द्विवेदीयुगीन हिंदी आलोचना | Dwivediyugin Hindi Alochana

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हिंदी आलोचना को विकसित करने में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान सराहनीय है। उन्हीं का अनुसरण करते हुए द्विवेदी युग के अन्य लेखक भी आलोचना की ओर अग्रसर हुए। आज हम Dwivediyugin Hindi Alochana को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

द्विवेदीयुगीन हिंदी आलोचना के माध्यम से हिंदी आलोचना में धीरे-धीरे अधिक तर्क शक्ति, विचार क्षमता और सद्विवेकिनी शक्ति ने प्रवेश करना शुरू किया।

भारतीय और पाश्चात्य साहित्य सिद्धांतों के अध्ययन और चिंतन के फलस्वरूप आलोचना की दृष्टि बहुत कुछ वैज्ञानिक होने लगी। पुस्तकीय समीक्षा से परे हिंदी आलोचना की कई महत्वपूर्ण पद्धतियाँ द्विवेदी युग में विकसित हुई।

इस युग में सरस्वती के अतिरिक्त माधुरी’, ‘वीणा’, ‘विशाल भारत, साहित्य समालोचक, मर्यादा आदि पत्रिकाओं ने आलोचना के विकास में बहुत योग दिया।

द्विवेदीयुगीन आलोचना के विविध रूप

द्विवेदी युग में हिंदी आलोचना के पाँच रूप मिलते हैं-

  • 1) शास्त्रीय आलोचना
  • 2) तुलनात्मक आलोचना
  • 3) अनुसंधानपरक आलोचना
  • 4) परिचयात्मक आलोचना
  • 5) व्याख्यात्मक आलोचना

अब हम उपर्युक्त सभी पाँच प्रकारों को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे :

शास्त्रीय आलोचना

प्रथम वर्ग की शास्त्रीय आलोचना में संस्कृत आचार्यों की पद्धति पर लक्षण-ग्रंथ लिखने की परंपरा है जो रीतिकाल से चली आ रही थी।

 इस प्रकार की आलोचनाओं में जगन्नाथ प्रसाद भानु कृत काव्य प्रभाकर (1910ई.) तथा छंद सारावली (1917ई.) और लाला भगवानदीन रचित अलंकार मंजूषा (1916ई.) महत्वपूर्ण हैं।

जगन्नाथ प्रसाद ने अंग्रेजी में भूमिका लिखी है और हिंदी के पारिभाषिक शब्दों के अंग्रेजी पर्याय भी दिए है। लाला भगवानदीन ने हिंदी अलंकारों की समुचित जानकारी देने के साथ ही साथ फारसी, अरबी और अंग्रेजी अलंकारों का भी उल्लेख किया है।

तुलनात्मक आलोचना

तुलनात्मक आलोचना द्विवेदी युग की प्रमुख प्रवृत्ति कही जा सकती है। इस क्षेत्र में पं.पद्मसिंह शर्मा का नाम महत्वपूर्ण है। उन्होंने बिहारी और देव की तुलना द्वारा 1907 ई. में तुलनात्मक आलोचना का आरंभ किया।

 मिश्र बंधुओं (पं. गणेश बिहारी, श्याम बिहारी तथा शुक्रदेव बिहारी) द्वारा रचित हिंदी नवरत्न (1910ई.) में भी तुलनात्मक आलोचना को महत्व दिया गया।

 लाला भगवानदीन और कृष्णबिहारी मिश्र ने देव और बिहारी की विशद तुलना करते हुए एक को दूसरे से बड़ा सिद्ध करने का प्रयत्न किया।

अनुसंधानपरक आलोचना

अनुसंधानपरक आलोचना का विकास नागरी प्रचारिणी पत्रिका (1897ई.) के प्रकाशन से हुआ।

शोधपरक आलोचना के उल्लेखनीय आलोचक हैं – मिश्र बंधु, श्यामदास, जगन्नाथ दास रत्नाकर और सुधाकर द्विवेदी

 मिश्र बंधु रचित मिश्र बंधु-विनोद (1913ई.) में कवियों के जीवन-वृत्तों के साथ उनकी कृतियों की जानकारी तथा उनके काव्य के संबंध में अपना मत प्रकट किया गया।

आगे चलकर चंद्रधर शर्मा गुलेरी’ ने जयपुर से समालोचक (1902ई.) पत्र निकाला जो मुख्यत: आलोचना का पत्र था। इस पत्र से हिंदी आलोचना का स्तर ऊँचा हुआ।

परिचयात्मक आलोचना

परिचयात्मक आलोचना में सरस्वती के माध्यम से स्वयं महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा लिखी गई आलोचनाएँ हैं। द्विवेदी जी ने विषय विवेचन के साथ ही भाषा संबंधी त्रुटियों की ओर भी ध्यान आकृष्ट किया। यह कार्य उन्होंने अपनी समालोचना द्वारा ही किया।

उन्होंने समालोचना-समुच्चय नाम से अलग से भी अपना एक निबंध संग्रह प्रकाशित किया जिसमें ज्ञान-विज्ञान तथा प्राचीन काव्य से संबंधित उनके कई महत्वपूर्ण लेख संग्रहीत हैं।

उन्होंने अपनी आलोचना में उन्हीं कृतियों को महत्व दिया जो सामाजिक उत्थान और राष्ट्रीय विकास की भावना फैला रही थीं।

द्विवेदी जी संस्कृत के कालिदास, भवभूति, भक्तिकाल के सुर-तुलसी तथा आधुनिक हिंदी के भारतेन्दु तथा मैथिलीशरण गुप्त के प्रशंसक थे। उनका आलोचनात्मक ग्रंथ हिंदी कालीदास की समालोचना’ (1901ई.) हिंदी में आलोचना-साहित्य की किसी कवि पर पूरी तरह विचार करने वाली पहली पुस्तक मानी जाती है।

व्याख्यात्मक आलोचना

व्याख्यात्मक आलोचना में आलोच्य विषय की उपयोगिता को ध्यान में रखा जाता है तथा नैतिक, समाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और सौंदर्यपरक मूल्यों के आधार पर विशद और गंभीर विवेचन किया जाता है।

 बालकृष्ण भट्ट ने हिंदी प्रदीप में नील देवी’, ‘परीक्षा गुरु, और संयोगिता स्वयंवर की गंभीर आलोचना करके इस पद्धति को मजबूत किया।

 बालमुकुंद गुप्त ने हिंदी बंगवासी में अश्रुमती नामक बंगला नाटक के हिंदी अनुवाद (मुंशी उदित नारायण कृत) की आलोचना द्वारा इस परंपरा को आगे बढ़ाया। किंतु आलोचना की इस गंभीर शैली का पूर्ण विकास आगे चलकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किया।


निष्कर्ष

द्विवेदी युग के प्रवर्त्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के आगमन से हिंदी आलोचना को एक नवीन प्रेरणा मिली। ‘सरस्वती’ का सम्पादक बनने से पहले, इन्होंने हिन्दुस्तान नामक पत्र में आलोचनात्मक लेखमाला प्रकाशित करानी आरम्भ कर दी थी।

आचार्य द्विवेदी एक महान आलोचक थे और इन्होंने हिंदी  के गुणदोषात्मक आलोचना पद्धति का आरम्भ किया और कालिदास की निरंकुशता‘, ‘नैध चरित चर्चा‘, विक्रमांक देवचरित चर्चा’ जैसे आलोचनात्मक ग्रन्थ लिखे।

मिश्रबन्धुओं ने हिंदीनवरत्न’ नामक आलोचनात्मक ग्रन्थ की रचना की और इसमें हिंदी के प्रमुख नौ कवियों पर विचार किया। रीतिकालीन कवि देव और बिहारी में से देव को बड़ा सिद्ध किया। इनकी आलोचना-शैली शास्त्रीय एवं तुलनात्मक है। हिंदी नवरत्न में देव बड़े या बिहारी विवाद की शुरुआत हुई ।

मिश्रबंधुओं ने हिंदी नवरत्न में निम्नलिखित नौ कवियों को स्थान दिया :

तुलसीदास, सूरदास, देवदत्त ‘देव’, बिहारीलाल, त्रिपाठी बंधु – भूषण और मतिराम, केशवदास, कबीरदास, चंदबरदाई, भारतेन्दु हरिशचंद्र।  

पं. पद्मसिंह शर्मा ने ‘बिहारी सतसई की भूमिका’ के माध्यम से बिहारी के काव्य सौष्ठव का उ‌द्घाटन किया और उन्हें देव से श्रेष्ठ सिद्ध किया।

कृष्ण बिहारी मिश्र ने देव और बिहारी नामक पुस्तक लिखकर इन दोनों कवियों की संयंत तुलना की और देव को बिहारी से श्रेष्ठ सिद्ध किया।

लाला भगवानदीन की आलोचनात्मक कृति देव और बिहारी है और इसमें इन्होंने कृष्ण बिहारी मिश्र के आक्षेपों का उत्तर देते हुए, बिहारी को देव से श्रेष्ठ सिद्ध किया है।

सैद्धान्तिक आलोचना के क्षेत्र में बाबू श्यामसुन्दर दास ने महत्वपूर्ण सहयोग दिया। इन्होंने साहित्यालोचन‘, ‘रूपक रहस्य एवं हिंदी भाषा और साहित्यनामक आलोचनात्मक पुस्तकें लिखीं।

इस तरह द्विवेदी युग में आलोचना के दो प्रतिमान मुख्य रहे – एक तो परंपरागत शास्त्रीय दृष्टि जिसके आधार पर आलोच्य कृति के गुण-दोषों का विवेचन किया जाता था और उसे उत्कृष्ट या हीन बताया जाता था।

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