काव्य में उत्कर्ष पैदा कर सकते हैं।
काव्य का लक्षण ऐसा होना चाहिए जो उसके स्वरूप को पूर्णतः स्पष्ट कर सके। जब ‘रस’ काव्य की आत्मा है तो उसके लक्षण में ‘रस’ का उल्लेख होना ही चाहिए। इसलिए ‘रसात्मक वाक्य ही काव्य’ हो सकता है।
कविराज विश्वनाथ ने आचार्य मम्मट के काव्य-लक्षण की आलोचना अवश्य की है किन्तु विद्वानों की दृष्टि में उनके लक्षण में आचार्य मम्मट का लक्षण समाहित है।
इस सम्बन्ध में ‘साहित्यदर्पण’ के टीकाकार डॉ० सत्यव्रत सिंह का कथन ध्यान देने योग्य है- “रसात्मक होने के लिए, रस रूप आन्तर तत्त्व का आधार होने के लिए वाक्य को केवल साकांक्ष, योग्य और संसृष्ट पदों का ‘कदम्ब’ होना अपेक्षित नहीं अपितु अदोष, सगुण और सुरुचिपूर्ण ढंग से अलंकृत होना अपेक्षित है।
निष्कर्ष यही निकलता है कि ‘वाक्यं रसात्मकं काव्यम्’ की काव्य-परिभाषा से ‘तददोषौ शब्दार्थों सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि’ का काव्य-लक्षण ध्वनित होता है जिसमें कवि की कृति के रूप में ‘काव्य’ का रहस्य निर्दिष्ट है।”
पंडितराज जगन्नाथ को विश्वनाथ कविराज का काव्य-लक्षण संकुचित प्रतीत हुआ। उन्होंने इस पर आपति करते हुए कहा कि मात्र ‘रसात्मक वाक्य’ को काव्य मान लेने पर ‘वस्तु-अलंकार-प्रधान काव्य’ को काव्य की सीमा से अलग कर देना होगा।
महाकवियों ने स्थान-स्थान पर जल के प्रवाह, वेग तथा गिरने और उछलने का वर्णन किया है। बन्दरों और बालकों की क्रीड़ाओं का वर्णन किया है। इन वर्णनों में रस की प्रत्यक्ष योजना नहीं होती। फिर भी ये वर्णन प्राचीन महाकवियों की व्यवस्था के अनुसार काव्य ही माने जाते हैं। इसलिए ‘रसात्मक वाक्य’ में ही काव्यत्व मानना न्यायसंगत नहीं।
पंडितराज जगन्नाथ ने ‘रस’ के स्थान पर ‘अर्थ की रमणीयता’ पर विशेष बल दिया। उनके अनुसार ऐसा शब्द-विधान जिससे रमणीय या चमत्कारी अर्थ का प्रतिपादन होता है, काव्य है।
आगे चलकर पंडितराज की भी आलोचना हुई। उनकी आलोचना इस बात को लेकर की गई कि ‘अर्थ की रमणीयता’ को काव्य मानते हुए भी उन्होंने ‘अर्थ’ को ‘शब्द’ का अनुयायी मानकर अपने लक्षण में ‘शब्दः काव्यम्’ पर विशेष बल दिया।
वस्तुतः ‘शब्द’ और ‘अर्थ’ का सम्बन्ध शक्ति और शक्तिमान् के समान नित्य है। अलौकिक चमत्कार के उत्पादन में दोनों की समान भूमिका है। इसलिए काव्य में दोनों का समान महत्त्व मान्य है। इसलिए पंडितराज का ‘शब्द’ पर अधिक बल देना उचित नहीं है।
वस्तुतः पंडितराज जगन्नाथ अद्वैतवादी थे। इसलिए शब्द-ब्रह्म पर बल देना उनके लिए उचित ही था। अर्थ के महत्त्व का निषेध उनका लक्ष्य कदापि नहीं था। उन्होंने ‘अर्थ’ की रमणीयता पर बल देकर वस्तु-वर्णन एवं अलंकार-प्रधान रचनाओं को भी काव्य की सीमा में समेट लिया। इस प्रकार उन्होंने काव्य को अपेक्षाकृत व्यापक आधार प्रदान करने की चेष्टा की।
संस्कृत के अन्य आचार्यों ने भी काव्य के स्वरूप पर विचार किया है। विशेष रूप से आनन्दवर्धन और कुन्तक दो ऐसे आचार्य हैं जिनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। किन्तु एक तो इनका चिन्तन एकदेशीय है, दूसरे इनके चिन्तन का सार-तत्त्व आचार्य मम्मट के विवेचन में समाविष्ट हो गया है। इसलिए काव्य-तत्त्व-चिन्तन के क्रम में मौलिक उद्भावना की दृष्टि से इनका महत्त्व मान्य होने पर भी काव्य के समग्र स्वरूप-निर्धारण में इनपर अलग से विचार करना आवश्यक नहीं है।
आचार्य मम्मट ने अपने ‘काव्य–प्रकाश’ में भरतमुनि से लेकर भोजराज तक लगभग 1200 वर्षों के समस्त अलंकारशास्त्रीय चिन्तन को सार-रूप में प्रस्तुत कर दिया है। भरत, भामह, वामन, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र और भोजराज इन सभी आचार्यों की चिन्ताधाराएँ ‘काव्यप्रकाश’ में उचित महत्त्व प्राप्त कर सकी हैं और सारा काव्य-प्रकाश ‘तददोषौ शब्दार्थों सगुणावनलङ्कृतीः पुनः क्वापि’ इस एक सूत्र के ऊपर घूम रहा है” ।
इसलिए संस्कृत आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य-स्वरूप के परिचय के लिए अन्य आचार्यों द्वारा निरूपित लक्षणों की उद्धरणी आवश्यक नहीं। आचार्य मम्मट के काव्य-लक्षण की पूर्णता पर टिप्पणी करते हुए आचार्य विश्वेश्वर ने कहा है- ‘काव्यप्रकाशकार मम्मट का ‘तददोषौ शब्दार्थों सगुणावलङ्कृतीः पुनः क्वापि’ यह काव्य-लक्षण अन्य लक्षणों की अपेक्षा अधिक परिमार्जित है। कुन्तक ने जिस बात को कई कारिकाओं में कहा है, मम्मट ने इस आधी कारिका में ही उसको समाविष्ट कर दिया है।
उसके साथ ही ‘अदोषौ’ तथा ‘सगुणौ’ पद जोड़कर उन्होंने काव्य-लक्षण का नया दृष्टिकोण भी उपस्थित किया है, जिसका प्राचीन लक्षणों में इतना स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया था।
पूर्व लक्षणकारों ने काव्य के शरीर ‘शब्द तथा अर्थ’, उसकी आत्मा-रीति, रस या ध्वनि, उसके अलंकारों की चर्चा तो अपने लक्षणों में की थी, परन्तु गुण दोष की चर्चा नहीं की थी।”
अतः यह निर्विवाद है कि आचार्य मम्मट द्वारा निरूपित काव्य-लक्षण ही संस्कृत के आचार्यों में विशेष मान्यताप्राप्त है और काव्य के स्वरूप को स्पष्ट करने में यह अधिक समर्थ है।
संस्कृत के मान्य विद्वानों द्वारा निर्दिष्ट काव्य-स्वरूप के सम्बन्ध में विचार करने पर कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण बातें उभर कर सामने आती हैं जिनपर ध्यान देना आवश्यक है।
संस्कृत के आचार्यों का सारा विवेचन भाषिक-विश्लेषण के रूप में है। इस विश्लेषण-क्रम में आचार्यों ने ‘काव्य’ का स्वरूप ठीक उसी रूप में निर्दिष्ट करना चाहा है जिस रूप में मानव-व्यक्तित्त्व अर्थात् उसके शरीर और आत्मा का स्वरूप निर्दिष्ट किया जाता है।
‘अलंकार’, ‘रीति’ और ‘वक्रोक्ति’ सिद्धान्त मुख्यतः काव्य के बाह्य पक्ष (शरीर) के सौन्दर्य का उद्घाटन करते हैं तथा ‘रस’ और ‘ध्वनि’ सिद्धान्त उसके आन्तरिक पक्ष (आत्मा) के सौन्दर्य का।
‘रचना’ और उसके ‘आस्वाद’ की दृष्टि से विचार किया जाय तो कहा जा सकता है कि ‘अलंकार’, ‘रीति’ और ‘वक्रोक्ति’ सिद्धान्त ‘रचना’ पक्ष का और ‘रस’ एवं ‘ध्वनि’ सिद्धान्त उसके ‘आस्वाद’ पक्ष का विवेचन करते हैं।
संस्कृत-आचार्यों का सारा विवेचन एक प्रकार से वस्तुपरक और निर्वैयक्तिक है। यह एक स्थितिशील सामाजिक चेतना की उपज है। उसका स्वरूप बहुत कुछ शाश्वत तत्त्वों की खोज के परिणामस्वरूप निर्दिष्ट हुआ है। कवि-व्यक्तित्त्व, उसके सामाजिक संदर्भ तथा जीवन की यथार्थ समस्याओं में उसकी भागीदारी से वह बहुत कुछ निरपेक्ष है। इसीलिए आज के संदर्भ में उसकी भूमिका संदिग्ध हो गई है।
हिंदी के विद्वानों के द्वारा काव्य का स्वरूप विवेचन
हिंदी-साहित्य में काव्य के स्वरूप को लेकर मध्यकाल में कोई मौलिक विवेचन नहीं हो सका। चैतन्य महाप्रभु के शिष्य रूप गोस्वामी ने ‘भक्तिरसामृत सिन्धु’ (1541 ई०) में ‘भक्ति’ को ही प्रकृत रस सिद्ध किया और अन्य रसों का विवेचन उसकी विकृतियों या भेदों के रूप में किया। इससे काव्य का भक्ति में अन्तर्भाव अवश्य हो गया किन्तु काव्य के स्वरूप की कोई नयी अवधारणा सामने नहीं आई।
गोस्वामी तुलसीदास ने-
हृदय-सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।
जौं वरसै वर बारि विचारू। होइ कवित मुकुता मनि चारू ॥
कहकर काव्य की व्यापक अवधारणा अवश्य प्रस्तुत की किन्तु परवर्ती काव्य-विवेचन पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
रीति-काल के आचार्यों-केशव, चिन्तामणि, कुलपति, देव, श्रीपति, सोमनाथ, भिखारीदास, प्रतापसाहि आदि-ने कोई नवीन या मौलिक उद्भावना नहीं की। ये आचार्य संस्कृत के आचार्यों के मतों में ही थोड़ा फेर-बदल करके उसे प्रस्तुत करते रहे।
केशवदास ने ‘जदपि सुजाति सुलक्षणी, सुबरन सरस सुवृत। भूषण बिन न बिराजई, कविता बनिता मित’ कहकर ‘अलंकार’ की ओर अपना झुकाव प्रकट कर दिया है।
चिन्तामणि ने-
सगुनालंकारन सहित दोष-रहित जो होइ।
शब्द अर्थ ताको कवित कहत विवुध सब कोइ ॥
कहकर आचार्य मम्मट के काव्य-लक्षण की ही आवृत्ति कर दी है।
आचार्य मम्मट ने कभी-कभी अलंकार-रहित काव्य की स्थिति भी स्वीकार की थी। ‘चिन्तामणि’ ने गुण के साथ अलंकारों के सद्भाव को मान्यता दी है।
कुलपति ने लोकोत्तर प्रदान करने वाले शब्द और अर्थ के सहभाव को काव्य माना-
जन तें अद्भुत सुख-सदन शब्दरु अर्थ कवित्त।
यह लच्छन मैंने कियो समुझि ग्रन्थ बहुचित्त ।।
इस लक्षण में भी संस्कृत-आचार्यों की परम्परा का ही पोषण है।
देव ने समर्थ काव्य का लक्षण बताते हुए कहा है-
शब्द सुमति मुख ते कढ़े, लै पद बचननि अर्थ।
छन्द, भाव, भूषण, सरस, सो कहि काव्य समर्थ ॥
उपर्युक्त लक्षण में भी शब्द और अर्थ के सहभाव के साथ भाव, अलंकार,रस और छन्द की आवश्यकता पर बल दिया गया है। इस लक्षण में कई तत्त्वों के समन्वय का प्रयास है; कोई मौलिक बात नहीं कही गई है। श्रीपति और सोमनाथ दोनों के काव्य-लक्षणों पर मम्मट का प्रभाव स्पष्ट है।
श्रीपति के अनुसार-
शब्द अर्थ बिन दोष गुन अलंकार रसवान।
ताको काव्य वखानिए श्रीपति परम सुजान ॥
सोमनाथ के अनुसार –
सगुन पदारथ दोष बिनु, पिंगलमत अविरुद्ध ।
भूषण जुत कवि कर्म जो सो कवित्त कहि सुद्ध ॥
श्रीपति का शब्द-अर्थ सोमनाथ के यहाँ पद-अर्थ हो गया है। दोष-राहित्य दोनों को मान्य है। दोनों गुण और अलंकार की स्थिति मानते हैं। अन्तर केवल यह है कि श्रीपति ‘रस’ की सत्ता को मान्यता देते हैं और सोमनाथ ‘रस’ का उल्लेख करके ‘पिगल मत अविरूद्ध’ कहकर छन्द को महत्त्व देते हैं।
भिखारीदास के अनुसार-
रस कविता को अङ्ग, भूषन हैं भूषन सकल ।
गुन सरुप औ रङ्ग, दूषन करै कुरूपता ॥
अर्थात् ‘रस’ कविता का अङ्ग (शरीर) है। सभी अलंकार उसके आभूषण हैं। गुण उसके रूप-रङ्ग हैं और दोष अङ्ग-विकार हैं जो उसे कुरूप बनाते हैं। परम्परा ‘रस’ को काव्य की आत्मा मानती है। भिखारीदास ने रस को अङ्ग कहकर परम्परा से अलग हटकर अपनी बात कहनी चाही है। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ ‘अङ्ग’ से उनका तात्पर्य आत्मा-युक्त शरीर से है।
हिंदी के इन आचार्यों के उपजीव्य संस्कृत-आचार्यों के लक्षण-ग्रन्थ रहे हैं। इनमें नवीन उद्भावना संभव ही नहीं थी। ये तो लक्षण के अनुसार स्वरचित उदाहरण प्रस्तुत करने में अपनी शक्ति का अपव्यय कर रहे थे।
आधुनिक काल के हिंदी के विद्वानों के द्वारा काव्य का स्वरूप विवेचन
आधुनिक काल में हिंदी के आचार्यों ने परम्परा से हटकर काव्य-स्वरूप की नवीन अवधारणा प्रस्तुत की। आधुनिक काल तक आते-आते देश बहुत बड़े परिवर्तन से गुजर चुका था। अंग्रेजों से पराभूत होने के बाद अंग्रेजी शिक्षा-संस्कृति से प्रभावित होना स्वाभाविक था। विज्ञान के आलोक में हम अपना पुनर्मूल्यांकन करने लगे थे। हमारे सोचने का ढंग बदल रहा था। पूरे देश में अंग्रेजी शिक्षा के अनेक केन्द्र स्थापित हो गए थे। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग यूरोप की यात्रा भी करने लगे थे।
हिंदी-प्रदेश में भी भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने परंपरा से हटकर नये युग के अनुकूल साहित्य-सृजन आरंभ कर दिया था। अब हिंदी के रचनाकारों और लेखकों के सामने केवल संस्कृत का साहित्य नहीं था। वे अंग्रेजी, अरबी, फारसी तथा बँगला, मराठी, गुजराती आदि भाषाओं के साहित्य से भी परिचित होने लगे थे। अब कविता जीवन की यथार्थ समस्याओं पर भी लिखी जाने लगी थी। भारतेन्दु ने स्वयं नाट्य-सिद्धान्तों पर विचार करते हुए परम्परागत मान्यताओं को शिथिल करने की बात कही थी।
आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने स्पष्ट शब्दों में कविता को परम्परा से मुक्त करने की बात कही। उन्होंने घोषित किया- “यमुना के किनारे केलि-कौतूहल का अद्भुत वर्णन बहुत हो चुका। न परकीयाओं पर प्रबन्ध लिखने की अब कोई आवश्यकता है और न स्वकीयाओं के ‘गतागत’ की पहेली बुझाने की। चींटी से लेकर हाथीपर्यन्त पशु, भिक्षुक से लेकर राजापर्यन्त मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्रपर्यन्त जल, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत सभी पर कविता हो सकती है” (रसज्ञ रंजन)।
उन्होंने कविता के लिए शास्त्रोक्त गुणों से हटकर पाँच बातों की आवश्यकता पर बल दिया –
- 1. साधारण लोगों की अवस्था, विचार और मनोविकारों का वर्णन,
- 2. धीरज, साहस, प्रेम, दया आदि गुणों का समावेश,
- 3. सूक्ष्म कल्पना और गूढ़ अलंकार योजना का निषेध,
- 4. भाषा की सहजता, स्वाभाविकता और मनोहरता पर बल,
- 5. सीधे, परिचित और सुहावने छन्दों का प्रयोग (रसज्ञ-रंजन) ।
द्विवेदीजी के सामने संस्कृत-आचार्यों के अतिरिक्त लॉर्ड मैकाले, गोल्ड स्मिथ, ऑस्कर वाइल्ड, मिल्टन, बाइरन, कार्लाइल और वर्ड्सवर्थ के कविता-सम्बन्धी विचार थे। इनसे उनका प्रभावित होना स्वाभाविक था।
कविता के सम्बन्ध में उन्होंने एक बहुत बड़ी बात यह कही कि उसके द्वारा ‘असंभव को भी संभव’ किया जा सकता है’। (रसज्ञ रंजन)।
इस प्रकार द्विवेदीजी की दृष्टि में कविता सहृदय के हृदय को आह्लादित ही नहीं करती, वह समाज में परिवर्तन भी ला सकती है।
आचार्य द्विवेदी के बाद भी परम्परागत काव्य-लक्षण के पुनराख्यान की परम्परा चलती रही। इस क्रम में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, श्री नन्ददुलारे वाजपेयी, श्री जयशंकर प्रसाद, और डॉ० नगेन्द्र द्वारा निरूपित काव्य-लक्षण उल्लेखनीय हैं।
“जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं।”
– रसमीमांसा’ – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
“कविता ही मनुष्य के हृदय को स्वार्थ-सम्बन्धों के संकुचित मण्डल से ऊपर उठाकर लोक-सामान्य भाव-भूमि पर ले जाती है जहाँ जगत् की नाना गतियों के मार्मिक स्वरूप का साक्षात्कार और शुद्ध अनुभूतियों का संचार होता है।”
– रसमीमांसा’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
“काव्य तो प्रकृत मानव अनुभूतियों का, नैसर्गिक कल्पना के सहारे, ऐसा सौन्दर्यमय चित्रण है जो मनुष्य-मात्र में स्वभावतः अनुरूप भावोच्छ्वास और सौन्दर्य-संवेदन उत्पन्न करता है। इसी सौन्दर्य-संवेदन को भारतीय पारिभाषिक – शब्दावली में ‘रस’ कहते हैं।”
‘आधुनिक साहित्य’– नन्ददुलारे वाजपेयी
“काव्य आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है, जिसका संबंध विश्लेषण, विकल्प या विज्ञान से नहीं है।”
‘काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध’– जयशंकर प्रसाद
“आत्मा की मनन शक्ति की वह असाधारण अवस्था जो श्रेय सत्य को उसके मूल चारुत्व में सहसा ग्रहण कर लेती है, काव्य में संकल्पात्मक मूल अनुभूति कही जा सकती है।”
‘काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध’– जयशंकर प्रसाद
“रसात्मक शब्दार्थ ही काव्य है और उसकी छन्दोमयी विशिष्ट विधा आधुनिक अर्थ में कविता है।”
‘आस्था के चरण’–डॉ. नगेन्द्र
उपर्युक्त काव्य-लक्षणों पर विचार किया जाय तो स्पष्ट हो जायगा कि प्रायः सभी में संस्कृत के आचार्यों की अवधारणा के समावेश के साथ युग के अनुसार कुछ और जोड़ने की प्रवृत्ति विद्यमान है।
निष्कर्ष
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हृदय की मुक्ति’ अर्थात् ‘रसदशा’ तक पहुँचाने वाले शब्द-विधान को कविता कहकर साहित्यदर्पणकार के काव्य-लक्षण की ओर अपना झुकाव स्पष्ट कर दिया है। साथ ही मनुष्य के हृदय को ‘लोक-सामान्य-भाव-भूमि’ पर ले जाने की बात कहकर उन्होंने उसके उद्देश्य को एक नया आयाम भी दिया है। उनकी दृष्टि में कविता केवल सहृदय को आह्लादित ही नहीं करती वरन् उसके हृदय को सभी प्रकार के स्वार्थों से मुक्त करके उस भूमि पर ले जाती है जहाँ मनुष्य-मात्र में एक ही भाव-धारा तरंगित है जो मनुष्यता की सहज भूमि है।
डॉ० नगेन्द्र तो पाश्चात्य काव्य-लक्षणों से अच्छी तरह परिचित होने के बावजूद रसात्मक शब्दार्थ को ही काव्य मानते हैं। वस्तुतः उनकी काव्य-दृष्टि मूलतः ‘रोमानी’ है और रोमानी काव्य-दृष्टि का भारतीय रस-दृष्टि से सामञ्जस्य बैठाना कठिन नहीं है। डॉ० नगेन्द्र ने अपनी मान्यताओं में थोड़ी खींचतान के बावजूद यह सामञ्जस्य बैठाने का प्रयत्न किया है।
श्री नन्ददुलारे वाजपेयी काव्य में मानव-अनुभूतियों के सौन्दर्यमय चित्रण (नैसर्गिक कल्पना के सहारे) और मनुष्य-मात्र में तदनुरूप सौन्दर्य-संवेदन उत्पन्न करने की उसकी क्षमता की बात कहकर स्पष्ट रूप से पाश्चात्य सौन्दर्य-चिन्तन को आत्मसात् करते हुए प्रतीत होते हैं। साथ ही पाश्चात्य सौन्दर्य-संवेदन को भारतीय ‘रस’ का पर्याय मानकर वे दोनों दृष्टियों में सामञ्जस्य स्थापित कर लेते हैं।
काव्य के स्वरूप के सम्बन्ध में जयशंकर प्रसाद जी की अवधारणा अवश्य मौलिक है। वे काव्य को ‘आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति’ मानते हैं। उपनिषदों के आधार पर वे ‘आत्मा को वाङ्मय, मनोमय और प्राणमय मानते हैं। इस प्रकार आत्मा की अनुभूति का मनन-प्रधान और प्राणमय होना स्वाभाविक है। वाक्-शक्ति भी आत्मा की मौलिक क्रिया है। इसलिए आत्मा अपनी मनन-शक्ति के साथ जब श्रेय सत्य को उसके मूल चारुत्व में ग्रहण कर लेगी तो उसकी शाब्दिक अभिव्यक्ति भी होगी। इस प्रकार काव्य आत्मा की उस मौलिक क्रिया का परिणाम है जो अपनी अभिव्यक्ति में शब्द-प्रधान और अनुभूति में चारुत्वमय श्रेय सत्य से अभिन्न है। इस अवधारणा में आत्मपक्ष पर अधिक बल दिया गया है और सब मिलाकर यह लक्षण आध्यात्मिक अधिक है, व्यावहारिक कम।
वस्तुतः आधुनिक काव्य-चिन्तकों में ‘प्रसाद’ जी ही पाश्चात्य काव्य-चिन्तन से प्रभावित नहीं थे। शेष सभी के सामने अंग्रेजी के कवियों और समीक्षकों द्वारा निरूपित काव्य-लक्षण थे।
यह अवश्य है कि हिंदी के प्रायः सभी विचारकों ने संस्कृत के आचार्यों द्वारा निरूपित काव्य-लक्षणों को आधार-रूप में ग्रहण करके पाश्चात्य मतों का उनके साथ सामञ्जस्य स्थापित किया है।
आधुनिक काव्य-चिन्तकों के सम्बन्ध में विचार करते समय यह भी ध्यातव्य है कि उनकी अवधारणाएँ उनके पूरे वक्तृत्व में बिखरी हुई हैं। काव्य की परिभाषा या उसका लक्षण निर्धारित करने में वे उतने सावधान या सतर्क नहीं हैं जितने सावधान या सतर्क संस्कृत के आचार्य थे। संस्कृत के आचार्यों की शैली सूत्र-शैली थी। वे कम से कम शब्दों का प्रयोग करके अधिक से अधिक कहना चाहते थे।
आधुनिक काल में काव्य के यथार्थोन्मुख और समाज-सापेक्ष चिन्तन से प्रभावित होने के कारण उसकी अवधारणा की प्रक्रिया में भी गति आई है। ऊपर जिन समीक्षकों और कवियों द्वारा निरूपित काव्य-लक्षण उद्धृत किए गए हैं वे ‘छायावाद’ युग की विभूति हैं।
1936 के बाद हिंदी काव्य-चिन्तन मार्क्सवादी विचारधारा से प्रभावित हुआ। यह माना गया कि काव्य का आधार आर्थिक उत्पादन-प्रणाली है। उसमें व्यक्त भावों में सामूहिक चेतना बिम्बित होती है। उसका सौन्दर्य वस्तुनिष्ठ होता है और उसे सामाजिक परिवर्तन के लिए अस्त्र के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
‘नयी कविता’ के प्रथम दौर में कवि को मानव-व्यक्तित्त्व की स्वाधीनता, सर्जनात्मकता, संवेदनशीलता और दायित्व-बोध का अन्वेषी और कविता को इनकी अभिव्यक्ति का माध्यम माना गया और अब उसे बेहतर दुनिया या प्रजातन्त्र के विकल्प की तलाश है। कविता अब वास्तविकता के सीधे साक्षात्कार का माध्यम बन गई है।
अब नये आलोचक काव्य के स्वरूप-निर्धारण में संस्कृत-आचार्यों की अवधारणा को प्रासंगिक नहीं मानते। यह दूसरी बात है कि अन्ततः शब्द और अर्थ के सहभाव से ही किसी भी विचारधारा, संवेदना, सह-अनुभूति, द्वन्द्व, तनाव, विसंगति या मूल्यहीनता की अभिव्यक्ति संभव है।
रूप-रस-वर्ण, स्पर्शगंधी बिम्ब-योजना या संवेदनाजन्य-कल्पना और यथार्थ की टकराहट की अभिव्यक्ति के लिए भी अन्ततः कवि को सटीक शब्दों की ही तलाश करनी पड़ेगी इसलिए परवर्ती संस्कृत आचार्यों-रसवादी, रमणीयतावादी, आनन्दवादी- की अवधारणाएँ आज भले ही अप्रासंगिक हो जायँ किन्तु ‘शब्दार्थों सहितौ काव्यं’ की मूल मान्यता का अतिक्रमण तो कभी भी संभव न होगा !

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