सिद्ध साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ । Siddha Sahitya Ki Pramukh Visheshataen  

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वज्रयानी-परंपरा के सिद्धाचार्यों की वे रचनाएँ, जो दोहा तथा चर्यापदों के रूप में उपलब्ध हैं और जिनमें बौद्ध तांत्रिक मान्यताओं को वाणी मिली है, ‘सिद्ध-साहित्य’ है। सिद्ध-साहित्य बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा के प्रचार हेतु रचा गया था।

राहुल सांकृत्यायन तथा प्रबोध चन्द्र बागची ने 84 सिद्धों का उल्लेख किया है, जिनमें सरहपा, शबरपा, लुइपा, कण्हपा, कुक्कुरिपा इत्यादि बहुत प्रसिद्ध हैं।

प्रथम बौद्ध सिद्ध एवं सिद्धों में सबसे पुराने सरहपा हुए। 84 सिद्ध कवियों में सबसे ऊँचा स्थान लुइपा का था। सिद्ध कवियों में पांडित्य और कवित्व में कण्हपा बेजोड़ थे। सिद्ध कवियों के नाम के आगे ‘पा’ शब्द आदरसूचक है। सिद्ध कवियों की भाषा संधा या संध्या भाषा थी।

प्रमुख सिद्ध कवियों की रचनाएँ 

प्रमुख सिद्ध कवियों की रचनाएं निम्नानुसार हैं :

क्र.सं.सिद्ध कविकालरचनाएं
1सरहपा7वीं-8वीं शतीप्रथम सिद्ध, दोहाकोश, चर्यागीत
2शबरपा8वीं शतीचर्यापद
3लुइपा8वीं शती84 सिद्धों में सबसे ऊँचा स्थान, बुद्धोदय, अभिसमय विभाग, गीतिका
4कण्हपा9वीं शती74 ग्रंथ, दार्शनिक विषय एवं रहस्यवादी गीतों पर
5डोम्भिपा9वीं शतीयोगचर्या, अक्षरद्विकोपदेश, डोम्भिगीतिका

सिद्ध-साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ

सिद्ध साहित्य की प्रमुख विशेषताएं या प्रमुख प्रवृत्तियाँ निम्नानुसार हैं :

1. सिद्ध-साहित्य का वर्ण्य-विषय प्रमुख रूप से 3 पक्षों से संबंधित है :

  •  (i) नीति और आचारमय,
  •  (ii) उपदेशात्मक और 
  • (iii) साधनात्मक अर्थात रहस्यवादी। इनके अतिरिक्त फुटकर रूप में सिद्ध-साहित्य में काव्यशास्त्रीय तथ्यों का भी यत्र-तत्र उल्लेख मिलता है।

2. सिद्ध-साहित्य में वेदसम्मत एवं ब्राह्मण सम्मत धर्म (अर्थात् वैदिक एवं ब्राह्मण धर्म) का बहुत तीव्रता से खंडन हुआ और योग-साधना, काया-साधना एवं शून्य समाधि (सहज समाधि) पर जोर दिया गया है।

लक्ष्मीसागर वाषर्णेय ने लिखा है कि- “सिद्धों ने बताया कि वेद, उपनिषद्, ब्राह्मण, जातिभेद, यज्ञ इत्यादि से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। इन सबका तो उन्होंने घोर खंडन किया है और परोपकार, दान, दया इत्यादि का उपदेश दिया। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा लोगों का ध्यान अंतर्मुखी योग की ओर आकर्षित किया।”

3. सिद्ध-साहित्य में पाँच मकारादि (पंचमकार) मत्स्य, मांस, मद्य, मुद्रा और मैथुन को किसी-न-किसी प्रकार से उचित ठहराकर इनकी प्रतिष्ठा की गई है। गृहस्थ जीवन पर बल देने के कारण सिद्ध-साहित्य में स्त्री-भोग को आवश्यक माना गया है। सिद्धों का गुह्याचारों पर विश्वास था इसलिए सिद्ध-परम्परा में अनेक गुह्य-समाज स्थापित हुए, जिसमें स्त्री-सेवन आवश्यक समझा गया। (गुह्य = रहस्य)

4. सिद्ध-साहित्य में तंत्र साधना, परावृत्ति (पलट हुआ), उल्टी-साधना का उल्लेख मिलता है। सिद्धों ने महासुख और परमानंद की प्राप्ति और उसकी अनिवर्चनीयता (अकथनीयता) का उल्लेख बार-बार किया है। सिद्धों का ऐसा मानना है कि आनंद की प्राप्ति से दुःख, शोक, भय, आदि विस्मृत हो जाते हैं और ज्ञान का प्रकाश हो जाता है। महासुख या सहजानंद की प्राप्ति अविद्या से मुक्त होने पर ही हो सकती है।

5. सिद्ध-साहित्य में बाह्याडम्बरों, पाखंडों, सामाजिक कुरीतियों, जाति-पाँति-भेद, वर्णभेद, शास्त्र विजड़ित तत्त्ववाद इत्यादि का घोर विरोध किया गया।

वेद पुराण, पंडितों की खबर लेते हुए कण्हपा कहते हैं कि

आगाम वेद पुराणे पंडित मान बहति।

पक्क सिरिफल अलिअ जिम वाहेरित भ्रमयंति

6. गुरु-महात्म्य सिद्ध-साहित्य की एक अन्यतम विशेषता है। सिद्धों की दृष्टि में गुरु का स्थान वेद और शास्त्रों से भी ऊँचा है। गुरु के बिना कुछ भी प्राप्ति संभव नहीं है। सरहपा ने कहा है कि गुरु-कृपा से ही सहजानंद की प्राप्ति होती है।

सिद्ध-साहित्य में सहज सुख की प्राप्ति के लिए गुरु-ज्ञान को आवश्यक माना गया है। उनकी दृष्टि में गुरु की सहायता से ही माया मोह का बंधन कटता है।

सरहपा कहते हैं कि जिसने गुरुकृपा का अमृतपान नहीं किया, वह शास्त्रों की मरूभूमि में प्यास से व्याकुल होकर मृत हो जाएगा-

गुरु उवएसे अमिरसु धावण पीएड जे ही।

बहु सत्यत्य मरुथलहिं तिसिय मरियड़ ते ही।

7. सिद्ध-साहित्य में ‘रहस्यात्मक अनुभूति’ की गंभीर अभिव्यंजना मिलती है। सिद्धों ने नौका, जुलाहा, रूई धुनना, विवाह, चौपड़, वृक्ष, कच्छप, वीणा, चूहा, हिरण इत्यादि रूपकों का प्रयोग रहस्य भावना प्रकट करने के लिए किया है।

इसी प्रकार रवि, शशि, कमल, कुलिश, प्राण, अवधूत सरीखे अनेक शब्दों का प्रयोग सिद्ध-साहित्य में तांत्रिक साधनाओं हेतु किया गया है। उदाहरण के लिए –

रवि कला मेलह, शशिकला बारह वेणि बाग वहन्त।

तोहड़ समन्ता सरस जाउ न जायते कागण जगफल खाय ।।

सिद्धों की वाणियों में जीवन का आशावादी संदेश अभिव्यक्त हुआ है।

 8. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में “जो जनता नरेशों की स्वेच्छाचारिता, पराजय या पतन से त्रस्त होकर निराशावाद के गर्त्त में गिरि हुई थी, उसके लिए सिद्धों की वाणी ने संजीवनी का कार्य किया।”

निराशावाद के भीतर से आशावाद का संदेश देना, संसार की क्षणिकता में उनके वैचित्र्य का इन्द्रधनुषी चित्र खींचना इन सिद्धों की कविता का गुण था और उसका आदर्श था जीवन की भयानक वास्तविकता की अग्नि से निकलकर मनुष्य को महासुख के शीतल सरोवर में अवगाहन (डुबकी लगवाना) कराना।

सिद्ध साहित्य की कलापक्ष विषयक विशेषताएँ

सिद्ध साहित्य की कलापक्ष विषयक विशेषताएं निम्नानुसार हैं :

1. सिद्धों की रचनाएँ अर्द्धमागधी अपभ्रंश में रचित हैं। चूँकि सिद्धों के प्रमुख केंद्र नालंदा एवं विक्रमशीला थे, इसलिए इनकी भाषा बिहार में बोली जाने वाली अर्धमागधी अपभ्रंश के काफी निकट है। कुछ आलोचकों ने इसे संध्या भाषा भी कहा है।

2. सिद्धों ने अपनी रचनाएँ मुक्तक-शैली में की है। इनकी काव्य शैली में रहस्यात्मकता की प्रधानता मिलती है।

3. सिद्धों की रचनाएँ चर्यागीत और दोहाकोशों के रूप में प्रायः मिलती हैं। चौपाई, सोरठा, छप्पय के उदाहरण भी यत्र-तत्र मिलते हैं। सिद्धों के चर्यागीत गेय पदों के रूप में हैं, जिनमें किसी-न-किसी एक राग (यथा-मलारी, कामोद, भैरवी, गुर्जरी इत्यादि) का प्रयोग अवश्य मिलता है। दोहाकोश में प्रायः दोहा छंद का ही प्रयोग हुआ है।

4. सिद्ध-साहित्य शृंगार एवं शांत रस प्रधान साहित्य है। इनका शांत रस एक स्वतंत्र ‘अलौकिक रस’ माना गया है। सिद्ध-साहित्य में कुछ रचनाएँ वीर-रस से भी ओत-प्रोत हैं।

 शृंगार-रस के उदाहरण देखें-

जोदूनि तँह बिनु खनहि न जीवमि

तो मुह चुंबी कमलरस न जीवमि।।    – गुंडरीप 

(योगिनी! मैं तेरे बिना क्षणभर के लिए भी जीवित नहीं रहता। मैं तो तेरे चुम्बन द्वारा कमलरस का पान किया करता हूँ)

सिद्ध साहित्य पर आक्षेप (आरोप)

सिद्ध-साधना में स्त्री-सेवन, स्त्री-भोग को अत्यधिक महत्त्व मिला जिसके फलस्वरूप सिद्धों के जीवन-पद्धति में बदलाव आया और उनकी जीवन-चर्चा स्वेच्छाचार (मनमाना आचरण, मनमानी करना) में परिणत हो गई और सिद्धों की वाणियाँ भी इससे अछूती नहीं रहीं। सिद्धों की वाणियों में स्वेच्छाचार के विकृत प्रयास हुए। धर्म और अध्यात्म की आड़ में स्त्री-भोग की पक्षधरता से तत्कालीन समाज अश्लीलता और कामुकता के कीचड़ से मलिन हो गया।

निष्कर्ष

  • इन आक्षेपों के बावजूद भी सिद्ध-साहित्य अपनी विशेषताओं के कारण अजर-अमर साहित्य है। संत साहित्य और रहस्यवाद का बीज सिद्ध-साहित्य में ही प्राप्त होता है। इनकी संधा भाषा और उलटबासियाँ कबीर आदि संतों में पुनः दिखाई पड़ती है।
  • इनकी संधा भाषा नाथों की वाणी से पुष्ट होकर कबीर की उलटबांसियों में प्रवाहित होती हुई गुरु नानक, दादू, मलूकदास इत्यादि संतों में संत वाणी का रूप धारण करती है।
  • सिद्ध-साहित्य में संत-साहित्य और रहस्यवाद का बीज मिलता है। सिद्ध-साहित्य का महत्त्व इस दृष्टि से सर्वाधिक है कि इससे हिंदी साहित्य के आदिरूप की सामग्री प्रामाणिक रूप में प्राप्त होती है।


 

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