रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ | Ritikal ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen
Ritikal ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen, रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ, Ritikal ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen
Ritikal ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen, रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ, Ritikal ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen
हिंदी साहित्य के इतिहास में मध्यकाल को पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल के रूप में विभाजित किया गया है। आचार्य शुक्ल ने पूर्व मध्यकाल को ‘भक्तिकाल’ की संज्ञा दी है और उत्तर मध्यकाल को ‘रीतिकाल’ की। निश्चय ही ‘रीतिकाल’ नामकरण इस बात का संकेत देता है कि इस दौर में रीति-निरूपण की प्रधानता थी। आचार्य शुक्ल ने इसके लिए संवत् 1700 से संवत् 1900 तक के कालखंड का निर्धारण किया है, लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इसे संशोधित करते हुए 17वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी के मध्य तक की काल सीमा रीतिकाल के लिए निर्धारित करते हैं। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे ‘श्रृंगार काल’ की संज्ञा दी है और आचार्य शुक्ल को भी इस नाम में आपत्ति नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि इस दौर में रीति-निरूपण के अलावा श्रृंगारिकता की प्रवृत्ति प्रधान थी। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि इस दौर में अन्य प्रवृत्तियाँ मिलती ही … Read more