प्राच्यवाद क्या है | prachyavad kya hai

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prachyavad kya hai

प्राच्यवाद को अंग्रेजी में ओरियेंटलिज्म कहा जाता है ।  ‘प्राच्यवाद’ का अभिप्राय है पूरब के बारे में पश्चिम का दृष्टिकोण। जो पश्चिम है वह पूरब नहीं है, वह इतर है, दी ‘अदर’ है। सामान्यतः यूरोप को पश्चिम और एशिया को पूरब मान लिया गया है।

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अतियथार्थवाद क्या है | Ati Yatharthavad Kya Hai | अतियथार्थवाद | Surrealism | Surrealism kya hai

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Ati Yatharthavad Kya Hai

‘अतियथार्थवाद’ अंग्रेजी के सरियलिज़्म (Surrealism) का हिंदी पर्याय है। साहित्य और कला के क्षेत्र का यह एक ऐसा आंदोलन है जिसका जन्म प्रथम विश्वयुद्धोत्तर फ्रांस में हुआ। नाम से यथार्थवाद के चरम रूप का भ्रम पैदा करने वाला यह ‘वाद’ यथार्थवाद से पूर्णतः भिन्न है और एक तरह से स्वच्छंदतावाद की ही अंतिम परिणति है।       यथार्थवाद मूल्य-निरपेक्ष भाव से यथार्थ के चित्रण को ही साहित्य तथा कला का लक्ष्य मानता है। उसके मत में यह यथार्थ कितना ही विकृत या कुरूप हो, उसे प्रस्तुत करने से हिचकना नहीं चाहिए। इसी भावना का एक दिशा में विकास बीसवीं सदी के तीसरे दशक के प्रारंभ में ‘दादावाद’ के रूप में हुआ और यही आगे चलकर ‘अतियथार्थवाद’ में परिणत हुआ।   अतियथार्थवाद में बाह्य यथार्थ से भी अधिक बल मानव के अवचेतन (subconscious mind) में छिपे हुए यथार्थ को दिया गया है क्योंकि इनके अनुसार यही वास्तविक तथा विस्तृत सच्चाई … Read more

मार्क्सवादी साहित्य और कला-चिन्तन | Marxvadi Sahitya aur Kala Chintan | Marxvadi Sahitya Chintan

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Marxvadi Sahitya aur Kala Chintan

मार्क्सवादी कला और साहित्य-चिन्तन मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित है। इसके दो प्रमुख आधार हैं- एक द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और दूसरा ऐतिहासिक भौतिकवाद।   द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद एक विकास का सिद्धान्त है जो क्रिया, प्रतिक्रिया और समन्वय के द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसका संबंध प्रकृति और जगत के नियमों की व्याख्या से है ।  ऐतिहासिक भौतिकवाद मनुष्य के सम्पूर्ण इतिहास की व्याख्या है । मानव-समुदाय का मूल प्रयत्न आर्थिक या उत्पादन-परक है। इसी के लिए वह श्रम का आधार ग्रहण करता है। इन्हीं तत्त्वों के आधार को ग्रहण कर कला और साहित्य का निर्माण होता है। अतः कला और साहित्य भी मानव के व्यापक कार्यकलाप का अंग है। वह उसके श्रम को मधुर बनाता है और उत्पादन के उपरान्त प्राप्त सफलता के आधार पर आगे के निर्माण और विकास की कल्पना प्रदान करता है और उसका मार्ग प्रशस्त करता है।  इस प्रकार मार्क्सवाद साहित्य और कला के सम्बन्ध में एक … Read more

अभिजात्यवाद क्या है | आभिजात्यवाद क्या है | Abhijatyavad Kya Hai | Classicism Kya Hai

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abhijatyavad kya hai

हिंदी शब्द अभिजात्यवाद या आभिजात्यवाद अंग्रेजी शब्द क्लासिसिज्म [CLASSICISM] का पर्याय है। हिंदी में आभिजात्यवाद के अतिरिक्त शास्त्रवाद या श्रेण्यवाद आदि कई नाम इसके लिए प्रस्तावित किए गए हैं।   आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ने उसके लिए हिंदी  में ‘श्रेण्यवाद‘ शब्द प्रस्तावित किया किन्तु यह  शब्द प्रचलन में नहीं आ सका।   आभिजात्यवाद या क्लासिसिज्म की परिभाषा और व्याख्या समय-समय पर अनेक प्रकार से की गई है। वस्तुतः लैटिन शब्द ‘क्लासिक‘ का प्रयोग रोम के करदाताओं के सर्वोच्च वर्ग के लिए किया जाता था। बाद में सामान्य जनता से भिन्न अभिजात वर्ग या श्रेष्ठ वर्ग के साहित्य के लिए किया जाने लगा। परिणामतः क्लासिसिज्म (आभिजात्यवाद), क्लासिक (अभिजात) और क्लासिकल (अभिजात्य) ये तीनों शब्द सर्वश्रेष्ठ के लिए वाचक हो गए। ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में ‘क्लासिक‘ का अर्थ अभिजात लेखक समझा जाता था, जो अल्पसंख्यक अभिजात (उच्च वर्ग) के लिए लिखता है।  कुछ समय बाद वह कृति क्लासिक कहलाने की अधिकारिणी मानी जाने लगी जिसमें … Read more

प्रतीक | प्रतीक क्या है | Pratik | Pratik Kya hai

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Pratik Kya hai

प्रतीक किसी वस्तु विशेष या भाव समूहों का एक ऐसा संकेत है जो अगोचर एवं अतीन्द्रिय है, जिसका संपूर्ण रूप में मस्तिष्क में अनुभव किया जा सकता है। अर्थात प्रतीक ऐसा शब्द चिह्न है जो किसी वस्तु का बोध कराता है। वस्तुतः प्रतीक किसी सूक्ष्म भाव, विचार या अगोचर तत्व को साकार करने के लिए प्रयुक्त होता है। उदाहरण के लिए, किसी देश का ध्वज उस देश की राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने के कारण राष्ट्र के सम्मान एवं गौरव का प्रतीक होता है। प्रतीक शब्द रूप में किसी अन्य अर्थ की व्यंजना करता है, यथा : काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी। इस पंक्ति में ‘नलिनी‘ जीवात्मा का प्रतीक है। स्पष्ट ही ‘नलिनी‘ का शब्दार्थ न लेकर यहां प्रतीकार्थ ग्रहण किया गया है। काव्य या साहित्य में प्रतीकों का प्रयोग प्रारम्भ से होता रहा है। हिन्दी में सिद्ध साहित्य एवं कबीर आदि कवियों की रचनाओं में प्रतीकों का प्रचुरता से … Read more

साहित्य का उद्देश्य | Sahitya ka Uddeshya | Sahitya ka Prayojan | साहित्य का प्रयोजन

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Sahitya ka Uddeshya

साहित्य शब्द और अर्थ के समन्वित सौंदर्य से निर्मित ऐसी लोकमंगलकारी रचना है जो रचनाकार के भावों, विचारों और आदर्शों को पाठक या समाज तक सम्प्रेषित करती है।  विद्वानों के अनुसार ‘साहित्य’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है = सहित + यत् प्रत्यय । अर्थात साहित्य का अर्थ है – साथ होने का भाव या सहभाव । इसका अर्थ यह कि जहाँ शब्द और अर्थ एक साथ आते हैं,वही साहित्य है। इसमें कल्याण का भाव समाहित होता है। कल्याण के इसी भाव को लक्षित करके आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा- “निखिल विश्व के साथ एकत्व की साधना ही साहित्य है”। स्पष्ट है कि साहित्य हमारी संवेदना के तारों को झकझोरता हुआ हमें संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है ताकि हम समूचे विश्व के साथ एकत्व को महसूस करते हुए वैश्विक संवेदना के साथ जुड़ाव विकसित कर सकें। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ की भूमिका … Read more

यथार्थवाद क्या है | Yatharthvad Kya Hai| Realism Kya Hai

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Yatharthvad Kya Hai

हिंदी में यथार्थवाद अंग्रेजी के रियलिज्म (Realism) के अनुवाद के रूप में प्रयुक्त होता है । यथार्थ का अर्थ है यथा + अर्थ यानी जैसा है वैसा अर्थ। किंतु इसका पारिभाषिक अर्थ समझने के लिए इतिहास और दर्शन के क्षेत्र में जाना पड़ेगा । यथार्थवाद मूलतः दर्शन के क्षेत्र का शब्द है, जहाँ  से साहित्य व कला के क्षेत्र में ले लिया गया है । इस शब्द को दर्शनशास्त्र के सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करने वाले प्रथम दार्शनिक प्लेटो थे ।      कला और साहित्य के क्षेत्र में ‘यथार्थवाद’  एक आंदोलन के रूप में 19 वीं सदी में फ्रांस में उभरा । 1826 में मर्क्यू फ्रांसे ने ‘यथार्थवाद’ की परिभाषा अपने निबंध में की । तदुपरांत 1855 में फ्रांस के प्रसिद्ध चित्रकार कूर्वे ने अपने चित्रों में यथातथ्य शैली का व्यवहार किया तथा अपनी चित्र प्रदर्शनी के प्रवेश द्वार पर ‘यथार्थवाद’  शब्द अंकित किया । चित्रकला में यथार्थवाद के अभ्युदय … Read more

फैन्टेसी क्या है | Fantasy Kya Hai

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Fantasy Kya Hai

आधुनिक काव्य-चिन्तन में कल्पना के साथ ‘फैन्टेसी’ की चर्चा भी बराबर होती है। इसका कारण यह है कि ‘फैन्टेसी’ भी एक प्रकार की कल्पना ही है। प्लेटो ने कल्पना के लिए ‘फैन्टेसिया’ शब्द प्रयोग किया था जिसका आधार ‘असत्य’ या ‘मिथ्या’ होता है।  अतः ‘फैन्टेसी’  शब्द का निर्माण यूनानी शब्द ‘फैन्टेसिया’ से हुआ है जिसका अर्थ है “मनुष्य की वह क्षमता जो सम्भाव्य संसार की सर्जना करती है।” मानविकी कोश में फैन्टेसी को स्वप्न चित्र मूलक साहित्य कहा गया है जिसमें असम्भाव्य सम्भावनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। फैन्टेसी कल्पना पर आधारित होती है जिसे दिवास्वप्नात्मक (daydreaming) अथवा दुःस्वप्नात्मक (nightmare) मानसिक बिम्ब (image) कहा जा सकता है। यह एक प्रकार की साहित्यिक तकनीक है जिसका सम्बन्ध मनुष्य के स्वप्न और अवचेतन (subconscious mind) में घटित होने वाली घटनाओं की ऐसी बिम्बावलियों (images) से है जो विघटित एवं बेतरतीब होती हैं। फैन्टेसी का प्रयोजन फैन्टेसी के तीन प्रयोजन (purpose) हैं-  1. … Read more

अस्तित्ववाद क्या है | Astitvavad kya hai

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Astitvavad kya hai

अस्तित्ववाद मूल रूप से दर्शन के क्षेत्र का शब्द है । यह अंग्रेजी के एक्जिस्टेंशियलिज़्म (Existentialism) का हिंदी पर्याय हैअस्तित्ववाद का उन्मेष प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में हुआ।  तदुपरांत उसने फ्रांस और इटली होते हुए एशिया के देशों में भी अपना प्रभाव डाला। इस सिद्धान्त ने साहित्य सृजन तथा आलोचना सिद्धान्त को गहराई से प्रभावित किया है । वर्तमान विश्व चिंताधारा निर्वैक्तिक विघटनकारी प्रवृत्तियों की ओर अधिक झुकी हुई है। व्यक्ति के विकास एवं निर्माण को समाज विभिन्न वर्जनाओं और निषेधों से अवरुद्ध करता है।धर्म और समाज की इन निषेधात्मक प्रवृत्तियों के विरोध में 19 वीं सदी में कुछ विद्वानों ने मनुष्य को उसके प्रकृत रूप में स्थापित एवं विकसित होने देने के लिए आवाज उठाई।      उन्होंने एक ऐसा दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो उन तमाम परंपरागत मतवादों का विरोध करता था जो मानवीय सत्ता  (Human Existence)  की उपेक्षा करके मात्र विचारों तथा नैतिक मूल्य एवं मान्यताओं की … Read more

साठोत्तरी हिंदी कविता की विशेषताएँ | Sathottari Hindi Kavita Ki Visheshtaen

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Sathottari Hindi Kavita Ki Visheshtaen

1960 के बाद लिखी गई कविता साठोत्तरी कविता के नाम से जानी जाती है। साठोत्तरी कविता ‘नई कविता’ का न तो विकास है और न उसका विकसित रूप। साठोत्तरी कविता एक अलग किस्म की कविता है, जिसका अपना कथ्य और अपना शिल्य है। इसका स्वरूप नई कविता से सर्वथा पृथक् है। वस्तुतः, साठोत्तरी कविता का अपना अलग अस्तित्व और चेहरा है। डॉ. लक्ष्मीकांत वर्मा लिखते हैं कि “साठोत्तरी पीढ़ी स्वप्न भंग की स्थिति में जन्मी और अपराजेय विवशता के बीच बढ़ी है, पनपी है। नई कविता की पीढ़ी से यह अनेक अर्थों में भिन्न है।” छठे दशक के आसपास कविता की धारा अपने पूर्ववर्ती नई कविता से अलग कुछ नवीन ढर्रे की ओर उन्मुख और नई करवट लेती हुई दिखाई देती है। धूमिल, लीलाधर जगूड़ी, चंद्रकांत देवताले, केदार नाथ सिंह, प्रणब कुमार वंदोपाध्याय, डॉ. विनय, विजयेन्द्र सरीखे अनेक कवियों ने परंपरागत मूल्यों, नैतिक प्रतिमानों को दरकिनार करते हुए धर्म, समाज, … Read more

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