‘अंधेर नगरी’ के नामकरण की सार्थकता | andher nagari ke namkaran ki sarthakta

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andher nagari ke namkaran ki sarthakta

‘अंधेर नगरी, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अत्यंत प्रसिद्ध प्रहसन है, जो 1881 ई. में प्रकाशित हुआ था । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने प्रहसन ‘अंधेर नगरी’ को परम्परा से चली आ रही लोकोक्ति ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा’ पर आधारित किया है जिसमें बिहार के किसी मूर्ख और अत्याचारी शासक को आधार बनाकर उसके कुकर्मों को प्रकट किया है। तो आइये अब हम andher nagari ke namkaran ki sarthakta पर विचार करें । एक सामान्य सी लोकोक्ति के माध्यम से लेखक ने तत्कालीन शासन व्यवस्था के दोषों, शोषण, स्वार्थपरता आदि को एक साथ प्रकट करके अपने कौशल को प्रकट कर दिया है। सामान्य रूप से किसी वस्तु को पहचानने के लिए उसे कोई-न-कोई नाम अवश्य दिया जाता है, जिससे उसकी विशिष्टता बनी रहे। साहित्यिक क्षेत्र में भी रचना का नाम, उसकी अलग पहचान बनाये रखने के लिए आवश्यक होता है। नाटक के क्षेत्र में नामकरण का बहुत … Read more

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