सन्त काव्यधारा के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएँ |Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen

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‘भक्ति’ का उल्लेख सर्वप्रथम श्वेताश्वेतर उपनिषद में मिलता है । मोनियर विलियम्स के अनुसार ‘भक्ति’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘भज’ धातु से हुई है । भक्ति का उदय दक्षिण में हुआ । इस लेख में हम आज Sant Kavyadhara Ke Pramukh Kavi Aur Unki Rachanaen का अध्ययन करेंगे ।

जॉर्ज ग्रियर्सन और डॉ.श्यामसुंदरदास ने भक्तिकाल को ‘हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग’ कहा है ।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार – “भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पड़ते हुए जनता के हृदय क्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला।”

कबीरदास के अनुसार – “भक्ति द्राविड उपजी, लाए रामानन्द।

परगट किया कबीर ने, सात दीप नौ खंड।।”

हिंदी साहित्य के इतिहास का द्वितीय चरण भक्तिकाल के नाम से जाना जाता है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने वि.संवत 1375  से वि. संवत 1700 तक के कालखंड को भक्तिकाल की संज्ञा प्रदान की है । उनके अनुसार इस कालखंड में ‘भक्ति भाव’ की प्रधानता है, अतः इसे भक्तिकाल कहना उचित है ।

इसे पुनः दो भागों में विभाजित किया गया है- निर्गुण धारा और सगुण धारा । पुनः इन दोनों धाराओं दो-दो शाखाएं हैं ।  निर्गुण धारा के अंतर्गत – ज्ञानाश्रयी शाखा एवं प्रेमाश्रयी शाखा तथा सगुण धारा के अंतर्गत – रामभक्ति शाखा और कृष्णभक्ति शाखा ।

आज हम निर्गुण धारा के ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख कवियों का विस्तार से अध्ययन करेंगे । ज्ञानाश्रयी शाखा के कवियों को सन्त कवि कहा जाता है । इस शाखा के प्रतिनिधि कवि कबीर हैं ।  हिंदी में भक्ति साहित्य कि परंपरा का प्रवर्तन नामदेव ने किया । अब हम प्रमुख सन्त कवियों और उनकी रचनाओं का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।

भक्ति आंदोलन के उदय की पृष्ठभूमि

विभिन्न विद्वानों के अनुसार भक्ति आंदोलन के उदय की पृष्ठभूमि निम्नानुसार है :

कबीर 

इनकी उत्पत्ति के संबंध में अनेक प्रकार के प्रवाद प्रचलित हैं। कहते हैं, काशी में स्वामी रामानंद का एक भक्त ब्राह्मण था जिसकी किसी विधवा कन्या को स्वामी जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद भूल से दे दिया। फल यह हुआ कि उसे एक बालक उत्पन्न हुआ जिसे वह लहरतारा के ताल के पास फेंक आयी। अली या नीरू नाम का जुलाहा उस बालक को अपने घर उठा लाया और पालने लगा। यही बालक आगे चलकर कबीरदास हुआ।

कबीर का जन्मकाल जेठ सुदी पूर्णिमा, सोमवार 1398ई.  माना जाता है।

रामानंद जी के माहात्म्य को सुनकर कबीर के हृदय में शिष्य होने की लालसा जगी होगी। ऐसा प्रसिद्ध है कि एक दिन वे एक पहर रात रहते ही उस (पंचगंगा) घाट की सीढ़ियों पर जा पड़े जहाँ से रामानंद जी स्नान करने के लिए उतरा करते थे। स्नान को जाते समय अँधेरे में रामानंद जी का पैर कबीर के ऊपर पड़ गया। रामानंद जी बोल उठे, ‘राम-राम कह’। कबीर ने इसी को गुरुमंत्र मान लिया और वे अपने को गुरु रामानंद जी का शिष्य कहने लगे। वे साधुओं का सत्संग भी रखते थे और जुलाहे का काम भी करते थे।

कबीरपंथी में मुसलमान भी हैं। उनका कहना है कि कबीर ने प्रसिद्ध सूफी मुसलमान फकीर शेख तकी से दीक्षा ली थी। वे उस सूफी फकीर को ही कबीर का गुरु मानते हैं।’

रामानंद जी भक्ति का एक अलग उदार मार्ग निकाल रहे थे जिसमें जाति-पाँति का भेद और खानपान का आचार दूर कर दिया गया था। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर को ‘राम-नाम’ रामानंद जी से ही प्राप्त हुआ।

पर आगे चलकर कबीर के ‘राम’ रामानंद के ‘राम’ से भिन्न हो गये। अतः कबीर को वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत नहीं ले सकते।

कबीर ने दूर-दूर तक देशाटन किया, हठयोगियों तथा सूफी मुसलमान फकीरों का भी सत्संग किया। अतः उनकी प्रवृत्ति निर्गुण उपासना की ओर दृढ़ हुई।

अद्वैतवाद के स्थूल रूप का कुछ परिज्ञान उन्हें रामानंद जी के सत्संग से पहले ही था। फल यह हुआ कि कबीर के राम धनुर्धर साकार राम नहीं रह गए; वे

 ब्रह्म के पर्याय हुए-

दसरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।

राम नाम का मरम है आना ।।

जो ब्रह्म हिंदुओं की विचारपद्धति में ज्ञान मार्ग का एक निरूपण था उसी को कबीर सूफियों के ढरें पर उपासना का ही विषय नहीं, प्रेम का भी विषय बनाया और उसकी प्राप्ति के लिए हठयोगियों की साधना का समर्थन किया।

कबीर ने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया।

कबीर में ज्ञानमार्गी की जहाँ तक बातें हैं वे सब हिंदू शास्त्रों की हैं जिनका संचय उन्होंने रामानंद जी के उपदेशों से किया।

माया, जीव, ब्रह्म, तत्त्वमसि, आठ, मैथुन (अष्टमैथुन), त्रिकुटी, छह रिपु इत्यादि शब्दों का परिचय उन्हें अध्ययन द्वारा नहीं, सत्संग द्वारा ही हुआ।

उन्होंने हठयोगियों के साधनात्मक रहस्यवाद के कुछ सांकेतिक शब्दों (जैसे, चंद, सूर, नाद, बिंदु, अमृत औंधा कुआँ) को लेकर अद्भुत रूपक बाँधे हैं जो सामान्य जनता की बुद्धि पर पूरा आतंक जमाते हैं।

वैष्णव संप्रदाय से उन्होंने अहिंसा का तत्त्व ग्रहण किया जो कि पीछे होने वाले फकीरों को भी को भी मान्य हुआ।

ज्ञानमार्ग की बातें कबीर ने हिंदू साधु-संन्यासियों से ग्रहण की जिनमें सूफियों के सत्संग से उन्होंने ‘प्रेमतत्त्व’ का मिश्रण किया और अपना एक अलग पंथ चलाया।

 यद्यपि वे पढ़े-लिखे न थे पर उनकी प्रतिभा बड़ी प्रखर थी जिससे उनके मुँह से बड़ी चुटीली और व्यंग्य-चमत्कारपूर्ण बातें निकलती थीं। इनकी उक्तियों में विरोध और असंभव का चमत्कार लोगों को बहुत आकर्षित करता था।

 कबीर की बानी में स्थान-स्थान पर भावात्मक रहस्यवाद की जो झलक मिलती है, वह सूफियों के सत्संग का प्रसाद है। कहीं इन्होंने ब्रह्म को खसम या पति मानकर अन्योक्ति बाँधी है और कहीं स्वामी या मालिक।

अनेक प्रकार के रूपकों और अन्योक्तियों द्वारा ही इन्होंने ज्ञान की बातें कही हैं जो नयी न होने पर भी वाग्वैचित्र्य के कारण अनपढ़ लोगों को चकित किया करती थीं।

कबीर की वाणी का संग्रह उनके शिष्य धर्मदास ने संवत् 1521 (1464 ई०) में किया था जब उनके गुरु की अवस्था 64 वर्ष की थी।

 कबीर की वचनावली की सबसे प्राचीन प्रति, जिसका अब पता लगा है, संवत् 1561 में लिखी है। कबीर की वाणी का संग्रह ‘बीजक’ के नाम से प्रसिद्ध है, जिसके तीन भाग किये गये हैं- रमैनी, सबद और साखी

कबीर की सांप्रदायिक शिक्षा और सिद्धांत के उपदेश मुख्यतः ‘साखी’ के भीतर हैं जो दोहों में हैं। इसकी भाषा सधुक्कड़ी अर्थात् राजस्थानी, पंजाबी मिली खड़ी बोली है, पर ‘रमैनी’ और ‘सबद’ में गाने के पद हैं जिनमें काव्य की ब्रजभाषा और कहीं-कहीं पूरबी बोली का भी व्यवहार है।

भाषा बहुत परिष्कृत और परिमार्जित न होने पर भी कबीर की उक्तियों में कहीं- कहीं विलक्षण प्रभाव और चमत्कार है। प्रतिभा उनमें बड़ी प्रखर थी इसमें संदेश नहीं।

रैदास या रविदास

रामानंदजी के बारह शिष्यों में एक रैदास कबीर की भाँति काशी निवासी थे।

रैदास का नाम धन्ना और मीरा ने बड़े आदर के साथ लिया है।

 रैदास की भक्ति भी निर्गुण ढाँचे की जान पड़ती है। कहीं तो वे अपने भगवान् को सब में व्यापक देखते हैं-

थावर जंगम कीट पतंगा पूरि रह्यो हरिराई।

और कहीं कबीर की तरह परात्पर (सर्वश्रेष्ठ या सर्वोपरि) की ओर संकेत करके कहते हैं-

गुन निर्गुन कहियत नहिं जाके।

रैदास का कोई ग्रंथ नहीं मिलता, फुटकल पद ही ‘बानी’ के नाम से, ‘संतबानी सीरीज’ में संगृहीत है । चालीस पद ‘आदि गुरुग्रंथ साहब’ में दिए गए हैं ।

धर्मदास

बाल्यावस्था में ही इनके हृदय में भक्ति का अंकुर था और ये साधुओं का सत्संग, दर्शन, पूजा, तीर्थाटन आदि किया करते थे।

कबीर के मुख से मूर्तिपूजा, तीर्थाटन, देवार्चन आदि का खंडन सुनकर इनका झुकाव ‘निर्गुण’ संतमत की ओर हुआ। अंत में ये कबीर से सत्य नाम की दीक्षा लेकर उनके प्रधान शिष्यों में हो गये।

कबीरदास के शिष्य होने पर इन्होंने अपनी सारी संपत्ति, जो बहुत अधिक थी, लुटा दी। ये कबीरदास की गद्दी पर 20 वर्ष के लगभग रहे।

धर्मदास की शब्दावली का भी संतों में बड़ा आदर है।

धर्मदास की रचना थोड़ी होने पर भी कबीर की अपेक्षा अधिक सरल भाव लिये हुए है, उसमें कठोरता और कर्कशता नहीं है। इन्होंने पूरबी भाषा का ही व्यवहार किया है।

इनकी (धर्मदास) अन्योक्तियों के व्यंजक चित्र अधिक मार्मिक हैं क्योंकि इन्होंने खंडन-मंडन से विशेष प्रयोजन न रख प्रेमतत्त्व को लेकर अपनी वाणी का प्रसार किया है।

गुरुनानक

गुरुनानक का जन्म संवत् 1526 कार्तिकी पूर्णिमा के दिन  तिलवंडी ग्राम -जिला लाहौर में हुआ।

इनके पिता (कालूचंद खत्री) ने इन्हें व्यवसाय में लगाने का बहुत उद्योग किया, पर ये सांसारिक व्यवहारों में दतचित्त न हुए।

एक बार इनके पिता ने इन्हें व्यवसाय के लिए कुछ धन दिया जिसको इन्होंने साधुओं और गरीबों में बाँट दिया।

इनकी माता का नाम तृप्ता था।

गुरुनानक आरंभ से ही भक्त थे। अतः उनका ऐसे मत की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था, जिसकी उपासना का स्वरूप हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को समान रूप से ग्राह्य हो। ये बाल्यावस्था से ही साधु स्वभाव के थे।

कबीरदास की निर्गुण उपासना का प्रचार उन्होंने पंजाब से आरंभ किया और वे सिख संप्रदाय के आदिगुरु हुए।

कबीरदास के समान गुरुनानक भी कुछ विशेष पढ़े-लिखे न थे। भक्तिभाव से पूर्ण होकर वे जो भजन गाया करते थे उनका संग्रह (संवत् 1661) ग्रंथ साहब में किया गया है।

भक्त या विनय के सीधे-सादे भाव सीधी-सादी भाषा में कहे गये हैं, कबीर के समान अशिक्षितों पर प्रभाव डालने के लिए टेढ़े-मेढ़े रूपकों में नहीं।

इससे इनकी प्रकृति की सरलता और अहंभावशून्यता का परिचय मिलता है।

दादूदयाल

यद्यपि सिद्धान्त की दृष्टि से दादू कबीर के मार्ग के ही अनुयायी हैं, पर उन्होंने अपना एक अलग पंथ चलाया, जो दादूपंथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कबीर का इनकी बानी में बहुत जगह नाम आया है और इसमें कोई संदेह नहीं कि ये उन्हीं के मतानुयायी थे।

दादू की बानी अधिकतर कबीर की साखी से मिलते-जुलते दोहों में है, कहीं-कहीं गाने के पद भी हैं। भाषा मिली-जुली पश्चिमी हिंदी है जिसमें राजस्थानी का मेल भी है।

इन्होंने कुछ पद गुजराती, राजस्थानी और पंजाबी में भी कहे हैं। कबीर के समान पूरबी हिंदी का व्यवहार इन्होंने नहीं किया है।

इनकी रचना में अरबी-फारसी के शब्द अधिक आये हैं और प्रेमतत्त्व की व्यंजना

अधिक है। घर के भीतर के रहस्यप्रदर्शन की प्रवृत्ति इनमें बहुत कम है।

 दादू की बानी में यद्यपि उक्तियों का वह चमत्कार नहीं है जो कबीर की बानी में मिलता है, पर प्रेमभाव का निरूपण अधिक सरस और गम्भीर है।

कबीर के समान खंडन और वाद-विवाद में इन्हें (दादू) रुचि नहीं थी। इनकी बानी में भी वे ही प्रसंग हैं, जो निर्गुणमार्गियों की बानियों में साधारणतया आया करते हैं; जैसे-ईश्वर की व्यापकता, सतगुरु की महिमा, जाति-पाँति का निराकरण, हिंदू- मुसलमानों का अभेद, संसार की अनित्यता, आत्मबोध इत्यादि ।

सुंदरदास

इनका डीलडौल बहुत अच्छा, रंग गोरा और रूप बहुत सुंदर था। स्वभाव अत्यंत कोमल और मृदुल था। ये बालब्रह्मचारी थे और स्त्री की चर्चा से सदा दूर रहते थे।

 निर्गुणपंथियों में यही एक ऐसे व्यक्ति हुए हैं, जिन्हें समुचित शिक्षा मिली थी और जो काव्यकला की रीति आदि से अच्छी तरह परिचित थे। अत: इनकी रचना साहित्यिक और सरस है।

सुंदरदास की भाषा भी काव्य की मँजी हुई ब्रजभाषा है।

भक्ति और ज्ञानचर्चा के अतिरिक्त नीति और देशाचार आदि पर भी सुंदरदास ने बड़े सुंदर पद कहे हैं।

और संतों ने केवल गाने के पद और दोहे कहे हैं, पर इन्होंने सिद्धहस्त कवियों के समान बहुत-से कवित्त, सवैये रचे हैं।

यों तो छोटे-मोटे इनके अनेक ग्रंथ हैं पर सुन्दरविलास सबसे अधिक प्रसिद्ध है, जिसमें कवित्त, सवैये ही अधिक हैं। इन कवित्त सवैयों में-यमक, अनुप्रास और अर्थालंकार आदि की योजना बराबर मिलती है।

इनकी रचना काव्यपद्धति के अनुसार होने के कारण और संतों की रचना से भिन दिखाई पड़ती है।

संत तो ये थे ही पर कवि भी थे। इससे समाज की रीति-नीति पर इनकी (सुंदरदास) की बड़ी विनोदपूर्ण उक्तियाँ हैं, जैसे गुजरात पर ‘आभड़छीत अतीत सों होत बिलार और कूकर चाटत हाँडी’, मारवाड़ पर ‘वृच्छ न नीरन उत्तम चीर सुदेसन में गत देस है ‘मारू”, दक्षिण पर ‘राँधत प्याज, बिगारत नाज, न आवत लाज, करै सब भच्छन’; पूरब देश पर ‘ब्राह्मन, क्षत्रिय, वैसरु सूदर चारोड़ बर्न के मच्छ बघारत’।

व्यर्थ की तुकबंदी और ऊटपटाँग बानी इनको रुचिकर न थी।

सुशिक्षा द्वारा विस्तृत दृष्टि प्राप्त होने से इन्होंने और निर्गुणवादियों के समान लोकधर्म की उपेक्षा नहीं की है।

पतिव्रत का पालन करने वाली स्त्रियों, रणक्षेत्र में कठिन कर्तव्य का पालन करने वाले शूरवीरों आदि के प्रति इनके विशाल हृदय में सम्मान के लिए पूरी जगह थी।

इन्होंने जो सृष्टि तत्त्व आदि कहे हैं वे भी औरों के समान मनमाने और ऊटपटाँग नहीं हैं, शास्त्र के अनुकूल हैं।

मलूकदास

आलसियों का यह मूल मंत्र मलूकदास का है-

अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।

दास मलूका कहि गए, सबको दाता राम ॥

इनकी दो पुस्तकें प्रसिद्ध हैं – रत्नखान और ज्ञानबोध ।

 हिंदुओं और मुसलमानों दोनों को उपदेश देने में प्रवृत्त होने के कारण दूसरे निर्गुणमार्गी संतों के समान इनकी भाषा में भी फारसी और अरबी शब्दों का प्रयोग है।

बोलचाल की खड़ी बोली का पुट इन सब संतों की बानी में एक-सा पाया जाता है।

इन सब लक्षणों के होते हुए भी इनकी भाषा सुव्यवस्थित और सुंदर है। कहीं-कहीं अच्छे कवियों का-सा पदविन्यास और कवित्त आदि छंद भी पाये जाते हैं।

 मलूकदास औरंगजेब के समय में दिल के अंदर खोजनेवाले निर्गुण मत के नामी संतों में हुए। इनकी गद्दियाँ, कड़ा, जयपुर, गुजरात, मुलतान, पटना, नेपाल, काबुल तक कायम में हुईं।

अक्षर अनन्य

प्रसिद्ध छत्रसाल इनके शिष्य हुए।

 ये विद्वान् थे और वेदांत के अच्छे ज्ञाता थे। इन्होंने योग और वेदांत पर कई ग्रंथ- राजयोग, विज्ञानयोग, ध्यानयोग, सिद्धांतबोध, विवेकदीपिका, ब्रह्मज्ञान, अनन्य प्रकाश आदि लिखे और दुर्गा सप्तशती का भी हिंदी पद्यों में अनुवाद किया।

जगजीवनदास

दादूदयाल की शिष्य-परंपरा में जगजीवनदास जगजीवन साहब हुए जो संवत् 1818 के लगभग वर्तमान थे।

चंदेल ठाकुर और कोटवा (बाराबंकी) के निवासी जगजीवनदास ने अपना एक अलग सत्यनामी संप्रदाय चलाया।

इनकी वाणी में साधारण ज्ञान की चर्चा है। इनके शिष्य दूलमदास हुए जिन्होंने एक शब्दावली लिखी। उनके शिष्य तोंवरदास और पहलवान दास हुए।

प्रयाग के वेलवेडियर प्रेस ने इस प्रकार के बहुत से संतों की बानियाँ प्रकाशित ।

निगुर्णणपंथ में तत्त्व निम्नांकित से लिये गये हैं-

  • 1. ज्ञानपक्ष-वेदांत से
  • 2. प्रेमतत्त्व-सूफियों से
  • 3. अहिंसा और प्रपत्ति-वैष्णवों से
  •  4. सुरति, निरति- बौद्ध सिद्धों से

निष्कर्ष

santon के अनुसार ईश्वर सगुण नहीं है, वह निर्गुण और निराकार है । वह गुणातीत है, अजन्मा है और निरंजन है ।

संतों ने बहुदेववाद एवं अवतारवाद का विरोध किया ।

संतों का विश्वास है कि राम की तभी कृपा होती है जब गुरु की कृपा होती है । उनके अनुसार गुरु का भी सतगुरु होना अनिवार्य है ।

सन्त जाति-पाति का बहिष्कार करते हैं । संतों की दृष्टि में भगवान की भक्ति में सबको समान अधिकार है ।

सन्त कवियों ने तत्कालीन समाज में व्याप्त कुप्रवृत्तियों का कड़ा व विरोध किया ।

संतों ने मूर्ति-पूजा, तीर्थ, व्रत, पूजन, नमाज, हज, धर्म के नाम पर की जाने वाली हिंसा आदि कर्मकांडों का विरोध किया ।

सन्त काव्य में सर्वत्र ही रहस्यभावना विद्यमान है । सन्त काव्य में रहस्यवाद दो रूपों में विद्यमान है – भावनात्मक रहस्यवाद और साधनात्मक रहस्यवाद ।

संतों ने ज्ञान को महत्व दिया था अतः वे ईश्वर प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम अहम का विसर्जन आवश्यक मानते हैं ।। उनके अनुसार ज्ञान के माध्यम से यह संभव है ।

संतों के अनुसार साधक को ईश्वर से दूर करने वाली माया है । अतः वे साधक को माया से दूर रहने के लिए कहते हैं ।

संतों ने नाम स्मरण और भजन पर बल दिया है ।

सन्तकाव्य में सर्वत्र लोकमंगल की भावना मिलती है ।

निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि संतों ने निर्गुण ब्रह्म को आधार बनाकर समाज में फैले छुआछूत, भेदभाव, बाह्य आडंबरों का विरोध कर समाज में प्रेम, करुणा और मानवता का पाठ पढ़ाया ।

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