डॉ. रामविलास शर्मा और डॉ. नामवर सिंह ने शुक्ल-द्विवेदी विवाद को दूसरी पीढ़ी तक ले जाने और उसे जारी रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । दोनों ही प्रगतिवादी या मार्क्सवादी आलोचक हैं और दोनों की यह समान विशेषता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को रूढ़ि के रूप में स्वीकार कारण के बजाए उदार प्रगतिशील चेतना को लेकर हिंदी आलोचना को एक नया आयाम दिया । आज के इस लेख में हम Dr Namvar Singh Ki Alochana Drishti को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।
यदि डॉ. रामविलास शर्मा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की परंपरा का विकास एवं विस्तार करते हुए आते हैं तो डॉ. नामवर सिंह आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी की परंपरा का विस्तार और विकास करते हुए उनकी परंपरा को आचार्य शुक्ल की परंपरा के समानांतर ‘दूसरी परंपरा’ के रूप में स्थापित करते हैं ।
डॉ. नामवर सिंह की प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ
डॉ. नामवर सिंह की प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ निम्नलिखित हैं :
- बकलम खुद (1951 ई.)
- हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग (1952 ई.)
- छायावाद (1955 ई.)
- इतिहास और आलोचना (1957 ई.)
- आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ (1962 ई.)
- कहानी : नयी कहानी (1965 ई.)
- कविता के नये प्रतिमान (1968 ई.)
- दूसरी परंपरा की खोज (1982 ई.)
- वाद-विवाद-संवाद (1989 ई.)
- आलोचक के मुख से (2005 ई.)
डॉ. नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि
डॉ. नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि को निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर भली-भाँति समझा जा सकता है :
मार्क्सवादी समीक्षा के विकास में डॉ. नामवर सिंह का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनकी कृति ‘हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग’ सन् 1952 में प्रकाशित हुई थी। इसी के साथ उन्होंने अपने आलोचक जीवन की शुरूआत की थी ।
इस कृति के अध्ययन से प्रकट है कि उन्होंने अपभ्रंश के कवियों और हिंदी -साहित्य की आदिकालीन प्रवृत्तियों का विवेचन एक प्रगतिशील मार्क्सवादी विचारक की हैसियत से किया है।
जैन कवियों द्वारा वर्णित राम-कथा के संबंध में आपने लिखा है- “इन्होंने (जैन कवियों ने) अति मानवीय प्रसंगों को बुद्धि-संगत और मानवीय रूप देने की चेष्टा की है, जैसे गंगा-उत्पत्ति, वानरों की उत्पत्ति, रावण का ‘दशानन’ होना आदि। इसी तरह रावण के चरित्र को जैन कवियों ने अधिक पराक्रम-युक्त दिखाया है और शूर्पणखा का चरित्र अपेक्षाकृत उज्ज्वल चित्रित किया है। यहाँ तक कि स्वयंभू ने उसका नाम ‘चन्द्रनखी’ दिया है।” (हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग)
इसी प्रकार हिंदी साहित्य के आदि काल की प्रवृत्तियों का विवेचन करते हुए आपने कहा है- “हिंदी साहित्य के आदि काल में दो स्पष्ट विरोधी साहित्यिक प्रवृत्तियाँ प्रचलित थीं। एक प्रवृत्ति वह थी जो क्रमशः क्षीयमाण (घटना) थी दूसरी वह थी जो क्रमशः वर्धमान (बढ़ना) थी। पहली का संबंध राजस्तुति, सामंतों के चरित-वर्णन, युद्ध-वर्णन, केलि-विलास, बहु-विवाह के लिये विजयोन्माद आदि से था और दूसरी का संबंध नीची समझी जाने वाली जातियों के धार्मिक असंतोष, रूढ़ि-विरोध, बाह्याडम्बर-खण्डन, जाति-भेद की आलोचना, उच्चतर आचार, व्यापक भगवत्प्रेम, मानवीय आत्मगौरव आदि से था। एक का नाम तथाकथित ‘वीरगाथा काव्य’ है, दूसरी का तथाकथित योगधारा।” (हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग)
सन् 1955 में आपकी ‘छायावाद’ पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें ‘छायावाद’ के काव्य-सौन्दर्य का विवेचन करते हुए आपने प्रतिपादित किया कि “यह सारा सौन्दर्य व्यक्ति की स्वाधीनता की भावना से उत्पत्र हुआ है और स्वाधीनता भी व्यक्ति के माध्यम से सम्पूर्ण समाज की स्वाधीनता की अभिव्यक्ति है।” (छायावाद, भूमिका)
‘छायावाद‘ के स्थायित्व और उसके आधार को स्वीकार करते हुए भी डॉ. नामवर सिंह ने अनुभव किया था कि “इस (छायावादी काव्य में व्यक्त) काव्यगत स्वाधीनता को तत्कालीन स्वाधीनता संग्राम के साथ मिलाकर देखने से पता चलता है कि ‘छायावाद’ में स्वाधीनता संग्राम के कुछ पहलू छूट गये हैं और कहीं-कहीं छाया भी बहुत धुंधली और मूल से दूर चली गई है। (छायावाद, भूमिका)
सन् 1957 ई. में आपकी ‘इतिहास और आलोचना’ पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें सन् 1952 का लिखा हुआ एक निबन्ध है ‘इतिहास का नया दृष्टिकोण‘ इतिहास का नया दृष्टिकोण अर्थात् ‘ऐतिहासिक भौतिकवादी दृष्टिकोण।‘
इस दृष्टिकोण की विशेषता है-‘इतिहास के अध्ययन के लिये द्वन्द्वात्मक प्रणाली का प्रयोग।‘
इस प्रणाली की विशेषताओं को निर्दिष्ट करते हुए डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है- “द्वन्द्वात्मक प्रणाली की पहली विशेषता है किसी वस्तु, व्यक्ति, घटना या विचार को अन्य वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों के अविभाज्य प्रसंग में देखना।” दूसरी विशेषता है- “वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों को गतिशील, परिवर्तनशील और क्रमबद्ध रूप में देखना।” तीसरी विशेषता है- “विकास-क्रम को ऊर्ध्वोन्मुख और अग्रसर रूप में देखना।” चौथी विशेषता है- “वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं और विचारों में असंगति अथवा अन्तर्विरोध को पहचानना।” (इतिहास और आलोचना)
डॉ. नामवर सिंह ने इतिहास की इसी द्वन्द्वात्मक प्रणाली के आधार पर हिंदी-साहित्य के इतिहास-ग्रन्थों की संक्षिप्त समीक्षा भी की है।
उन्होंने आचार्य शुक्ल के इतिहास की कमजोरियों को लक्षित करते हुए कहा है कि इसमें हिंदी -साहित्य को पूर्ववर्ती साहित्य और अन्य भारतीय भाषाओं के सम-सामयिक साहित्य से विच्छिन्न (अलग करके) करके देखा गया है और वस्तुओं, व्यक्तियों, घटनाओं एवं विचारों में असंगति अथवा अन्तर्विरोध को नहीं पहचाना गया है।
प्रयोगवादी कविता के संबंध में डॉ. नामवर सिंह ने कहा है-“प्रयोगों में सारा नया रूप-विधान, नये रागात्मक सम्बन्धों के नाम पर केवल समाज-निरपेक्ष मध्यवर्गीय व्यक्ति की मानसिक बीमारियों का सहानुभूतिपूर्ण और मोहक अलंकरण है।” (इतिहास और आलोचना)
उन्होंने काव्य में विषय-वस्तु को महत्व देने पर बल दिया है और कहा है- “साहित्य में विषय-वस्तु पर बल देने का अर्थ है यथार्थजगत् के सत्य का पूर्ण और गहरा ज्ञान।
जो लोग व्यक्ति-स्वातंत्र्य का नारा देते हैं उनकी चर्चा करते हुए डॉ. नामवर सिंह कहते हैं कि सामूहिक स्वातंत्र्य में ही सच्चा व्यक्ति-स्वातंत्र्य है, इस सत्य को वे नहीं समझ पाते।”
इस प्रकार डॉ. नामवर सिंह ने व्यक्तिवाद का निषेध किया है और सामाजिक यथार्थ के चित्रण पर बल दिया है।
सन् 1962 ई. के आस-पास डॉ. नामवर सिंह की ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ पुस्तक प्रकाशित हुई। इसमें आधुनिक हिंदी साहित्य की चार प्रमुख प्रवृत्तियों ‘छायावाद‘, ‘रहस्यवाद‘, ‘प्रगतिवाद‘ और ‘प्रयोगवाद‘ का विवेचन किया गया है।
छायावाद के संबंध में डॉ. नामवर सिंह के विचारों का अनुशीलन हम उनकी स्वतंत्र पुस्तक के आधार पर कर चुके हैं, अतः यहाँ रहस्यवाद, प्रगतिवाद और प्रयोगवाद के संबंध में उनके विचारों की व्याख्या ही अभीष्ट है।
‘रहस्यवाद‘ सम्बन्धी विवेचन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें डॉ. नामवर सिंह ने पहली बार मध्ययुगीन संतों के रहस्यवाद और योरोपीय प्रतीकवादी रहस्यवाद से हिंदी के आधुनिक रहस्यवाद की भिन्नता इनके सामाजिक आधार को दृष्टि में रखकर प्रतिपादित की है।
आपने स्पष्ट किया है- “मध्ययुगीन संतों का ‘रहस्यवाद’ प्रायः जाति-प्रथा ऊँच-नीच के विचार, पुरोहितों के अत्याचार एवं सामन्ती शोषण के विरुद्ध विद्रोह से जुड़ा है।” (आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ)
‘आधुनिक योरोप का रहस्यवाद’ पूँजीवादी संध्या के हताश मध्यवर्ग की यथार्थभीरु प्रतिक्रियावादी विचारधारा से पोषित है। जबकि भारत के दूसरे दशक का रहस्यवाद “अपनी स्वाधीनता के लिये लड़ने वाले मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों की जीवन-दृष्टि का अंग है।” (आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ)
प्रगतिवाद पर विचार करते हुए उन्होंने कहा कि- “प्रगतिवाद‘ और ‘प्रगतिशील साहित्य‘ में भेद करना उचित नहीं है। ‘प्रगतिवाद’ का उद्भव और विकास अपनी ही सामाजिक और साहित्यिक परिस्थितियों में हुआ है।”
प्रगतिशील साहित्य की व्याख्या करते हुए आपने कहा- “प्रगतिशील साहित्य कोई स्थिर मतवाद नहीं है, बल्कि यह एक निरन्तर विकासशील साहित्य-धारा है, जिसके लेखकों का विश्वास है कि प्रगतिशील साहित्य लेखक की स्वयंभू अन्तः प्रेरणा से उद्भूत नहीं होता, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के क्रम में वह भी परिवर्तित और विकसित होता रहता है और उसके सिद्धान्त उत्तरोत्तर स्पष्ट तथा अधिक पूर्ण होते चलते हैं।” (आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ)
प्रयोगवाद के संबंध में आपने अपना दो टूक निर्णय देते हुए कहा कि चरम व्यक्तिवाद ही प्रयोगवाद का केन्द्र-बिन्दु है। उसके 15 वर्षों के इतिहास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा- “प्रयोगवाद के 15 वर्षों का इतिहास ‘व्यक्तिवाद‘ के दो सीमान्तों के बीच फैला हुआ है। इनमें से एक सीमान्त है- मध्यवर्गीय परिवेश के प्रति मध्यवर्गीय कवि का वैयक्तिक असन्तोष और दूसरा सीमान्त है- जन-जागरण से डरे हुए कवि की आत्मरक्षा की भावना। कुल मिलाकर यह चरम व्यक्तिवाद ही ‘प्रयोगवाद‘ का केन्द्र-बिन्दु है और विभिन्न राजनीतिक, नैतिक, सामाजिक मान्यताओं के रूप में यह संकीर्ण व्यक्तिवाद अपने को व्यक्त करता रहता है।”
डॉ. नामवर सिंह कहते हैं- “कुल मिलाकर प्रयोगवादी कविताएँ ह्रासोन्मुख, मध्यवर्गीय जीवन का यथार्थ-चित्र हैं। इनमें मध्यवर्गीय हीनता, दीनता, अनास्था, कटुता, अन्तर्मुखता, पलायन आदि का मार्मिक चित्रण हुआ है।” यह दूसरी बात है कि इन परिस्थितियों से निकलने का रास्ता न तो उन्हें (प्रयोगवादी कवियों को) स्वयं मालूम है और न ये दूसरों को ही बतला सकते हैं।
डॉ. नामवर सिंह ‘नईकहानी‘ के भी मर्मी समीक्षक हैं। उनकी ‘कहानी : नयी कहानी’ पुस्तक में 1957 से 1965 ई. के बीच लिखे गये कहानी-समीक्षा सम्बन्धी निबन्ध संगृहीत हैं। इन निबन्धों के माध्यम से डॉ. नामवर सिंह ने एक व्यापक समीक्षा-पद्धति (ऐसी पद्धति जो कविता से इतर कथा-नाटक आदि साहित्य-रूपों का विधिवत विश्लेषण कर सके) विकसित की है।
इस पुस्तक में स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद उभरने वाली प्रथम दौर की कहानियों और सन् 1959-60 के आस-पास उभरने वाली दूसरे दौर की कहानियों की समीक्षा विशेष रूप से हमारा ध्यान आकृष्ट करती है।
डॉ. नामवर सिंह ने इन दोनों दौर की कहानियों के भावबोध और संवेदना का अन्तर परिवर्तित-सामाजिक संदर्भ के परिप्रेक्ष्य में लक्षित और विश्लेषित किया है।
नये कहानीकारों के संबंध में उन्होंने कहा है- “चूँकि नये कहानीकार किसी पूर्व निर्धारित जीवन-दर्शन द्वारा निर्दिष्ट ‘सामाजिक दायित्व’ के निर्वाह के खतरे से सशंकित हैं, इसलिये वे अपने अनुभवों के ही आधार पर रचना में सामाजिकता को व्यक्त करने की कोशिश करते रहे हैं। इस दृष्टि से यह तो सत्य है कि प्रगतिवादी दौर की तरह इन कहानियों में सर्वहारा के चित्र नहीं हैं और न वैसी प्रखर वर्ग-चेतना ही है किन्तु व्यापक रूप से आज के उपेक्षितों और कल के उपेक्षितों के साथ आत्मीय लगाव अवश्य है। (कहानी: नयी कहानी)
1968 ई. में डॉ. नामवर सिंह की प्रसिद्ध कृति ‘कविता के नये प्रतिमान’ प्रकाशित हुई। इसकी भूमिका में डॉ. नामवर सिंह ने लिखा-“यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि ‘कविता के नये प्रतिमान‘ के केन्द्र में ‘मुक्तिबोध‘ हैं।
इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि “नयी कविता में मुक्तिबोध की स्थिति वही है जो ‘छायावाद‘ में ‘निराला‘ की थी।”
वस्तुतः डॉ. नामवर सिंह ने जब ‘मुक्तिबोध’ की रचना ‘एक साहित्यिक की डायरी’ की समीक्षा की थी तभी उन्हें स्पष्ट हो गया था कि जो ‘नयीकविता’ निम्न मध्यवर्ग के जीवन-संघर्ष को यथार्थ के धरातल पर व्यक्त करती है उसके केन्द्र में ‘अज्ञेय’ नहीं ‘मुक्तिबोध’ हैं। कविता के नये प्रतिमान में उन्होंने अपनी इस पूर्व मान्यता को नये प्रतिमानों की मीमांसा के रूप में स्थापित किया। (कविता के नये प्रतिमान)
इस पुस्तक में दो खण्ड हैं। इसके प्रथमखण्ड में विशेषतः ‘तारसप्तक’, ‘कामायनी’, ‘उर्वशी’ आदि कृतियों और सामान्यतः छायावादोत्तर कविता की उपलब्धियों को लेकर पिछले दो दशकों (1948-68 ई. तक) में जो विवाद हुए हैं उनमें टकराने वाले मूल्यों की पड़ताल की गई है, और इसी प्रसंग में नये दावे के साथ प्रस्तुत ‘रससिद्धान्त’ की प्रसंगानुकूलता पर भी विचार किया गया है। (कविता के नये प्रतिमान)
दूसरे खण्ड में ‘कविता के नये प्रतिमान‘ के नाम पर प्रस्तुत अनुभूति की प्रामाणिकता, इमानदारी, जटिलता, द्वन्द्व, तनाव, विसंगति, विडम्बना, सर्जनात्मक भाषा, विम्बात्मकता, सपाटबयानी, फैन्टेसी, नाटकीयता, आदि आलोचनात्मक पदों की सार्थकता का परीक्षण किया गया है। (कविता के नये प्रतिमान)
‘नयीकविता’ के संदर्भ में बहुचर्चित प्रतिमान विसंगति और विडम्बना के सूत्रों को पूर्ववर्ती काव्य-परम्परा से जोड़ते हुए डॉ. नामवर सिंह उसकी स्थिति ‘निराला’ के शोक-गीत ‘सरोजस्मृति’, और लम्बी व्यंग रचना ‘कुकुरमुत्ता’ में लक्षित करते हैं और उसके बाद रामविलास शर्मा की कविता ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’, भवानी प्रसाद मिश्र की कविता ‘गीतफरोश’, रघुवीर सहाय के कविता-संग्रह ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ तथा श्रीकान्त वर्मा, प्रभाकर माचवे, कुंवरनारायण, लक्ष्मीकान्त वर्मा, ‘भारती’ और ‘धूमिल’ आदि सभी कवियों में उसकी पूरी परम्परा की विस्तार से चर्चा करते हुए अन्त में मुक्तिबोध पर आते हैं और कहते हैं- “मुक्तिबोध की चम्बल घाटी में, और अँधेरे में जैसी भयावह त्रासदीय रंग की नाटकीय कविताओं के अन्तर्गत काले बादलों को चीरकर बिजली की कौंध के समान हल्के-फुल्के संक्षिप्त प्रसंग झलक जाते हैं, जिनसे विडम्बना के सर्जनात्मक उपयोग का गहरा एहसास होता है।” (कविता के नये प्रतिमान)
डॉ. नामवर सिंह ने भी काव्य-भाषा के प्रतिमान को महत्व देते हुए उस पर गंभीरता से विचार किया किन्तु यहाँ भी वे मात्र भाषिक-विश्लेषण तक ही नहीं रुक गये, उनके अनुसार “शब्द-प्रयोग की सार्थकता सन्देह से परे है किन्तु उसके साथ अनुभव-खण्ड या जीवन की वास्तविकता भी संपृक्त है।”
यदि कथ्य की उपेक्षा करके कथन तक ही अपने को सीमित कर लिया गया तो सारे विवेचन के रूपवादी हो जाने का खतरा है। वे कहते हैं- “कथ्य को कथन के रूप में निःशेष कर देने में, निःसंदेह आलोचना के अन्तर्गत रूपवादी रुझान का खतरा है क्योंकि कुछ आलोचक कथन की भाषागत विशेषताओं के विश्लेषण को ही समूची काव्य-कृति का विश्लेषण समझने की भूल कर सकते हैं।
जहाँ तक बिम्ब और प्रतीक का संबंध है डॉ. नामवर सिंह इन्हें प्रतिमान के स्तर पर विशेष महत्व नहीं देते।
अंग्रेजी साहित्य का हवाला देते हुए डॉ. नामवर सिंह कहते हैं- “अंग्रेजी साहित्य में इधर बिम्ब-विधान के विरुद्ध इतनी गहरी प्रतिक्रिया हुई है कि अब इसे आलोचना की भाषा से निकाल देने का प्रस्ताव किया जा रहा है।”
अपने पूरे विवेचन का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं- “निष्कर्ष यह कि कविता बिम्ब का पर्याय नहीं है सामान्यतः जिसे बिम्ब कहा जाता है उसके बिना भी कविताएँ लिखी गई है और वे बिम्बधर्मी कविताओं से किसी भी तरह कम अच्छी नहीं कही जा सकतीं।”
डॉ. नामवर सिंह यह मानते हैं कि “इन कमजोरियों को दूर करने के लिये कविता में तथाकथित सपाट बयानी अपनाई जा रही है।”
डॉ. नामवर सिंह ने ‘नयीकविता‘ की संरचना पर भी विचार किया है। उनके अनुसार ‘नयीकविता’ की संरचना दो प्रकार की है। प्रगीतात्मक और नाटकीय।
डॉ. नामवर सिंह ने फैंटेसी के शिल्प पर भी विचार किया है। फैंटेसी के प्रयोग से कथा चित्रात्मक और सघन हो जाती है। साथ ही देश और काल की दृष्टि से असम्बद्ध वस्तुओं को भी एक साथ एकत्र रखा जा सकता है।
डॉ. नामवर सिंह यह मानते हैं कि ‘फैंटेसी का शिल्प अयथार्थवादी है किन्तु वे यह मानते हैं कि भाववादी शिल्प के अन्तर्गत भी जीवन को समझने की दृष्टि यथार्थवादी हो सकती है।”
रस की प्रासंगिकता के संबंध में डॉ. नामवर सिंह यह मानते हैं कि रस का निर्णय अर्थ-मीमांसा पर निर्भर करता है। अर्थगत मतभेद के कारण छन्द-विशेष के रस-निर्णय में मतभेद दिखाई पड़ता है।
आचार्य शुक्ल ने रस के प्रतिमान को महत्व देते हुए अर्थ-मीमांसा पर भी बल दिया था।
डॉ. नगेन्द्र के ‘रस-सिद्धान्त‘ नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ की ओर संकेत करते हुए वे कहते हैं- “यह आकस्मिक नहीं है कि जिस ‘रस-सिद्धान्त’ नामक ग्रन्थ में रस को शाश्वत एवं सार्वभौम काव्य-सिद्धान्त बनाने के लिये जैसे आकाश-पाताल एक कर दिया गया है उसी में सम्पूर्ण अर्थ-मीमांसा तो दर किनार ध्वनि पर भी एक अध्याय नहीं है। सभी जानते हैं कि संस्कृत काव्यशास्त्र में अन्तिम रूप से रस की प्रतिष्ठा, ‘रसध्वनि’ के रूप में हुई है, इसलिये ध्वनि के बिना रस की स्थापना निराधार है।”
सन् 1982 ई. में डॉ. नामवर सिंह की पुस्तक ‘दूसरी परम्परा की खोज’ प्रकाशित हुई। यह पुस्तक आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को केन्द्र में रखकर लिखी गई है। इसमें आचार्य द्विवेदी द्वारा संकेतित उस मौलिक इतिहास-दृष्टि को प्रतिष्ठित करने की चेष्टा की गई है जिसके आधार पर आचार्य द्विवेदी ने भारतीय संस्कृति और साहित्य की लोकोन्मुखी क्रान्तिकारी परम्परा को जीवित करने का प्रयत्न किया था।
डॉ. नामवर सिंह इधर ‘कविता की भी दूसरी परम्परा‘ का अनुसंधान कर रहे हैं। उनके अनुसार “नयीकविता‘ के भीतर जो दूसरी परम्परा थी उसके वाहक मुक्तिबोध थे और नयीकविता के बाहर जो दूसरी परम्परा है उसके वाहक नागार्जुन और त्रिलोचन हैं।”
डॉ. नामवर सिंह की नवीनतम प्रकाशित पुस्तक ‘वाद-विवाद-संवाद’ (1989) है। इसमें समकालीन भाषा, साहित्य और आलोचना-कर्म की बुनियादी चिन्ताओं से सम्बद्ध विषयों- ‘जनतंत्र और समालोचना’, ‘आलोचना की स्वायत्तता’, ‘आलोचना की संस्कृति और संस्कृति की आलोचना’, ‘कविता की राजनीति’, ‘आलोचना और संस्थान’, ‘मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र के विकास की दिशा’, ‘प्रगीत और समाज’, ‘आलोचना की भाषा’, ‘प्रगतिशील साहित्य धारा में अंधलोकवादी रुझान’- पर विचार किया गया है। वस्तुतः इन निबन्धों में प्रगतिशील चिन्तन को वर्तमान संदर्भ में आगे बढ़ाया गया है और मार्क्सवादीसमीक्षा पर जो अनेक कोणों से प्रत्यक्ष-प्रच्छन्न प्रहार हो रहे हैं उनका सतर्क, साधार, जवाब दिया गया है।
डॉ. नामवर सिंह ने विचारधारा को परिभाषित भी किया है। उन्होंने कहा है- “विचारधारा विचार मात्र नहीं, बल्कि अनुभूतियों की ऐसी संरचना है जिसमें अनेक प्रतीक, मिथक आदि भी घुले मिले रहते हैं। विचारधारा बहुत कुछ संस्कार की तरह समूचे अस्तित्त्व का ऐसा अंग बन जाती हैं कि उससे आसानी से छुटकारा संभव नहीं होता।” (वही, पृ. 36)
डॉ. नामवर सिंह के शब्दों में “संस्कृतिवाद एक ऐसी विचारधारा है जो जीवन की सारी समस्याओं को समेट कर संस्कृति की समस्या बना देती है क्योंकि उसके अनुसार जीवन की तमाम समस्याएँ सिर्फ संस्कृति की समस्याएँ हैं।”
अपने एक महत्वपूर्ण निबन्ध ‘मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र के विकास की दिशा‘ में डॉ. नामवर सिंह ने यह स्पष्ट करना चाहा है कि ‘मार्क्सवाद’ का जन्म एक आलोचनात्मक दर्शन के रूप में हुआ है। इसलिये खंडन-मंडन उसकी प्रकृति है। उसके सौन्दर्यशास्त्र को सूत्रबद्ध करने से सरलीकरण का खतरा है।
युवालेखन का आकलन तो डॉ. नामवर सिंह बराबर करते रहे हैं। इधर के युवा-लेखन के विषय में उनका कहना है- युवालेखन का रचना-संसार निस्संदेह बेहद खूंखार, भयावह और अजनबी है किन्तु अपनी सृजनशीलता के द्वारा वह यह भी व्यंजित कर देता है कि यह यथार्थ नहीं बल्कि यथार्थ का कलात्मक भ्रम है और यह मायावीपन ही उसकी कलात्मकता का रहस्य है।” (वाद-विवाद संवाद)
डॉ.नामवर सिंह ने ‘साहित्य में प्रगतिशील आन्दोलन की ऐतिहासिक भूमिका‘ पर भी विचार किया है। इस निबन्ध में हिंदी में प्रगतिशील आन्दोलन का इतिहास देने के साथ ही उन्होंने प्रगतिवाद के विकासवाद और यथार्थ की व्याख्या भी की है।
यथार्थ को स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं- “यह यथार्थ कोई वाद नहीं है। यह न तो कोई अमूर्त विचार है, न मनुष्य-निरपेक्ष कोई भौतिक वस्तु। अगर कुछ है तो मनुष्यों के माध्यम से जीवन में व्यक्त होने वाली सच्चाई।
डॉ. नामवर सिंह की अपने एक सम्पादकीय टिप्पणी- ‘एक नया काव्यशास्त्र त्रिलोचन के लिये‘ में प्रतिपादित किया है कि त्रिलोचन की कविता हिंदी की जातीय कविता है। उनकी कविता में मानवीय सामाजिक सम्बन्धों की गरमाई के बीच मनुष्य की वैयक्तिकता भी अक्षुण्ण है। उनकी कविता हिंदी की अपनी परम्परा से निकली हुई ‘नयीकविता’ है जो जीवन्त शब्दों की दीप्ति से दमक रही है।
डॉ. नामवर सिंह द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दावली
किसी भी आलोचक की आलोचना-दृष्टि को परखने के लिये उसके द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों का विवेचन-विश्लेषण भी आवश्यक है।
प्रत्येक पारिभाषिक शब्द किसी न किसी मूल्यबोध या विचारधारा से जुड़ा होता है और संदर्भ-विशेष में प्रयुक्त होकर अपने को संगत और सार्थक बनाता है। समीक्षक प्रत्येक शब्द को तौलकर, उसके प्रयोगगत-औचित्य का आकलन करके तथा उसके मूल में विद्यमान जीवन-दृष्टि को समझकर उसे अपनी समीक्षा में स्थान देता है। इसलिये जीवन-दृष्टि सम्पन्न समीक्षक की मानसिक-यात्रा को सूत्रबद्ध करने और उसकी रुझान की सही पहचान के लिये उसके द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों पर दृष्टिपात करना आवश्यक है।
अपने पूरे समीक्षा-कर्म में डॉ. नामवर सिंह ने जिन पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया है, अपने प्रयोगगत संदर्भ में वे निश्चय ही उनकी प्रगतिशील समीक्षा-दृष्टि के परिचायक हैं।
उनके द्वारा प्रयुक्त पारिभाषिक शब्दों में व्यक्तिवाद, प्रगतिवाद, यथार्थवाद, मानवतावाद, सामाजिक यथार्थ, भाववादी-दृष्टि, भावबोध, प्रयोगवाद, वर्गचेतना, द्वन्द्वात्मक प्रणाली, आलोचनात्मक यथार्थवाद, अनुभूति की प्रामाणिकता, जटिलता, एम्व्यूगिटी, द्वन्द्व, तनाव, विसंगति, विडम्बना, वस्तुनिष्ठता, बोधशक्ति, सर्जनात्मक भाषा, बिम्बात्मकता, सपाटबयानी, फैंटेसी, नाटकीयता, संरचना, प्रगीतात्मकता, एकालाप, अर्थमीमांसा, रसध्वनि, विचारधारा, बहुलतावाद, स्वायत्तता, संस्कृतिवाद, कलावाद, रूपवाद, आधुनिकतावाद, समाजवादीथार्थवाद, परम्परावाद, आदि प्रमुख हैं।
इन शब्दों का तात्पर्य उनके द्वारा व्यक्त विचारों के संदर्भ-वैशिष्ट्य से जुड़कर अपने आप खुलता गया है। बीच-बीच में उन्होंने कुछ शब्दों की व्याख्या भी की है। इन शब्दों के प्रयोग-क्रम में उन्होंने इनके सामाजिक-राजनीतिक परिवेश को भी स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है।
निष्कर्ष
डॉ. नामवर सिंह को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उन्होंने आलोचना को वाद और विवाद के स्तर से बाहर निकलते हुए संवाद का रूप दिया और हिंदी की आलोचना की वाचिक परंपरा की स्थापना की । उन्होंने अपनी सर्जनात्मक दृष्टि के सहारे हिंदी की प्रगतिवादी आलोचना को समृद्ध करने का काम भी किया ।
विचारधारा (आइडियोलाजी) की व्याख्या इधर मार्क्सवादी समीक्षा में विशेष रूप में की जा रही है। इसको जिस रूप में डॉ. नामवर सिंह ने अत्यन्त संक्षेप में स्पष्ट किया है, वह उनकी सूक्ष्म-दृष्टि का परिचायक है।
विचारों को सूत्रबद्ध करके उन्हें शास्त्र का रूप दे देने से किस प्रकार ‘रीतिवाद’ का खतरा पैदा हो जाता है और मार्क्सवादी चिन्तन भी इस रीतिवाद का शिकार हुआ है, इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करके उन्होंने अपनी सजगता का परिचय दिया है।
वामपंथी चिन्तन को निरन्तर गतिशील रखने और उसे परम्परा मोह से बचाने की दिशा में उनका प्रयास सराहनीय है।
डॉ. नामवर सिंह ने मार्क्सवादी और भाववादी दोनों ही प्रकार की समीक्षाओं का गहरा अध्ययन किया है। दोनों क्षेत्रों की नवीनतम गतिविधियों से उनका घनिष्ठ परिचय है। नयी से नयी रचना को परखने और उसकी तह में प्रवेश करने की उनकी क्षमता अद्भुत है। उनकी इस क्षमता का मार्क्सवादी प्रगतिशील समीक्षा को पूरा लाभ मिला है।
उन्होंने अंग्रेजी के पारिभाषिक शब्दों का भी आवश्यकतानुसार निस्संकोच प्रयोग किया है किन्तु यह प्रयोग अभिव्यक्ति को सार्थक, प्रामाणिक और प्रासंगिक बनाने के लिये ही किया गया है। उनकी मान्यता है कि ‘आलोचना’ इतिहास का अंग नहीं है, इतिहास ही आलोचना का अंग है। हमारा विश्वास है, अपनी आलोचना से वे हिंदी का नया इतिहास बनाने में सफल होंगे।

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