वास्तव में हिंदी आलोचना का पूर्ण रूप शुक्ल युग में ही निखर पाया और इसका श्रेय इस युग के प्रमुख आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल को है। आज के इस लेख में हम Shukla Yugin Hindi Alochana को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।
शुक्ल युग से पूर्व दोष-दर्शन, गुणकथन, निर्णय और तुलना जैसे स्थूल तत्वों को प्रमुखता दी जाती थी, पर आचार्य शुक्ल ने अपनी आलोचना में विश्लेषण (Analysis), विवेचन (Interpretation) और निगमन (Induction) जैसे तत्वों को प्रमुखता दी जिनमें आलोचक की तटस्थता का तत्व भी निहित था।
इस युग में कवि-विशेष के सामान्य गुण-दोष प्रकट करने के साथ ही उसके काव्य की मूल प्रवृत्तियों और उसमें निहित शाश्वत तत्वों की छानबीन भी की गई।
कृति को देशकाल सापेक्ष रखकर परखा गया और मानवीय मूल्यों को प्रमुखता दी गई।
इतना ही नहीं संस्कृत काव्य-शास्त्रीय सिद्धांतों के प्रकाश में नए पश्चिमी काव्य-शास्त्रीय सिद्धांतों को भी स्थान दिया गया। समीक्षा की इस नई परिपाटी को जन्म देने का श्रेय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को ही है। इसीलिए इस युग को शुक्ल युग के नाम से अभिहित किया गया।
इस युग में समीक्षा के लिए जो मानदंड और शैली अपनाई गई उनमें प्रमुख हैं-
- 1. सुरुचि और नैतिकता
- 2. शास्त्रीयता
- 3. कवि के व्यक्तित्व का अध्ययन
- 4. तुलना और निर्णय
- 5. देशकाल की समीक्षा
सुरुचि और नैतिकता
इस युग के आलोचकों ने साहित्य की नैतिक उपयोगिता को स्वीकार किया और वे कला में उच्च आदर्शो की प्रतिष्ठा के हिमायती रहे। इन आलोचकों ने माना कि साहित्य जीवन की व्याख्या है।
साधारणीकरण का सिद्धांत भी उन्होंने स्वीकार किया।
यही वजह रही कि इस युग में केशव, कबीर और रीतिकालीन कवियों का महत्व कम माना गया। जायसी की अपेक्षा कबीर के रहस्यवाद को तथा तुलसी की तुलना में सूर को कम आँका गया | हालाँकि बाद में शुक्लजी ने सूर संबंधी अपनी मान्यताओं का खंडन किया।
शास्त्रीयता
इस कोटि की आलोचना की विशेषता है काव्य-शास्त्र के अनुसार चलना। इस युग के आलोचकों ने भारतीय और पाश्चात्य दोनों प्रकार के तत्वों का उपयोग किया है लेकिन शुक्लजी की तरह ये समन्वय नहीं कर सके।
उन्होंने रस, अलंकार, गुण, वृत्ति आदि का भी उपयोग किया तथा साथ ही कल्पना, अनुभूति आदि पाश्चात्य तत्वों को भी ग्रहण किया। बाबू श्यामसुंदर दास में भी दोनों परंपराएं अलग-अलग हैं। (साहित्यालोचन)
हिंदी में कहानियों, नाटकों, उपन्यासों और निबंधों पर इस युग में शास्त्रीय समालोचना बहुत कम हुई। उपन्यासों की आलोचना में वस्तु, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन, उद्देश्य आदि तत्वों का पाश्चात्य दृष्टिकोण से विचार हुआ है। जैसे – जनार्दन प्रसाद झा ‘द्विज’ रचित ‘प्रेमचंद की उपन्यास कला’।
कहानी और निबंधों के संग्रहों की भूमिकाओं में भी इन विधाओं की तात्विक समीक्षाएं हुई है। डॉ.श्रीकृष्ण लाल, शिलीमुख आदि के कहानी संग्रहों की भूमिकाएँ इसके अच्छे उदाहरण हैं।
वैधानिक समालोचना (जिसमें शास्त्रीय तत्वों का आरोप किया गया हो) का सबसे सुंदर उदाहरण पं.धर्मेन्द्र ब्रह्मचारी द्वारा लिखित ‘महाकवि हरिऔध का प्रियप्रवास’ है जिसमें रस, अलंकार की दृष्टि से तो विचार किया ही गया है, पाश्चात्य साहित्य सिद्धांतों की दृष्टि से भी जांचा-परखा गया है। इस युग में शास्त्रीय समीक्षा के कुछ अच्छे उदाहरण हैं – प्रेमनारायण टंडन का ‘गोदान और गबन’, श्री जगन्नाथ प्रसाद शर्मा का ‘प्रसाद जी के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन’, डॉ.सत्येन्द्र रचित ‘प्रेमचन्द की कहानी कला’ ।
कवि के व्यक्तित्व का अध्ययन
शुक्ल युग के आलोचकों ने आलोच्य कवियों की रचनाओं के अध्ययन के साथ कवि के व्यक्तित्व को समझने समझाने का प्रयत्न किया।
वस्तु-विन्यास, रस-पद्धति, अलंकार-नियोजन, चरित्र कल्पना, जीवन की व्याख्या आदि का विश्लेषण करके कवि की सामान्य प्रवृत्तियों का उद्घाटन करना ही आलोचक का मुख्य ध्येय हो गया।
इसके अतिरिक्त कवि की कृतियों के आधार पर उसी चिंतन-धारा का अध्ययन भी किया, जैसे डॉ.रामकुमार वर्मा लिखित ‘कबीर’ और डॉ.पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल कृत ‘निर्गुण सम्प्रदाय संबंधी आलोचना’।
शुक्ल युग में आलोचना की एक और पद्धति सामने आई (मनोवैज्ञानिक) जिसमें कवि के व्यक्तित्व और कलाकृति में अभिन्न संबंध स्थापित किया गया।
इस पद्धति में आलोचक कवि के व्यक्तित्व का वह अंश स्पष्ट कर देता है जिससे कवि को अपनी विशेष विचारधारा और भावात्मकता के लिए सामग्री और प्रेरणा प्राप्त हुई है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘तुलसीदास’ के विवेचन में इस पद्धति को अपनाया। डॉ. सत्येन्द्र ने ‘गुप्त जी की कला’ पर इसी दृष्टि से विचार किया।
इस युग में चरितमूलक आलोचना के भी फुटकर प्रयास हुए। इसमें कवि द्वारा कथित अंतरंग प्रमाणों के आधार पर जीवनी का अध्ययन किया जाता है।
तुलना और निर्णय
ये दोनों पद्धतियाँ आरंभ से ही चली आ रही थीं। कबीर, जायसी, सूर, तुलसी आदि प्राचीन कवियों पर इसी तरह की आलोचना हुई है।
शुक्ल जी कबीर के रहस्यवाद को साधनात्मक मानते हैं पर उनमें प्रेम की व्यंजना नहीं मिलती। अतः शुक्ल जी की दृष्टि से जायसी का रहस्यवाद अधिक स्वाभाविक और हृदयस्पर्शी है। लेकिन बाबू श्यामसुंदर दास को यह मान्य नहीं।
इस प्रकार इन दोनों आलोचनाओं में तुलना और निर्णय स्पष्ट है। कृष्ण बिहारी मिश्र (देव और बिहारी) और भगवानदीन (बिहारी और देव) ने तुलनात्मक आलोचना पद्धति अपनाई।
देशकाल की समीक्षा
साहित्य को उसकी परिस्थितियों में रखकर आँकने की आलोचनात्मक पद्धति का सूत्रपात शुक्ल जी ने ही किया। उन्होंने सूर, तुलसी आदि कवियों के महत्व को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में रखकर आँका।
‘हिंदी शब्द सागर’ की भूमिका में शुक्लजी ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ प्रस्तुत किया। इतना ही नहीं उन्होंने कवियों एवं काव्यधाराओं के देशकाल पर विचार किया। इस युग के आलोचकों ने भी इस ऐतिहासिक समीक्षा पद्धति का उपयोग किया। पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने भूषण की कविता को देशकाल की परिस्थितियों में रखकर उस पर विचार किया।
शुक्ल युग के प्रमुख आलोचक
बाबू गुलाबराय, बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, डॉ. रामकुमार वर्मा आदि शुक्ल युग के प्रमुख आलोचक हैं ।
अब हम इनके आलोचनात्मक अवदान का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को ‘हिंदी का पथिकृत आचार्य’ कहा जाता है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को हिंदी में वैज्ञानिक आलोचना का अनुसंधानकर्ता माना जाता है ।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी आलोचना क्षेत्र में प्रवेश करते ही सबसे महत्वपूर्ण कार्य किया – साहित्यिक रुचि में परिवर्तन।
इससे पूर्व हिंदी के आलोचक रीति साहित्य को ही उपयुक्त मानते थे। शुक्ल जी ने पूरी साहित्यिक परम्परा का पुनर्गठन किया। उन्होंने अपनी व्यावहारिक आलोचना के माध्यम से हिंदी कवियों का जो क्रमिक मूल्यांकन प्रस्तुत किया, वह उनके समय की बदली रुचि का प्रमाण है।
शुक्ल जी ने लोकमंगलकारी रूप को साहित्य के मूल्यांकन का आधार बनाया और पहली बार मूल्यांकन के मौलिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।
उन्होंने प्राचीन भारतीय तथा पाश्चात्य आलोचना सिद्धांतों का गहन अध्ययन कर समन्वयवादी आलोचना सिद्धांतों की रचना की।
शुक्ल जी ने ‘कविता क्या है’, ‘साहित्य’, ‘काव्य में रहस्यवाद’ आदि निबंधों से सैद्धांतिक समीक्षा का सूत्रपात किया। ‘चिंतामणि’ में संकलित निबंधों से उनके व्यापक अध्ययन और गहरी दृष्टि का परिचय मिलता है।
शुक्ल जी ने हिंदी में पहली बार रस-विवेचन को मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया।
‘रस मीमांसा’ में रस के शास्त्रीय विवेचन की मौलिक व्याख्या की। उन्होंने रस को काव्य की आत्मा तो माना, परन्तु रस की परम्परागत व्याख्या उन्हें मान्य न थी। उन्होंने अपने रसवाद में अनुभूति को सर्वोपरि महत्व देकर उसे लोक मानस से जोड़ा।
वे अनुभूति प्रधान काव्य को ही उत्तम काव्य समझते थे। उनकी अनुभूति आत्माभिव्यक्ति प्रधान अनुभूति से भिन्न थी।
उनका मानना था कि ‘लोक हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रस दशा है’। इस प्रकार उन्होंने साधारणीकरण की पुनः प्रतिष्ठा की।
रसवादी, नीतिवादी और लोकमंगलवादी होने के कारण शुक्ल जी ने तुलसी और जायसी के काव्य सौष्ठव का उद्घाटन किया, किन्तु कबीर, रीतिकाल और छायावाद के कवियों को उचित महत्व न दे सके।
इसी तरह प्रबंध काव्य को उन्होंने श्रेष्ठ माना और मुक्तक काव्य तथा गीतात्मकता को उनका उतना समर्थन नहीं मिल पाया।
शुक्ल जी के आलोचक व्यक्तित्व की एक बहुत बड़ी विशेषता थी – व्यापक और सजग दृष्टि । अपने समय के हर साहित्यिक विवाद की तरफ उनका ध्यान जाता था और वे उस पर अपनी राय भी देते थे। जितनी लगन से वे प्राचीन और मध्ययुगीन काव्य का विवेचन करते थे उतना ही ध्यान आधुनिक साहित्य और विषयों पर भी देते थे। तभी तो काव्य के अतिरिक्त अपने समय के गद्य साहित्य की सभी पद्धतियों और प्रवृत्तियों को समझ कर उन्होंने इतिहास में उसका विवेचन किया।
निबंध की विवेचना में उन्होंने लिखा – “यदि गद्य कवियों या लेखकों की कसौटी है तो निबंध गद्य की कसौटी है। भाषा की पूर्ण शक्ति का विकास निबंधों में ही सबसे अधिक संभव होता है”।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के प्रमुख आलोचनात्मक ग्रंथ– ‘जायसी ग्रंथावली’ (1925 ई.), ‘भ्रमरगीतसार’ (1926 ई.), ‘गोस्वामी तुलसीदास’ (1933 ई.), ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ (1929 ई.)।
बाबू श्याम सुंदरदास
बाबू श्याम सुंदरदास का शुक्ल जी के समकालीन आलोचकों में प्रमुख स्थान है। इन्होंने भी आलोचना के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया।
बाबू श्याम सुंदरदास ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों क्षेत्रों में कार्य किया लेकिन शुक्ल जी की तरह वे दोनों का समन्वय नहीं कर सके।
‘साहित्यालोचन’ ग्रंथ की रचना उन्होंने एम.ए. के विद्यार्थियों को विषय की अधिकाधिक जानकारी देने के लिए की। इस ग्रंथ में उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य सिद्धांतों का समन्वय करके साहित्य समीक्षा को उदार बनाया।
बाबू श्याम सुंदरदास का सिद्धांत प्रतिपादन शास्त्रीय एवं तर्क संगत है। उन्होंने कवियों की प्रामाणिक जीवनी अद्वितीय ढंग से प्रस्तुत की। उन्होंने रस और अलंकार के साथ-साथ उपन्यास, कहानी, निबंध आलोचना आदि नवीन विधाओं का भी विवेचन किया। नाटक पर उन्होंने ‘रूपक रहस्य’ की रचना की।
बाबू श्यामसुंदर दास के प्रमुख आलोचनात्मक ग्रंथ – ‘कबीर ग्रंथावली की भूमिका’, ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ तथा ‘भारतेन्दु हरिश्चंद्र’ उनकी व्यावहारिक आलोचना के प्रतिनिधि ग्रंथ है।
इनके अतिरिक्त बाबू श्याम सुंदरदास ने पत्र-पत्रिकाओं में बहुत से आलोचनात्मक लेख भी लिखे। ‘नागरी प्रचारिणी’ पत्रिका में तो उनके लेख बराबर ही प्रकाशित होते रहे।
प्राचीन पुस्तकों के शोध कार्य का विवरण भी इसी पत्रिका के माध्यम से देते रहे जो कम महत्व नहीं रखता।
इस प्रकार बाबू श्याम सुंदरदास ने हिंदी के आलोचना शास्त्र को स्वतंत्र रूप से विकसित करने का प्रयत्न किया और इस दिशा में कार्य करने के लिए अध्यापकों और शोधार्थियों को प्रोत्साहित किया।
बाबू गुलाबराय
बाबू गुलाबराय ने ‘साहित्य संदेश’ नामक आलोचनात्मक पत्रिका का सम्पादन करके हिंदी आलोचना के प्रचार-प्रसार में काफी योग दिया।
उन्होंने दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक आधार पर काव्य सिद्धांतों की परख ‘जीवन के तत्व और काव्य के सिद्धांत’ (1942 ई.) ग्रंथ में की।
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र जी का मध्ययुगीन काव्य की साफ-सुथरी टीकाओं के लिए तत्कालीन आलोचना में महत्वपूर्ण स्थान है।
‘वाङ्मय विमर्श’, ‘बिहारी की वाग्विभूति’, ‘हिंदी साहित्य का अतीत’ और ‘हिंदी का सामयिक साहित्य’ ग्रंथों की रचना द्वारा मिश्र जी ने सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक समीक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया।
छायावादी कवियों द्वारा की गई आलोचना
तीसरे दशक की आलोचना के विकास में छायावादी कवियों का भी उल्लेखनीय योगदान है। छायावादी काव्य पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के लगाए गए आरोपों के जवाब में छायावादी कवियों ने अपनी कविता के बचाव में जो आलोचनाएं लिखीं, उनका बड़ा महत्व है। उन्होंने आलोचना को नई दिशा देने के लिए प्राचीन शास्त्रवादी साहित्यिक मूल्यों का विरोध तो किया ही, नए मूल्यों के प्रश्न भी खड़े किए।
सबसे पहले सुमित्रानंदन पंत ने ‘पल्लव‘ (1927 ई.) और ‘वीणा’ (1929) की भूमिकाओं में रीतिकाल से द्विवेदी युग तक की कविता की कमियाँ बताते हुए छायावादी कविताओं की वकालत की।
जयशंकर प्रसाद ने 1936 ई. में ‘हंस’ के अनेक अंकों में काव्य की आलोचना विषयक निबंध लिखे जिसका संकलन बाद में ‘काव्य और कला तथा अन्य निबंध’ (1939 ई.) शीर्षक से हुआ।
इन निबंधों में उन्होंने काव्य और कला, रहस्यवाद, नाटकों में रस का स्थान, रंगमंच, यथार्थवाद, छायावाद आदि के संबंध में अपने विचार प्रकट किए।
प्रसाद ने छायावाद की आलोचना से संबंधित तीन काम किये- छायावाद को भारतीय चिंतन परंपरा से विकसित माना, छायावाद को मात्र शैली चमत्कार न मानकर उसका संबंध अनुभूति, चमत्कार से जोड़ा तथा छायावादी कविता के सौंदर्य में निहित शिवत्व के दर्शन कराए।
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘पंत और पल्लव’ (1927 ई.) शीर्षक निबंध माला में कविताओं का सूक्ष्म विश्लेषण किया।
‘परिमल की भूमिका’ (1930 ई.) में निराला ने मुक्त छंद के विवेचन द्वारा हिंदी में एक नए छंद शास्त्र की स्थापना की।
इतना ही नहीं छायावाद के संदर्भ में अपने विरोधियों को उत्तर देने के लिए अनेक पत्र-पत्रिकाओं में लेख लिखे, जिनमें भाषा, छंद, तुक, लय, समसामयिकता, सार्वदेशिकता, स्थानीयता आदि को लेकर अनेक मौलिक प्रश्न उठाए जो भावी आलोचना के लिए मार्गदर्शक बने।
महादेवी वर्मा ने भी ‘सांध्यगीत’ (1936 ई.) की भूमिका में छायावाद और रहस्यवाद की व्याख्या का प्रयत्न किया। ‘साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध’ उनके स्फुट लेखों का संग्रह है।
छायावाद के समर्थक आलोचकों में नंददुलारे वाजपेयी, अवध उपाध्याय, कृष्णदेव प्रसाद गौड़, शांतिप्रिय द्विवेदी, रामनाथ लाल ‘सुमन’ और डॉ.नगेन्द्र आदि उल्लेखनीय हैं।
निष्कर्ष
शुक्ल युग के सर्वश्रेष्ठ आलोचक आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं । इन्होंने हिंदी आलोचना को नवीन दिशाएं प्रदान की हैं । इनकी सैद्धांतिक एवं व्याख्यात्मक आलोचना में मौलिक प्रतिभा और गंभीर विवेचना-शैली का सौष्ठव मिलता है । इन्होंने सूर, तुलसी और जेसी पर गंभीर एवं विस्तृत आलोचनात्मक ग्रंथ लिखे हैं ।
शुक्ल युग के अन्य आलोचकों में बाबू गुलाबराय, बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, लक्ष्मीनारायण ‘सुधांशु’, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, डॉ. रामकुमार वर्मा, जगन्नाथ प्रसाद भानु, रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’, किशोरीदास वाजपेयी, कन्हैयालाल गुप्त, सेठ गोविन्ददास, रामकृष्ण शुक्ल, ब्रजरत्नदास इत्यादि हैं ।

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