आधुनिक काल के पाश्चात्य समीक्षकों में टी.एस.इलियट (1888-1965 ई.) का नाम अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनका जन्म सेन्ट लुई (अमेरिका) में हुआ, किन्तु शिक्षा पेरिस और लंदन में हुई । बाद में वे लंदन में बस गए । वे बीसवीं सदी के महान कवियों और आलोचकों में गिने जाते हैं। उन्हें 1948 ई. में साहित्य का नोबल पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। इलियट की सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना “Tradition and Individual Talent” है जिसमें साहित्य की आधारभूत एवं मौलिक समस्याओं पर प्रभावी ढंग से विचार किया गया है।
आलोचना के क्षेत्र में उनके अत्यंत महत्वपूर्ण निबंध इस प्रकार हैं : Tradition and Individual Talent, Poetry and Drama, The Function of Criticism, The English Metaphysical Poets, The Frontiers of Criticism.
टी.एस.इलियट बीसवीं सदी के महत्वपूर्ण अंग्रेजी कवि और आलोचक हैं। वे अंग्रेजी कविता के महत्वपूर्ण आधुनिक कवि हैं। इलियट, अंग्रेजी स्वच्छन्दतावादी कवि और आलोचक वर्ड्सवर्थ एवं कॉलरिज की काव्य संबंधी स्थापनाओं के विरुद्ध अर्थात् स्वच्छन्दतावाद विरोधी स्थापनाओं के लिए जाने जाते हैं।
इलियट ने अंग्रेजी कविता एवं आलोचना में आधुनिकता का पथ प्रदर्शन किया तथा अंग्रेजी आलोचना की स्थापनाओं के विरुद्ध नई मान्यताएँ प्रस्तुत की। इसके अतिरिक्त उन्होंने अंग्रेजी के महान रचनाकारों शेक्सपीयर, मिल्टन तथा बेन जॉनसन आदि का पुनर्मूल्यांकन किया।
टी. एस. इलियट ने आलोचना के कुछ सिद्धान्त निर्मित किए जिनमें – परम्परा की अवधारणा (सिद्धान्त), वस्तुनिष्ठ सहसंबंध (समीकरण) का सिद्धान्त,निर्वैयक्तिकता का सिद्धान्त जैसे सिद्धान्त प्रमुख हैं।
परम्परा की अवधारणा और अन्य आयाम
टी.एस.इलियट ने परम्परा को आधुनिकता के संदर्भ में रखकर देखा और उसका मूल्यांकन किया। टी.एस.इलियट की परम्परा की अवधारणा को जानने से पहले परम्परा के सामान्य अर्थ को समझते हैं। परम्परा वास्तव में एक समाजशास्त्रीय पद है। सामान्य रूप से जब हम परम्परा शब्द का उपयोग करते हैं तब हमारा आशय होता है अतीत से चली आ रही प्रथाएँ, रीति-रिवाज, किन्तु किसी भी अर्थ में परंपरा से हमारा तात्पर्य रूढ़ियों से नहीं होता। हमारा अर्थ होता है कि लम्बे समय से जो आचार-व्यवहार हम कर रहे हैं वह हमारी परम्परा है।
अब हम समाजशास्त्रीय सदर्भ में इसको समझने की कोशिश करेंगे।भारतीय समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे के अनुसार “परम्परा संस्कृति का वह भाग है जिसमें भूतकाल से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य तक निरन्तरता बनी रहती है।”
इसका अभिप्राय यह है कि परम्परा अतीत की कोई स्थिर इकाई नहीं है अपितु इसमें निरन्तरता बनी रहती है।इसी निरन्तरता के कारण परम्परा में जड़ता नहीं आती और वह अतीत तथा वर्तमान दोनों से जुड़ी रहती है।
इसका एक पक्ष यह भी है कि परम्परा को न तो रूढ़ि (नकारात्मक प्रथा) कहा जा सकता है और न ही उसे वर्तमान से अलग या पृथक माना जा सकता है। इसी बात को टी.एस.इलियट ने समझाते हुए कहा कि परम्परा का उद्देशय अत्यंत व्यापक होता है, महान होता है। इसमें सबसे पहले ‘इतिहास बोध’ शामिल होता है और इतिहास बोध में एक दृष्टि निहित रहती है जो न केवल अतीत के अतीत्व (Pastness) की अपितु उसकी वर्तमानता की भी अभिव्यक्ति होती है।
टी.एस.इलियट के इस कथन का अभिप्राय यह है कि परम्परा का न केवल एक निश्चित उद्देश्य होता है अपितु उसका एक बड़ा लक्ष्य होता है।
यह इतिहास बोध से जुड़ी होती है और जब इतिहास बोध का अध्ययन किया जाता है तब न केवल इतिहास के ऐतिहासिक घटनाक्रम अर्थात् अतीत्व की चर्चा होती है
अपितु उसकी वर्तमानता की भी चर्चा होती है।
परम्परा के संदर्भ में टी.एस.इलियट की मान्यताओं के कई आयाम है जिसमें पुराने और नए रचनाकारों का तुलनात्मक अध्ययन साहित्यिकारों का मूल्यांकन तथा वैयक्तिक प्रतिभा (वैयक्तिक प्रज्ञा या व्यक्तिगत प्रज्ञा) के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण शामिल है। इस संदर्भ में अब आगे विस्तृत उल्लेख किया जाएगा।
परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा (Tradition and Individual Talent)
टी.एस.इलियट ने एक महत्त्वपूर्ण लेख लिखा ‘Tradition and Individual Talent’ (परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा)। उनके इस बहु-चर्चित लेख में परम्परा की अवधारणा का विस्तृत विवेचन मिलता है। इसके साथ ही रचनाकार की वैयक्तिक प्रतिभा का रचना-शीलता में क्या योगदान होता है इसका भी विस्तृत विवेचन मिलता है।
‘परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा’ नामक यह लेख तीन खण्डों में विभाजित है।पहले भाग में परम्परा की व्याख्या की गई है जबकि दूसरे भाग में ईमानदार आलोचना (Honest Criticism) तथा संवेदनशील प्रशंसा (Sensitive Appreciation) का विवेचन है तथा तीसरा हिस्सा सारांश के रूप में प्रस्तुत है, जो अत्यन्त संक्षिप्त है और कवि और कविता के सरोकारों का सूत्रात्मक विवेचन करता है।
‘परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा’ नामक लेख इतना चर्चित रहा है कि उसे हिंदी आलोचना में परम्परा के संदर्भ में प्रायः मापदंड (प्रतिमान) माना जाता है। अज्ञेय का चर्चित निबंध ‘रूढ़ि और मौलिकता’ टी.एस.इलियट के इस निबंध ‘परम्परा और वैयक्तिक प्रतिभा’ से न केवल स्पष्ट रूप से प्रभावित है बल्कि उसे उसका भावानुवाद भी माना जाता है।
इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि इलियट का यह लेख न केवल साहित्यिक विमर्श में अत्याधिक चर्चित है अपितु पाश्चात्य काव्य चिन्तन में इलियट के योगदान का एक महत्त्वपूर्ण आधार भी है।
जैसा कि प्राय: साहित्यिक विमर्श एवं आलोचनात्मक मूल्यांकन में होता है, प्राय: यह प्रवृत्ति देखी जाती है कि किसी रचनाकार को समकालीन रूप से प्रासंगिक सिद्ध न करना हो और उसे कमतर महत्व का साबित करना हो तो सबसे आसान रास्ता होता है उसे परम्परावादी सिद्ध कर देना।
अंग्रेजी आलोचना की इसी प्रवृत्ति को स्पष्ट करते हुए इलियट कहते हैं कि प्रायः हम यह कहते हैं कि किसी के यहाँ परम्परा का अभाव देखा गया है। हम यह नहीं कह सकते कि किसी रचनाकाल में कोई विशेष परम्परा दिखाई देती है या कोई भी परम्परा पाई जाती है। कभी-कभी यह कहा जाता है कि कोई पारम्परिक है अथवा अत्यधिक पारम्परिक है। ऐसा इसलिए होता है कि किसी को पारम्परिक कहना एक निन्दापरक टिप्पणी होती हैं।
इसका आशय यह है कि आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता के दौर में परम्परा की सार्थकता सीमित हो गई प्रतीत होती है किन्तु जब हम परम्परा का सही संदर्भ में अध्ययन करते हैं तो परम्परा अप्रासंगिक नहीं अपितु उपयोगी और मूल्यवान बन जाती है।
इलियट का मानना है कि आलोचना वैसे ही अपरिहार्य है जैसी हमारी साँसे और हमें कोई भी पुस्तक पढ़ते समय जो अनुभूति होती है उसको व्यक्त करने के लिए हमारा मस्तिष्क एक आलोचनात्मक विवेक से काम करता है। ऐसी स्थिति में हम कवि की व्यक्तिगत विशेषताओं को ध्यान में रखते हैं। हम कह सकते हैं कि इलियट इस स्थिति में कवि की वैयक्तिक प्रतिभा की बात करते हैं किन्तु यह वैयक्तिक प्रतिभा कवि के पूर्ववर्त्ती कवि से तुलना के बाद ही पता चलती है।
इलियट मानते हैं कि परम्परा का वह रूप जो अपनी पिछली पीढ़ी तक ही सीमित रहता है तो इस प्रकार की परम्परा को महत्व नहीं देना चाहिए बल्कि उसे हतोत्साहित किया जाना चाहिए। परम्परा का व्यापक महत्व होता है। परम्परा के तत्व को आसानी से नहीं पाया जा सकता अपितु इसके मूल्य को ग्रहण करने के लिए कठिन परिश्रम की आवश्यकता होती है।
परम्परा को समझने के लिए यह जानना होगा कि परम्परा में सबसे पहले ‘इतिहास बोध’ निहित होता है। इलियट के ऐसा मानने का अर्थ यह है कि कवि निश्चय ही अपने पूर्ववर्ती कवियों को ध्यान में रखते हैं।
प्रश्न उठता है कि यह ‘इतिहास बोध’ क्या है? तो इलियट मानते है कि यह इतिहास बोध उस मान्यता पर निर्भर करता है जो न केवल अतीत के अतीतत्व बल्कि उसकी उपस्थिति या उसके विद्यमान होने को बराबर महत्व प्रदान करता है । यह इतिहास बोध ही कवि को अपनी परम्परा से जोड़ता है। इसमें कवि अपनी पीढ़ी को ही नहीं अपितु अपनी पूरी परम्परा को ध्यान में रखता है यह इतिहास बोध ही लेखक या रचनाकार को पारम्परिक बनाता है।
परम्परा का अभिप्राय अंधानुकरण नहीं है। यदि परम्परा अन्धानुकरण हो जाय तो उस परम्परा को ग्रहण करना उपयुक्त नहीं अपितु उसकी तुलना में नव्यता या नूतनना ही उपयुक्त होती है।
परम्परा की यह अवधारणा इलियट ने प्रस्तावित की किन्तु भारतीय परिदृश्य में भी परम्परा कोई जड़गत वस्तु नहीं है।
हिंदी साहित्यकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भी परम्परा को गतिशील प्रक्रिया माना है ।उनके अनुसार “परम्परा का शब्दार्थ है एक का दूसरे को दूसरे का तीसरे को दिया जाने वाला क्रम। ‘परम्परा’ जीवंत प्रक्रिया है जो अपने परिवेश के संग्रह-त्याग की आवश्यकताओं के अनुरूप निरन्तर क्रियाशील रहती है। कभी-कभी इसे गलत ढंग से अतीत के सभी आचार-विचारों का बोधक मान लिया जाता है।”
द्विवेदी जी के इस कथन का अभिप्राय यह है कि परम्परा एक सक्रिय और गतिशील प्रक्रिया है। इसे प्राचीनता का पर्याय नहीं माना जा सकता। यह जड़ और निष्क्रिय तत्व भी नहीं है अपितु इसमें एक प्रवाहमानता (गतिशीलता) भी होती है। इलियट की परम्परा की अवधारणा इससे भिन्न नहीं है।
परम्परा के आलोक में रचनाकार का मूल्यांकन एवं तुलनात्मक अध्ययन
परम्परा एक सतत प्रक्रिया है। वह एक प्रवाहमान (गतिशील) तत्व है।जब हम परम्परा की इस अवधारणा को स्वीकार कर लेते हैं तब यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी रचनाकार या कलाकार परम्परा निरपेक्ष (तटस्थ) नहीं रह सकता। किसी न किसी रूप में वह परम्परा के परिप्रेक्ष्य में ही रचनात्मकता को अभिव्यक्त करता है।
इस दृष्टि से देखें तो किसी भी रचनाकार या सर्जक को अपने समकालीन परिवेश के अतिरिक्त अपनी परम्परा और उसके सन्दर्भों को भी समझना पड़ता है। कवि या कलाकार अपनी रचनात्मक निर्मिति न केवल उस परम्परा बोध या इतिहास-बोध से जुड़कर करता है, अपितु उसका मूल्यांकन भी परम्परा के आलोक में, परम्परा के संदर्भ में ही किया जाता है।
यह संदर्भ कैसा हो, मूल्यांकन का आधार क्या हो, मूल्यांकन के प्रतिमान (मानक या स्टैंडर्ड) क्या हों, इन सभी बातों का उत्तर तो तभी मिल पाएगा, जब हम वर्तमान पीढ़ी के साथ ही नहीं पुरानी पीढ़ी, बल्कि अतीत के कवियों अर्थात् पारंपरिक कवियों के साथ विवेच्य कृति का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे।
इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी कवि का मूल्यांकन किया जाना हो तो अतीत के कवि के साथ उसके रचनात्मक वैभव और रचनात्मक विशिष्टताओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना आवश्यक होगा।
टी.एस.इलियट ने अपने ढंग से इस बात को समझाया है।उनके शब्दों में “कोई भी कवि या किसी भी कला का कोई भी कलाकार अकेले अपने स्तर पर सार्थक नहीं होता। उसकी महत्ता और उसकी प्रशंसा मृत कवियों और कलाकारों के साथ उसके सम्बन्धों के आधार पर निर्धारित होती है।
आप उसका अकेले मूल्यांकन नहीं कर सकते। आपको उसको मृत कवियों के साथ समानता और असमानता दोनों स्तरों पर अध्ययन करना पड़ेगा। मेरा अभिप्राय यह है कि यह एक सौन्दर्य सिद्धान्त है, केवल ऐतिहासिक आलोचना नहीं।”
इलियट की इस व्याख्या के तीन प्रमुख बिन्दु हैं :
1) कोई भी रचनाकार या कलाकार अपनी परम्परा से अलग हटकर या पूरी तरह पृथक होकर रचना नहीं कर सकता।
2) किसी भी कलाकृति या रचना तथा रचनाकार का मूल्यांकन केवल उस कृति या कृतिकार के स्तर पर नहीं किया जा सकता।
3) किसी कृति या कृतिकार के मूल्यांकन का आधार प्राचीन अर्थात् मृत कवियों, कलाकारों की रचनाओं या कलाकृतियों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर ही संभव है। इस प्रक्रिया में दोनों की समानताओं और असमानताओं का विश्लेषण करना आवश्यक होता है।
टी.एस.इलियट द्वारा प्रतिपादित परम्परा की इस संकल्पना और परम्परा के आलोक में रचनाकार के मूल्यांकन और तुलनात्मक अध्ययन को भारतीय सन्दर्भ में देखें तो एक उदाहरण सर्वाधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।
यदि हम हिंदी के श्रेष्ठ कवि तुलसीदास की सुप्रसिद्ध रचना ‘रामचरित मानस’ के मूल्यांकन की बात करें तो हमें निश्चय ही रामकथा का मूलाधार वाल्मीकि द्वारा रचित ‘रामायण’ से उसकी तुलना करने पर ही उसका समुचित मूल्यांकन कर पाना संभव होगा। दोनों के तुलनात्मक अध्ययन के दौरान दोनों कृतियों के साम्य-वैषम्य (समानता और असमानता) को स्पष्ट करना होगा। उसके द्वारा ही उनका मूल्यांकन संभव हो पाएगा।
इसी प्रकार जब हम मैथिलीशरण गुप्त की रचना ‘साकेत’ का मूल्यांकन करेंगे तब हमें ‘रामचरित मानस’ के साथ तुलना करके उसका मूल्यांकन करना होगा। यही नहीं संभव हो तो इन तीनों का तुलनात्मक अध्ययन करें तभी परम्परा के परिप्रेक्ष्य में (संदर्भ में) वास्तविक मूल्यांकन संभव हो पाएगा।
यदि परम्परा की इस निरन्तरता को अन्य रचनाकारों एवं रचनाओं के आलोक में देखें तो पता चलेगा कि कृति अपनी परम्परा में कितनी प्रासंगिक एवं सार्थक है। उदाहरण के लिए, यदि इसमें निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ को भी जोड़ लिया जाए तो सभी कृतियों के साम्य-वैषम्य के विश्लेषण के परिप्रेक्ष्य में रचनाओं का वास्तविक मूल्यांकन संभव हो सकेगा। इस प्रकार कहा जा सकता है कि परम्परा के संदर्भ में ही रचना अपनी सार्थकता और गुणवत्ता सिद्ध करती है।
अब एक दूसरे उदाहरण से भी इसे समझने की कोशिश करते हैं।हिंदी साहित्य का भक्तिकाल रचनात्मकता की दृष्टि से अत्यधिक समृद्ध है । किन्तु इन रचनाओं का सरोकार (लगाव या जुड़ाव) कहीं-न-कहीं परम्परा से इतना गहरा जुड़ा है कि उसे अलग-थलग करके समझना कठिन हो जाता है। अभी हमने रामकथा के सन्दर्भ में परम्परा के आलोक में रचनाकार के मूल्यांकन और उस परम्परा से जुड़े कवियों तथा काव्य कृतियों के तुलनात्मक अध्ययन की चर्चा की।
इसी क्रम में यदि हम कृष्ण-क्ति काव्य की परम्परा और रचनाकारों के तुलनात्मक अध्ययन की बात करें तो कुछ उपयुक्त और प्रासंगिक सदर्भों का उल्लेख करना आवश्यक जान पड़ता है।
हम सूरदास की रचनाओं का संदर्भ ग्रहण करते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि बल्लभाचार्य द्वारा प्रतिपादित पुष्टिमार्ग की परम्परा से सूरदास जुड़े थे। वे अष्टछाप के कवि थे और बल्लभाचार्य के शिष्य भी । सूरदास की रचनाओं का स्रोत ‘श्रीमद्भागवत (भागवत पुराण) का ‘दशम स्कंध’ है। यहाँ से प्रभाव ग्रहण किया गया है, किन्तु सूरदास की कल्पना शक्ति और उनकी काव्य प्रतिभा काव्यशैली का वैशिष्ट्य (विशिष्टता) प्रदर्शित करती है । अतः अब हमे सूरदास का मूल्यांकन करना हो तो ‘भागवत पुराण’ के आलोक (को ध्यान में रखकर) में करना होगा।
इसी प्रकार कृष्ण-भक्ति की परम्परा में आधुनिक काल में जो रचनाएँ लिखी गई उदाहरण के लिए, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की रचना ‘प्रियप्रवास’ का मूल्यांकन करते समय सूरदास की रचनाशीलता को ध्यान में रखना होगा। इनके बीच तुलना करके हम किसी निष्कर्ष तक पहुँच सकते हैं।
यह बात सही है कि कृति के मूल्यांकन का यह सर्वोत्तम प्रतिमान (मानक या स्टैंडर्ड) नहीं हो सकता क्योंकि रचनाकार अपने समकालीन परिदृश्य, काव्यशैली तथा काव्यभाषा और सरोकारों को ध्यान में रखकर रचना करता है। यही नहीं वह अपने समकालीन परिदृश्य से प्रभावित हुए बिना रह ही नहीं सकता। इसलिए सिर्फ परम्परा के परिप्रेक्ष्य में ही रचनाकार का मूल्यांकन होना चाहिए तथा तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर ही मूल्यांकन संभव है, यह मान्यता पूर्णतः स्वीकार्य नहीं है।
इसके बावजूद यह कहना भी उतना ही उपयुक्त एवं स्वीकार्य नहीं होगा कि परम्परा तथा प्राचीन रचनाशीलता को पूर्णतः अस्वीकार करके किसी कवि या रचना का मूल्यांकन संभव है। परम्परा से पूर्णतः अलग होकर मूल्यांकन संभव नहीं,न ही परम्परा की पूर्णतः उपेक्षा हो सकती है, और यह भी सही है कि सिर्फ परम्परा ही मूल्यांकन का आधार नहीं हो सकती।
इस तरह कहा जा सकता है कि टी. एस.इलियट की परम्परा की अवधारणा तथा कवियों एवं कृतियों के मूल्यांकन के लिए पारंपरिक रचनाशीलता का अपना महत्व अवश्य होता है।
निष्कर्ष
संक्षेप में, टी.एस.इलियट की परंपरा और वैयक्तिक प्रतिभा संबंधी मान्यताओं को इस प्रकार रखा जा सकता है –
1. यूरोपीय परंपरा पर विचार करते हुए इलियट ने यह सिद्धान्त दिया कि ‘प्रत्येक राष्ट्र और प्रत्येक प्रजाति की अपनी सर्जनात्मक ही नहीं, आलोचनात्मक मानसिकता भी हुआ करती है।’
2. किसी रचनाकार की महत्व प्रतिष्ठा करते समय हम प्रायः उसकी वैयक्तिक विशिष्टताएँ (व्यक्तिगत विशेषताएँ ) खोजकर दिखाने का प्रयत्न करते हैं। उसके पूर्ववर्ती कवियों से उसकी भिन्नता (असमानता या विशिष्टता) को पहचानने में ही हमें प्रसन्नता होती है।
किंतु यदि हम ठीक से खोजबीन करें तो पाएँगे कि किसी कवि की रचना के श्रेष्ठ ही नहीं सर्वथा वैयक्तिक पक्ष भी वही होते हैं, जिनमें उसके पूर्ववर्ती रचनाकारों का प्रभाव प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुआ होता है। जाहिर है कि ‘वैयक्तिक प्रतिभा’ परंपरा से विच्छिन्न (अलग, काटकर अलग किया हुआ), निरपेक्ष या असम्बद्ध वस्तु नहीं है।
3. परंपरा से गहरे अर्थों में जुड़कर ही कवि अपनी वैयक्तिक सामर्थ्य (वैयक्तिक प्रतिभा) को अधिक प्रभावी रूप में उजागर कर सकता है। हिंदी में तुलसीदास और निराला इसके अच्छे उदाहरण है कि कैसे रामकाव्य परंपरा से जुड़कर इन कवियों ने ‘रामचरितमानस’ और ‘राम की शक्ति पूजा’ को नूतन काव्योत्कर्ष में ढाल दिया। इन कृतियों में ‘वैयक्तिक प्रतिभा’के प्रस्फुटन में परंपरा बाधक न बनकर सहायक सिद्ध हुई है।
4. रचनाकार के लिए परंपरा साँस की तरह सहज, स्वाभाविक, अनिवार्य और नैसर्गिक क्रिया है। कुछ भी सोचते-सुनते-पढ़ते समय उसके गुण-दोषों का अहसास मानव विवेक स्वयं करता चलता है।
5. अभिव्यक्ति या रचना प्रक्रिया में कभी परंपरा मौन होती है, कभी मुखर। कभी टकराहट संघर्ष की मुद्रा में होती है, कभी विपरीत दिशा में। लेकिन परंपरा का रचनाकार के साथ एक संघर्ष-संवाद बराबर चलता रहता है।
6. परंपरा के प्रति गहरे लगाव का अर्थ हठधर्मिता (जिद) या अंधानुकरण एकदम नहीं है। अंधानुकरण से मौलिकता नष्ट हो जाती है।
7. परंपरा की व्यापक अर्थवत्ता (अर्थ की संपन्नता) तो सृजन कर्म की नवीनता-मौलिकता में ही प्रतिफलित होती है। इलियट ने जोर देकर कहा कि “परंपरा को दाय (उत्तराधिकार से प्राप्त) या विरासत के रूप में प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसकी प्राप्ति के लिए कठोर तप-साधना या श्रम आवश्यक है।”
8. परंपरा का अर्थ है – इतिहास बोध (historical sense) । कवि में ‘इतिहास बोध’ होना चाहिए। इतिहास-बोध का तात्पर्य अतीत के अतीतत्व का ही नहीं है, अपितु उसकी वर्तमानता का अनुभव भी है। (Perception, not only of the pastness of the past, but of its presence) ‘इतिहास-बोध’ अपनी पीढ़ी के रचना-कर्म को ध्यान में रखकर लिखना नहीं है, बल्कि उसमें होमर-वर्जिल से लेकर पूरे यूरोप के साहित्य, साथ ही अपने देश के समग्र साहित्य, दोनों का अस्तित्व हुआ करता है।
9. हिंदी में ऐसी ही परंपरा को अर्जित करने का परिश्रम जयशंकर प्रसाद और अज्ञेय के सृजन-कर्म में दिखाई देता है। इलियट यदि अपने सृजन में अपने पुरखों- होमर आदि को बोलते पाते हैं तो हम प्रसाद जी के सृजन में अपने वैदिक ऋषियों की वाणी की अनुगूँज सुनते हैं।
यह भी ध्यान देने की बात है कि कवि आलोचक अज्ञेय को जब टी.एस. इलियट के निबंध ‘ट्रेडिशन एंड दि इंडिविजुअल टैलेन्ट’ का अनुवाद ‘रुढ़ि और मौलिकता’ नाम से करने की प्रेरणा मिली तो इस प्रेरणा के मूल में अपनी परंपरा की रुढ़ि या बासीपन को झाड़कर मौलिकता को ग्रहण करने की समस्या थी। उसे रचनात्मक अनुभूति के स्तर पर एक जीवंत परंपरा के रूप में आत्मसात करने की समस्या थी।
10. इलियट का मानना है कि ‘परंपरा’ कोई मृत वस्तु नहीं है। जो मृत या निरर्थक है उसे ‘परंपरा’ की संज्ञा देना ही समीचीन (ठीक) नहीं है। वस्तुतः परंपरा एक सातत्य है, निरंतरता है, अविच्छिन्न (अविरल) प्रवाह है जो अतीत के साहित्यिक-सांस्कृतिक दाय (विरासत में प्राप्त) अथवा धरोहर या विरासत के उत्तमांश से वर्तमान को सम्पन्न और सार्थक बनाती है तथा भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करने का महत्वपूर्ण कार्य करती है। इस दृष्टि से परंपरा का विस्तार देश और काल दोनों में होता है।
11. परंपरा के संदर्भ में विशेष बात यह है कि किसी भी कवि या कलाकार की अर्थवत्ता (अर्थ की संपन्नता) केवल अपने आप अकेलेपन में नहीं होती। उसकी सही अर्थवत्ता, उसकी प्रशंसा दिवंगत या पूर्ववर्ती कवियों-कलाकारों की सापेक्षता में ही होती है।
12. उसका अकेलेपन में मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, साम्य-वैषम्य के लिए उसे पूर्ववर्ती रचनाकारों के साथ रखकर देखना आवश्यक है।
इसके पीछे तर्क यह है कि जब भी किसी नयी कलाकृति की रचना होती है तो उसके साथ पूर्ववर्ती सभी कृतियों का थोड़ा-बहुत तालमेल बैठाना (Adjustment) अनिवार्य हो जाता है।
13. नवीन कृति के आविर्भाव के पूर्व विद्यमान कलाकृतियों की एक स्थिर व्यवस्था होती है जो नवीन कृति के आने से कुछ न कुछ परिवर्तित हो जाती है। नयी कृति पुरानी कृतियों को अपनी जगह से ठेलकर अपने लिए जगह बनाती है- साम्य-वैषम्य के निर्धारण में किसी कृति का महत्व बढ़ जाता है, किसी का घट जाता है। ‘अतीत को वर्तमान से उसी तरह परिवर्तित होना चाहिए जिस तरह वर्तमान अतीत से नियंत्रित-निर्देशित होता है।’
14. उल्लेखनीय है कि कवि को अतीत या परंपरा का ज्ञान तो होना चाहिए किंतु यह ज्ञान इतना भारी न पड़े कि कवि चेतना को आक्रान्त कर ले। प्राय: बहुत बार अतिशय अतीत ज्ञान के बोझ से काव्य संवेदना (Poetic sensibility) या तो निर्जीव हो जाती है या प्रभावहीन होकर बिखर जाती है।
15. कवि के लिए अतीत की चेतना को विकसित करते रहना जरूरी है और उसे आजीवन विकसित करते रहना चाहिए। ‘कलाकार की प्रगति सतत आत्म-बलिदान (Self-sacrifice) में है, व्यक्तित्व के सतत आत्म-समर्पण (Extinction) में है। व्यक्तित्व के इस निर्वैयक्तीकरण (Depersonalization) से ही कला विज्ञान की स्थिति को प्राप्त कर सकती है।’

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