जनवादी कविता की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ | Janvadi Kavita ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen

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Janvadi Kavita ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen

जनवादी कविता से आशय एक विशेष दौर की कविताओं से है जिनमें जनता के प्रति प्रतिबद्धता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। जनता के प्रति यही प्रतिबद्धता जनवादी कविता को क्रांतिधर्मी चेतना से लैस करती है। इस विशेष दौर की कविता का नामकरण चीन की जनवादी क्रांति की प्रेरणा पर की गई क्योंकि माओवादी विचारधारा इस काव्यांदोलन के वैचारिक आधार को निर्मित करती है। यह प्रगतिवादी काव्यांदोलन की तार्किक परिणति है, फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ पर वैचारिक प्रतिबद्धता का आग्रह नहीं है। आज हम Janvadi Kavita ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen को विस्तार से समझने और उसका विश्लेषण करने का प्रयास करेंगे ।

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आलोचना के प्रकार |alochana ke prakar |आलोचना के भेद | alochana ke bhed

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alochana ke prakar

किसी साहित्यिक रचना की सम्यक् परीक्षा करना, उसके गुण-दोषों का उद्घाटन करना आलोचना है । आज हम alochana ke prakar या alochana ke bhed को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे।

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मलिक मुहम्मद जायसी का रहस्यवाद | malik muhammad jayasi ka rahasyavad

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malik muhammad jayasi ka rahasyawad

malik muhammad jayasi ka rahasyawad athwa malik muhammad jayasi ke kavya men rahasyawad

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कबीर का काव्यशिल्प |kabir ka kavyashilp| kabir ki kavyakala

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kabir ka kavyashilp

कबीर भक्तिकाल की निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्तर्गत संत-काव्य धारा के प्रमुख और प्रतिनिधि कवि हैं। आज हम Kabir ka kavyashilp अथवा Kabir ki kavyakala इस लेख के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे ।

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प्राच्यवाद क्या है | prachyavad kya hai

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prachyavad kya hai

प्राच्यवाद को अंग्रेजी में ओरियेंटलिज्म कहा जाता है ।  ‘प्राच्यवाद’ का अभिप्राय है पूरब के बारे में पश्चिम का दृष्टिकोण। जो पश्चिम है वह पूरब नहीं है, वह इतर है, दी ‘अदर’ है। सामान्यतः यूरोप को पश्चिम और एशिया को पूरब मान लिया गया है।

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रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ | Ritikal ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen

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रीतिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ और विशेषताएँ | Ritikal ki Pramukh Pravrittiyan aur Visheshtaen

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रीतिकालीन कवियों का आचार्यत्व | Ritikalin kaviyon ka acharyatva

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ritikalin kaviyon ka acharyatva

हिंदी साहित्य के इतिहास में मध्यकाल को पूर्व मध्यकाल और उत्तर मध्यकाल के रूप में विभाजित किया गया है। आचार्य शुक्ल ने पूर्व मध्यकाल को ‘भक्तिकाल’ की संज्ञा दी है और उत्तर मध्यकाल को ‘रीतिकाल’ की। निश्चय ही ‘रीतिकाल’ नामकरण इस बात का संकेत देता है कि इस दौर में रीति-निरूपण की प्रधानता थी। आचार्य शुक्ल ने इसके लिए संवत् 1700 से संवत् 1900 तक के कालखंड का निर्धारण किया है, लेकिन आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इसे संशोधित करते हुए 17वीं शताब्दी से 19वीं शताब्दी के मध्य तक की काल सीमा रीतिकाल के लिए निर्धारित करते हैं। विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे ‘श्रृंगार काल’ की संज्ञा दी है और आचार्य शुक्ल को भी इस नाम में आपत्ति नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि इस दौर में रीति-निरूपण के अलावा श्रृंगारिकता की प्रवृत्ति प्रधान थी। लेकिन, इसका मतलब यह नहीं कि इस दौर में अन्य प्रवृत्तियाँ मिलती ही … Read more

महादेवी वर्मा की काव्यगत विशेषताएँ | Mahadevi Verma ki Kavyagat Visheshtaen

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mahadevi verma ki kavyagat visheshtaen

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कबीर के साखियों की व्याख्या | Kabir ke Sakhiyon ki Vyakhya

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Kabir ke Sakhiyon ki Vyakhya

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राग दरबारी उपन्यास की भाषा-शैली | rag darbari upanyas ki bhasha-shaili

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rag darbari upanyas ki bhasha shaili

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शैली विज्ञान | Shaili Vigyan | Pashchatya Kavya Shastra

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shaili vigyan

‘शैली’ मूल लातानी (लैटिन) शब्द ‘स्तिलुस’ (stylus) से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है ‘कलम’। उसी के अर्थ का विस्तार हुआ है – कलम की प्रयोग विधि, लेखन की विधि, अभिव्यक्ति की विधि । तो आइए अब विस्तार से shaili vigyan को समझने का प्रयास करते हैं । काव्यशास्त्र के विद्वान्, रस मर्मज्ञ डॉ. नगेन्द्र के अनुसार, ‘शील’ शब्द में ‘अण् प्रत्यय के योग से शैली शब्द बना है। अतः शैली के मूल में शील’ शब्द है। शील का अर्थ है स्वभाव । जब साहित्य का भाषा-वैज्ञानिक अध्ययन साहित्य के कलात्मक मर्म (गूढ़ अर्थ, स्वरूप) को समझने तथा उसके भाषिक सौन्दर्य का अनुसंधान करने के लिए किया जाता है तब वह शैली-वैज्ञानिक अध्ययन बन जाता है । शैली-विज्ञान का संबंध एक ओर साहित्यशास्त्र से है और दूसरी ओर भाषा-विज्ञान से । डॉ. भोला नाथ तिवारी के विचार से, “शैली के वैज्ञानिक अध्ययन को शैली विज्ञान कहते हैं।”  चेस्टरफील्ड का कथन है … Read more

आई ए रिचर्ड्स का संप्रेषण सिद्धान्त | I A Richards ka Sampreshan Siddhant

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I A Richards ka Sampreshan Siddhant

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‘अंधेर नगरी’ के नामकरण की सार्थकता | andher nagari ke namkaran ki sarthakta

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andher nagari ke namkaran ki sarthakta

‘अंधेर नगरी, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अत्यंत प्रसिद्ध प्रहसन है, जो 1881 ई. में प्रकाशित हुआ था । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने अपने प्रहसन ‘अंधेर नगरी’ को परम्परा से चली आ रही लोकोक्ति ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा’ पर आधारित किया है जिसमें बिहार के किसी मूर्ख और अत्याचारी शासक को आधार बनाकर उसके कुकर्मों को प्रकट किया है। तो आइये अब हम andher nagari ke namkaran ki sarthakta पर विचार करें । एक सामान्य सी लोकोक्ति के माध्यम से लेखक ने तत्कालीन शासन व्यवस्था के दोषों, शोषण, स्वार्थपरता आदि को एक साथ प्रकट करके अपने कौशल को प्रकट कर दिया है। सामान्य रूप से किसी वस्तु को पहचानने के लिए उसे कोई-न-कोई नाम अवश्य दिया जाता है, जिससे उसकी विशिष्टता बनी रहे। साहित्यिक क्षेत्र में भी रचना का नाम, उसकी अलग पहचान बनाये रखने के लिए आवश्यक होता है। नाटक के क्षेत्र में नामकरण का बहुत … Read more

मैला आँचल की आँचलिकता | Maila Anchal Ki Anchalikta

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maila anchal ki anchalikta

फणीश्वरनाथ रेणु जन्म 4 मार्च, 1921 को औराही हिंगना नामक गाँव, जिला पूर्णिया (बिहार) में हुआ था ।  आपका देहावसान 11 अप्रैल, 1977 को हुआ । फणीश्वरनाथ रेणु की प्रमुख कृतियाँ संस्मरण : ऋणजल धनजल, वन तुलसी की गन्ध, समय की शिला पर, श्रुत-अश्रुत पूर्व रिपोतार्ज :  नेपाली क्रान्ति-कथा (रिपोर्ताज़); रेणु रचनावली (समग्र) मैला आँचल के प्रथम संस्करण की भूमिका 9 अगस्त, 1954 को मैला आँचल के प्रथम संस्करण की भूमिका के रूप में फणीश्वरनाथ रेणु जी ने लिखा है : “यह है मैला आँचल, एक आँचलिक उपन्यास। कथानक है पूर्णिया। पूर्णिया बिहार राज्य का एक जिला है; इसके एक ओर है नेपाल, दूसरी ओर पाकिस्तान और पश्चिम बंगाल । विभिन्न सीमा रेखाओं से इसकी बनावट मुकम्मल हो जाती है, जब हम दक्खिन में सन्थाल परगना और पच्छिम में मिथिला की सीमा रेखाएँ खींच देते हैं। मैंने इसके एक हिस्से के एक ही गाँव को पिछड़े गाँवों का प्रतीक मानकर-इस … Read more

आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की आलोचना पद्धति | Acharya Nanddulare Vajpeyi Ki Alochana Paddhati

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Acharya Nanddulare Vajpeyi Ki Alochana Paddhati

  अर्थात् उनके अनुसार ‘साहित्य’ की ‘स्वतंत्र सत्ता की स्वीकृति’ ही स्वच्छन्दतावाद का केंद्रीय तत्व है । आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी की प्रसिद्धि हिंदी में सौष्ठववादी आलोचक के रूप में है। सौष्ठववादी समीक्षा पद्धति में ‘काव्य के सौन्दर्योद्घाटन’ पर विशेष बल दिया जाता है, शास्त्रीय समीक्षा पर नहीं। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने ‘प्रसाद’, ‘निराला’ और ‘पन्त’ की समीक्षा स्वच्छन्दतावादी एवं सौन्दर्य-बोधक मूल्यों की दृष्टि से की और इन्हें ‘छायावाद’ की वृहतत्रयी के रूप में प्रतिष्ठित  किया । उनके अनुसार- “काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों से ऊपर उठकर सौन्दर्य का उद्घाटन करना ही आलोचक का प्रधान कार्य है।” आलोचक अपनी प्रतिभा से भावों के उदात्त स्वरूप एवं मार्मिकता का विश्लेषण कर स्वयं तो आनन्दित होता ही है, पाठक को भी इसी भावभूमि पर ले जाता है। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ‘छायावाद’ को प्रतिष्ठित करने वाले समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने छायावादी काव्य की विस्तृत समीक्षा करते हुए इस काव्यधारा को स्थापित करने … Read more

बिम्ब क्या है | Bimb Kya Hai

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Bimb Kya Hai

ये बिम्ब एक प्रकार से संचित अनुभूतियों के रूप में हमारे अवचेतन मन (subconscious mind) में सदा विद्यमान रहते हैं और समय-समय पर स्मृति एवं कल्पना की सहायता से पुनः हमारे चेतन स्तर पर उदित होकर हमें भाँति-भाँति के बोध प्रदान करते हैं। कवि या कलाकार इन्हीं बिम्बों को अपनी रचना में प्रस्तुत करता है, जिन्हें ग्रहण करते हुए पाठक या दर्शक सामाजिक विषय का बोध प्राप्त करते हैं।   दूसरे शब्दों में बिम्ब ऐंद्रिय अनुभूति (पाँच ज्ञानेंद्रिओं अर्थात् – आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा के माध्यम से ग्रहण की गई अनुभूति) का प्रतिबिंब है, जो कि मन में अंकित हो जाता है।   बिम्ब की परिभाषा साहित्यिक दृष्टि से बिम्ब की अनेक परिभाषाएँ की गयी है। सी० डी०लेविस महोदय ने बिम्ब के स्वरूप का सांगोपांग विवेचन करते हुए कहा है—“काव्यात्मक विम्ब शब्दों के माध्यम से निर्मित एक ऐसा चित्र है, जिसका किसी न किसी प्रकार केऐन्द्रिक गुण से सम्पर्क हो।” … Read more

मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि | Muktibodh Ki Alochana Drishti

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muktibodh ki alochana drishti

मुक्तिबोध, जिनका वास्तविक नाम गजानन माधव मुक्तिबोध था, एक प्रसिद्ध हिंदी कवि और आलोचक थे। उनकी आलोचना दृष्टि हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है, और उनके विचार आज भी प्रासंगिकहैं।  मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि मार्क्सवादी विचारों से प्रभावित थी। वे साहित्य को समाज के परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानते थे। उनका मानना था कि साहित्य समाज की सच्चाई को प्रकट करने का एक महत्वपूर्ण साधन है।    मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे साहित्य को केवल एक कला के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि एक सामाजिक और राजनीतिक हथियार के रूप में भी देखते थे। उनका मानना था कि साहित्य समाज को बदलने की शक्ति रखता है। मुक्तिबोध की आलोचना दृष्टि का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह था कि वे साहित्य को व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़ते थे। उनका मानना था कि साहित्य व्यक्तिगत अनुभवों को व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण … Read more

रूसी रूपवाद | rusi rupvad | रूपवाद | rupvad | pashchatya kavyashastra | Russian Formalism | Formalism

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rusi rupvad

पाश्चात्य काव्यशास्त्र के अंतर्गत आज हम rusi rupvad या rupvad को समझने का प्रयास करेंगे । इस सिद्धान्त को विस्तार से समझने के लिए आप नीचे का ये विडियो भी देख सकते हैं :  ‘रूपवाद’ का उद्भव रूस (Russia) में हुआ इसलिए इसे रूसी रूपवाद भी कहा जाता है। रूस में रूपवादी समीक्षा का सूत्रपात 19वीं शती के अन्तिम चरण में हुआ और 20वीं शती के अन्तिम वर्षों तक साहित्य समीक्षा को यह आन्दोलित करती रही। काव्य में वस्तु (Content) और रूप (Form) दोनों में किसे अधिक महत्त्व दिया जाय, यह प्रश्न नया नहीं है। भारतीय आचार्यों और पाश्चात्य काव्य-चिन्तकों, दोनों ने इस प्रश्न पर बहुत पहले विचार किया था। वस्तुतः कलावादी भी प्रकारान्तर से (दूसरी तरह से) रूपवाद के ही समर्थक रहे हैं। ‘रूपवाद’ पर विचार करने के लिए आवश्यक है कि हम काव्य में ‘वस्तु’ (Content) क्या है? और ‘रूप’ (Form) क्या है? इसे भली-भाँति समझ लें। सामान्यतः काव्य … Read more

अतियथार्थवाद क्या है | Ati Yatharthavad Kya Hai | अतियथार्थवाद | Surrealism | Surrealism kya hai

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Ati Yatharthavad Kya Hai

‘अतियथार्थवाद’ अंग्रेजी के सरियलिज़्म (Surrealism) का हिंदी पर्याय है। साहित्य और कला के क्षेत्र का यह एक ऐसा आंदोलन है जिसका जन्म प्रथम विश्वयुद्धोत्तर फ्रांस में हुआ। नाम से यथार्थवाद के चरम रूप का भ्रम पैदा करने वाला यह ‘वाद’ यथार्थवाद से पूर्णतः भिन्न है और एक तरह से स्वच्छंदतावाद की ही अंतिम परिणति है।       यथार्थवाद मूल्य-निरपेक्ष भाव से यथार्थ के चित्रण को ही साहित्य तथा कला का लक्ष्य मानता है। उसके मत में यह यथार्थ कितना ही विकृत या कुरूप हो, उसे प्रस्तुत करने से हिचकना नहीं चाहिए। इसी भावना का एक दिशा में विकास बीसवीं सदी के तीसरे दशक के प्रारंभ में ‘दादावाद’ के रूप में हुआ और यही आगे चलकर ‘अतियथार्थवाद’ में परिणत हुआ।   अतियथार्थवाद में बाह्य यथार्थ से भी अधिक बल मानव के अवचेतन (subconscious mind) में छिपे हुए यथार्थ को दिया गया है क्योंकि इनके अनुसार यही वास्तविक तथा विस्तृत सच्चाई … Read more

शब्द और पद में अंतर | Shabd aur Pad men Antar | Shabd aur Pad men Kya Antar hai

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Shabd aur Pad men Antar

सामान्य बोलचाल में शब्द और पद को एक ही मान लिया जाता है । परंतु जब हम भाषाविज्ञान की दृष्टि से दोनों का अध्ययन करते हैं तो दोनों के बीच का अंतर पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है । शब्द और पद में अंतर (shabd aur pad men antar) को भली-भाँति समझने के लिए हमें इनका पृथक्-पृथक् अध्ययन करना पड़ेगा । अब हम शब्द और पद दोनों का पृथक्-पृथक् अध्ययन करेंगे । शब्द (word) भोलानाथ तिवारी के अनुसार – भाषा की सार्थक, लघुतम और स्वतंत्र इकाई शब्द है।  भाषा में वाक्य होते हैं और वाक्य शब्दों से बनते हैं । इस तरह शब्द भाषा की एक इकाई है । प्रत्येक शब्द का कोई-न-कोई अर्थ होता है । बोलते समय हम अपनी भाषा में अनेक प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते हैं। इन शब्दों का भाषा में विशेष महत्व है। इस प्रकार, निश्चित अर्थ को प्रकट करने वाले वर्ण-समूह को शब्द कहते हैं। … Read more

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