कॉलरिज का पूरा नाम सैमुअल टेलर कॉलरिज (Samuel Taylor Coleridge) है। इनका जन्म 21 अक्टूबर 1772 में इंग्लैंड के सेंट मेरी नामक स्थल पर हुआ । इस लेख के माध्यम से हम आज Coleridge Ka Kalpana Siddhant को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।
कॉलरिज के पिता इन्हें धर्म प्रचारक बनाना चाहते थे और कॉलरिज ने कुछ दिनों तक पादरी के रूप में धर्म प्रचार का कार्य भी किया।
- कॉलरिज का स्वभाव यायावरी का था। वे एक स्थान से दूसरे स्थान तक भ्रमण करते रहे। कॉलरिज अंग्रेजी के ‘लेक कवियों’ (Lake Poets) में से एक थे।
- उनकी कविताओं में ‘दि राइम ऑफ दि एंसीएट मैरीनर’ तथा ‘कुबला खान’ अत्यंत प्रसिद्ध हैं।
- आलोचनात्मक कृतियों में ‘बायोग्राफीया लिटरेरिया’, ‘चर्च एण्ड स्टेट’ तथा ‘कनफेशन्स ऑफ एन इनक्वाइरिंग स्प्रिट’ का उल्लेख किया जा सकता है।
- कॉलरिज का एक अन्य महत्वपूर्ण कार्य ‘लिरिकल बैलड्स’ (1798 ई.) का संपादन है, जिसे उन्होंने विलियम वर्ड्सवर्थ के साथ मिलकर किया।
कॉलरिज के रचनाकार व्यक्तित्व के तीन पक्ष हैं। पहला आलोचक रूप, दूसरा कवि रूप तथा उनके व्यक्तित्व का तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है- अंग्रेजी स्वच्छंदतावाद के दर्शन को स्पष्ट करना एवं अपने समकालीन रचनाकारों के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में कार्य करना।
- ‘बायोग्राफिया लिटरेरिया’ (1817 ई) वस्तुतः एक ऐसी महत्वपूर्ण कृति है जिसमें जीवनी, आलोचना और दर्शन का मेल देखा जा सकता है।
- ‘बायोग्राफिया लिटरेरिया’ एक ऐसे आलोचक की कृति है जो बहुज्ञ तो है किंतु जिसमें दुरूहता भी कम नहीं है।
- कॉलरिज के आलोचनात्मक चिंतन के जितने भी पक्ष हैं यथा- कल्पना, फैंसी, काव्यभाषा और कवि, काव्य और कविता सभी उनकी इस आलोचनात्मक कृति में समग्रता के साथ व्याख्यायित हुए हैं।
- कवि के रूप में भी कॉलरिज का महत्व कम नहीं है। ‘लिरिकल बैलड्स’ का एक तिहाई भाग उनकी कविताओं द्वारा पूरा होता है। कॉलरिज वस्तुत: लंबी कविताओं के कवि हैं।
कॉलरिज की कल्पना संबंधी अवधारणा और आयाम
पश्चिमी साहित्यशास्त्र में ‘कल्पना’ सबंधी चिंतन प्लेटो और अरस्तू के समय से ही होता रहा है। अरस्तू ने अपने ‘अनुकरण सिद्धांत’ में कल्पना की भूमिका से इनकार नहीं किया है। फिर भी सच्चे अर्थों में कॉलरिज पहले ऐसे आलोचक हैं, जिन्होंने कविता की रचना प्रक्रिया में कल्पना की महती भूमिका को अपनी आलोचना के माध्यम से रेखांकित किया है।
कॉलरिज ने कल्पना के दो भेद किए हैं- प्राथमिक कल्पना (Primary Imagination) और आनुषंगिक कल्पना या द्वितीयक कल्पना (Secondary Imagination) | कॉलरिज से पहले कल्पना के संबंध में ऐसा विवेचन किसी अन्य आलोचक के यहाँ नहीं मिलता है।
कॉलरिज का मत है कि कवि या कलाकार का महत्व सृजन में है और यह कार्य कल्पना ही कर सकती है । वही जीवन का सजीव वर्णन कर सकती है । कवियों को कल्पना कि ही सर्वाधिक अपेक्षा रहती है ।
कवि कल्पना की सहायता से ही प्रकृति का मनोहर वर्णन कर सकता है । कॉलरिज के अनुसार कल्पना ही एक ऐसी शक्ति है जो मृत, जड़ वस्तुओं में भी प्राण का संचार कर सकती है । उसका कार्य अनुकरण न होकर पुनःप्रस्तुतीकरण है।
प्राथमिक कल्पना (Primary Imagination)
कॉलरिज के अनुसार दृश्यमान जगत की अनेक वस्तुएँ पदार्थ, प्राणी एवं स्थान को ग्रहण करने वाले शक्ति ही प्राथमिक कल्पना है। कॉलरिज द्वारा प्रयुक्त इस प्राथमिक कल्पना के महत्व को इस दृष्टि से समझा जा सकता है कि इस प्रकृति और संसार की अनेक वस्तुओं और पदार्थों को हम देखते हैं, किन्तु प्राथमिक कल्पना ही वह कारण है जिससे चीजें सुसंगत, व्यवस्थित और आवयविक रूप से हमारे मस्तिष्क में जगह बना पाती है।
हम अपने दैनंदिन जीवन में अनेक चीजों का साक्षात्कार करते रहते हैं। फूल, पेड़, पहाड़, नदी, झरने, मोटर गाड़ी, इमारतें और इन सभी चीजों की एक छवि हमारे मस्तिष्क में बनती रहती है।
ये सारी चीजें एक निश्चित स्वरूप में हमारे मस्तिष्क में अपनी जगह बनाती जाती है। आपस में गड्डमड्ड नहीं होतीं, उलझती नहीं हैं।
वस्तुतः मानव मस्तिष्क की वह शक्ति जिसके कारण हम चीजों को उनके नैसर्गिक रूप में देख पाते हैं, वहीं कॉलरिज के अनुसार, प्राथमिक कल्पना है। यह प्राथमिक कल्पना ही है जो चीजों को एक क्रम या व्यवस्था में हमारे मनोमस्तिष्क पर अंकित करती जाती है।
जैसे हम आँखों से गुलाब के फूल का रंग देखते हैं, हाथ से छूकर उसकी कोमलता का बोध प्राप्त करते हैं, नाक से उसकी सुगंध का अनुभव करते हैं और जीभ से चखकर उसका स्वाद भी पाते हैं । इस प्रकार अपनी इंद्रियों के माध्यम से हमको बोध होता है कि यह गुलाब का फूल है । इस प्रकार इंद्रियों के ज्ञान को व्यवस्थित करके कल्पना ही हमें यह बताती है कि वह गुलाब का एक फूल है ।
इस प्रकार प्राथमिक कल्पना (Primary Imagination) हमें वस्तुओं का प्राथमिक ज्ञान कराती है क्योंकि वह सम्पूर्ण मानवीय ज्ञान का मूल हेतु है।
प्राथमिक कल्पना वह शक्ति है जिसकी सहायता से दृश्य जगत का स्पष्ट और व्यवस्थित ज्ञान होता है। हमारी आँखों के सामने न जाने कितनी वस्तुएँ लगातार आती रहती हैं – मकान, सड़क, पेड़, नदी, मैदान, पशु, पक्षी आदि। इसी तरह लगातार कानों में भिन्न-भिन्न प्रकार की आवाजें पड़ती रहती हैं। प्रत्येक ज्ञानेंद्रिय अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में सदा लगी हुई हैं। एक साथ दर्जनों मकानों, बीसों प्रकार के पेड़-पौधों पर दृष्टि पड़ती है ।
इस समस्त जगत के कार्य-व्यापार को व्यवस्थित रूप से ग्रहण करानी वाली शक्ति को ही कॉलरिज प्राथमिक कल्पना कहते हैं। कॉलरिज प्राथमिक एक स्वतंत्र और सहज मानसिक क्रिया है, क्योंकि वह मनुष्य की इच्छा की सजगता के बिना कार्य करती है ।
द्वितीयक आनुषंगिक कल्पना (Secondary Imagination)
आनुषंगिक कल्पना (गौण या विशिष्ट कल्पना) मनुष्य के मस्तिष्क की वह क्षमता है जिसके कारण वह विभिन्न वस्तुओं, प्राणियों और स्थानों को अपनी इच्छा के अनुसार निर्मित करता है।
दूसरे शब्दों में अगर कहें तो कह सकते हैं कि द्वितीयक या आनुषंगिक कल्पना सायास प्रयास और अंतःशक्ति है, जो वस्तुओं को अलग प्रकार से देखती है। अतः यह स्पष्ट है कि आनुषंगिक कल्पना का कार्य बाह्य को आतंरिक बनाना और इस प्रकार किसी भी वस्तु का पुनः सृजन करना है।
आनुषंगिक कल्पना (Secondary Imagination) प्राथमिक कल्पना का सजग मानवीय प्रयोग है। प्राथमिक कल्पना मनुष्य की इच्छा की सजगता के बिना ही कार्य करती है पर आनुषंगिक कल्पना की कार्य पद्धति में सजगता का समावेश होता है ।
यह सजगता प्रत्येक मनुष्य में हो, यह आवश्यक नहीं है । यह केवल कलाकार में होती है। चित्रकार, कवि, दार्शनिक आदि इसका प्रयोग कर सकते हैं। अपने व्यापक अर्थ में आनुषंगिक कल्पना एक सजग मानसिक सर्जन-क्रिया कही जा सकती है ।
कॉलरिज का मत है कि काव्य में प्रकृति अथवा जीवन का यांत्रिक अनुकरण तो प्रकृति से चोरी (Theft from Nature) है । काव्य की महत्ता पुनः सृजन में, जीवन का सजीव रूपांतर प्रस्तुत करने में निहित है और यह कार्य आनुषंगिक कल्पना द्वारा ही संभव है ।
- प्राथमिक कल्पना प्रत्येक व्यक्ति में होती है किन्तु आनुषंगिक कल्पना केवल रचनाकारों में होती है ।
- प्राथमिक कल्पना स्वाभाविक रूप से अव्यवस्थित इंद्रिय बोधों को व्यवस्थित करती है तो आनुषंगिक कल्पना रचनाकार की इच्छा होने पर सक्रिय होती है ।
- प्राथमिक कल्पना सहज रूप से काम करती है तो आनुषंगिक कल्पना हमारी इच्छा के अनुसार। आनुषंगिक कल्पनाशक्ति का प्रयोग चित्रकार, दार्शनिक और कवि सभी करते हैं।
- प्राथमिक कल्पना के द्वारा जो भी प्रत्यक्ष ज्ञान होता है उसे आनुषंगिक कल्पना गला, घुला, मिलाकर बिलकुल नया घोल तैयार करती है और कलाकार की इच्छा के अनुसार उसे नया रूप प्रदान करती है ।
- जैसे सुनार सोने को गलाकर उसे विभिन्न आभूषणों में बदल देता है वैसे ही आनुषंगिक कल्पना, प्राथमिक कल्पना द्वारा प्रस्तुत विषय वस्तुओं को नए रूप में ढालकर अभीष्ट कलाकृति में परिणत कर देती है ।
तात्पर्य यह है कि दृश्यमान संसार की सामान्य वस्तुएँ ही आनुषंगिक कल्पना के योग से विशिष्ट और रमणीय बन जाती हैं ।
प्राथमिक और आनुषंगिक (गौण या विशिष्ट कल्पना) कल्पना में अंतर
- 1) प्राथमिक कल्पना सहज भाव से वस्तुओं को ग्रहण करती है, जबकि आनुषंगिक कल्पना में जानबूझकर सोद्देश्य ढंग से चीजों की ग्राह्यता होती है।
- 2) प्राथमिक कल्पना मुख्यतः दृश्यमान जगत पर आधारित होती है, जबकि आनुषंगिक कल्पना में आत्मा, बुद्धि, इंद्रिय-संवेदन, भाव सभी का समावेश होता है।
- 3) प्राथमिक कल्पना का क्षेत्र सीमित है, जबकि आनुषंगिक कल्पना का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत होता है।
- 4) प्राथमिक कल्पना अपनी प्रकृति में संरचनात्मक होती है अर्थात यह केवल निर्माण या संगठन करती है, जबकि आनुषंगिक कल्पना सृजन और ध्वंस, विघटन और संघटन दोनों कार्य करती है।
- 5) प्राथमिक कल्पना स्वाभाविक रूप से हर किसी में विद्यमान रहती है जबकि आनुषंगिक कल्पना की विद्यमानता विशेष रूप से दार्शनिक, रचनाकार और कलाकार में होती है।
- 6) प्राथमिक कल्पना का क्षेत्र भौतिक जगत का है, जबकि आनुषंगिक कल्पना भौतिक के साथ-साथ आध्यात्मिक और उच्चादर्शों वाली होती है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर स्पष्ट है कि कॉलरिज केवल अनुकरण को उचित नहीं मानते थे वरन् उनका मानना था कि रचनाकार का वैशिष्ट्य इस बात में निहित होता है कि उसने कितना पुनः सृजन किया है।
कॉलरिज का स्वयं का चिंतन भी इसीलिए यांत्रिकतावादी न होकर जैववादी या आवयविक (organic) है।
कॉलरिज की दृष्टि में कल्पना तत्व में वस्तुओं और पदार्थों के एकीकरण की क्षमता है। कॉलरिज का यह भी मानना था कि कवि-कर्म की सफलता या असफलता बहुत कुछ समन्वय पर निर्भर करती है।
संवेदना और बुद्धि तत्व के साहचर्य को कॉलरिज काव्य का अनिवार्य गुण मानते हैं। स्पष्ट है कि इस समन्वय में कल्पना की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
फैंसी (ललित कल्पना) : स्वरूप एवं आयाम
फैंसी को हिंदी में रम्य कल्पना, ललित कल्पना तथा विंब-निर्मात्री शक्ति अलग-अलग नामों से जाना जाता है।
फैंसी शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘फैंटेसिया’ (Phantasia) से मानी जाती है जिसका संबंध कल्पना से है।
वस्तुत: कॉलरिज ऐसे आलोचक है जिन्होंने फैंसी के स्वरूप एवं आयाम पर गंभीरता से विचार किया और उसे कल्पना से सर्वथा अलग किया।
कॉलरिज ने ‘बायोग्राफिया लिटरेरिया’ में लिखा है कि फैंसी या रम्य कल्पना देश और काल के बंधन से मुक्त स्मृति का ही एक रूप है और यह योजक के रूप में कार्य करती है। दूसरे शब्दों में अगर कहें तो कहा जा सकता है कि फैंसी या रम्य कल्पना का स्वरूप सर्जनात्मक न होकर रचनाकार द्वारा कभी किसी समय में देखे हुए किसी दृश्य या चित्र को अनंतर किसी संदर्भ में प्रस्तुत कर देना होता है।
प्रायः फैंसी के अंतर्गत जिन दो भिन्न वस्तुओं का संयोजन किया जाता है वे अपने वैशिष्ट्य के साथ उपस्थित रहती है। कल्पना और फैंसी में मुख्य अंतर ही यही है कि कल्पना में रचनाकार दो भिन्न वस्तुओं के संयोजन से एक नयी वस्तु का निर्माण कर देता है जबकि फैंसी में दोनों वस्तुएँ अलग-अलग प्रतीत होती हैं।
फैंसी (ललित कल्पना) स्मृति का एक प्रकार (Mode) है । यह स्मृति देश-काल के बंधन से मुक्त रहती है । सामान्य स्मृति देश-काल के बंधन में होती है ।
उदाहरण के लिए बिहारी ने एक दोहे में नायिका की चमचमाती आँखों की तुलना निर्मलजल में उछलती-मचलती मछलियों से की है । बिहारी ने जल में उछलती मछलियों को कब देखा, कहाँ देखा, इसका कोई संकेत नहीं है । कभी देखा होगा, उसी के आधार पर यह तुलना की है यही देश-काल के बंधन से स्मृति की मुक्ति है ।
कल्पना और फैंसी (ललित कल्पना) में अंतर
- 1) कल्पना का स्वरूप सर्जनात्मक होता है जबकि फैंसी यांत्रिक होती है। कल्पना शक्ति के लिए नैसर्गिक प्रतिभा का होना आवश्यक है जबकि फैंसी को निपुणता के द्वारा भी सीखा जा सकता है।
- 2) कल्पना यौगिक की तरह है और फैंसी मिश्रण। अर्थात् कल्पना शक्ति के प्रयोग से किसी नए बिम्ब / दृश्य का सृजन होता है जबकि फैंसी के प्रत्येक तत्व अपनी विशेषता को संरक्षित किए रहते हैं।
- 3) कल्पना शक्ति सदैव उदात्त और गरिमामयी बिम्बों का निर्माण करती है जबकि फैंसी विश्रृंखल और अगंभीर भी हो सकती है।
- 4) कल्पना शक्ति सुसंबद्ध और सुगठित होती है जबकि फैंसी केवल असमान (Dissimilar) वस्तुओं या बिम्बों को एकत्र रखना भर है। फैंसी सिनेमा के पर्दे पर चार चित्रों को एक साथ रखने जैसा है।
निष्कर्ष
कॉलरिज के फैंसी विषयक दृष्टिकोण पर विचार करते हुए यह भी ध्यान में रखना होगा कि कॉलरिज के चिंतन के बीज जर्मन दार्शनिक सिद्धांतों से मेल खाते हैं जहाँ सुसंबद्धता, सुगठन और आवयविक अन्विति (Organic Unity) पर बहुत बल दिया गया है।
संभवतः यही कारण है कि अन्विति के इसी अभाव के कारण कॉलरिज फैंसी को गैर-रचनात्मक और निरर्थक मानते हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि कॉलरिज ने अपने कल्पना विषयक चिंतन में प्राथमिक कल्पना को प्रथम स्थान पर रखा है तो आनुषंगिक कल्पना को द्वितीय स्थान पर और उनकी दृष्टि में फैंसी सबसे अंत में है।

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