साहित्य का उद्देश्य मुंशी प्रेमचंद का सार | sahitya ka uddeshya munshi premchand ka sar

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sahitya ka uddeshya munshi premchand

यह निबंध प्रेमचंद के एक भाषण का लिखित रूप है। प्रेमचंद ने यह भाषण लखनऊ में ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना के अवसर पर अध्यक्ष के रूप में दिया था। इसमें हिंदी और उर्दू के अनेक लेखक शामिल हुए। यह सम्मेलन सन् 1936 में आयोजित हुआ था। इसे प्रेमचंद ने ‘साहित्य के इतिहास की एक स्मरणीय घटना’ बताया है।   प्रेमचंद का मत है कि अब तक हिंदी और उर्दू के ऐसे सम्मेलन हिंदी या उर्दू भाषा के निर्माण और प्रचार के लिए होते थे। जबकि यहसम्मेलन इससे आगे बढ़कर भावों और विचारों के प्रचार के लिए आयोजित किया गया है। इसके बाद प्रेमचंद ने साहित्य के स्वरूप को परिभाषित करने का प्रयास किया है। उनके अनुसार साहित्य वह लिखित रचना है जिसमें जीवन की सच्चाई प्रकट की गई है और जो हमारे भावों और विचारों के प्रभावित कर सकता है। सूत्र रूप में कहा जाए तो वे कहते हैं … Read more

नीतिकाव्य | Niti Kavya | नीति काव्य किसे कहते हैं | Niti Kavya Kise Kahte Hain

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Niti Kavya

नीतिकाव्य जीवन-व्यवहार को सुगम बनाने का आधार है। नीतिकाव्य सृजित करने में व्यावहारिक अनुभवों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। व्यक्ति इन अनुभवों को स्वयं के क्रिया-कलापों से तथा दूसरों के द्वारा अर्जित एवं कहे गए मन्तव्यों से ही अर्जित करता है।    स्वयं द्वारा अर्जित अनुभवों से यद्यपि व्यक्ति आत्मनिर्भर और संघर्षशील बनता है, तथापि दूसरों के अनुभव उसे सहजतापूर्वक जीवन को समझने मेंसहायक होते हैं। यह अनुभव यदि काव्य के रूप में होते हैं, तो वे मुहावरों जैसे हो उठते हैं। अधिकांश नीतिकथनपरक उक्तियों में जो सुग्राह्यता औरसरसता है, वह उन्हें मुहावरों की कोटि में ले जाने वाली है। हजारों वर्षों से नीतिपरक उक्तियाँ मनुष्य को जीवन के अँधेरों में प्रकाश की किरण बनकर उसे मार्ग दिखाती रही हैं, जीवन जीने का तरीका सिखाती रहीहैं। इस स्तर पर नीति काव्य शिक्षा के उद्देश्य को पूर्ण करने वाला बन जाता है।  नीतिकाव्य जीवन सुधार का लक्ष्य लेकर चलता है।नीति काव्य … Read more

प्लेटो का प्रत्ययवाद या प्लेटो का प्रत्यय सिद्धान्त | plato ka pratyayvad ya plato ka pratyay siddhant | plato ka pratyay siddhant | plato ka pratyayvad

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plato ka pratyay siddhant, plato ka pratyayvad

पश्चिम में विधिवत् रूप से एक शास्त्र के रूप में साहित्य की आलोचना की शुरुवात सबसे पहले प्लेटो (427-347 ई.पू.) के माध्यम से हुई । उनका जन्म ऐसे समय में हुआ था जिसे एथेन्स (यूनान) का पतनकाल कहा जाता है। आज भी विद्वान प्लेटो द्वारा कविता पर लगाए गए आरोपों से जूझ रहे हैं और उनका सही समाधान उन्हें नहीं मिल पा रहा है। समय-समय पर प्लेटो के संवादों में परवर्ती काव्यशास्त्र में विकसित अनेक सिद्धांतों के बीज भी खोजने के प्रयत्न किए गए हैं। इस तरह के प्रयत्न करने वाले विद्वानों ने करुणा और त्रास की दोहरी मिश्रित स्थिति या विरेचन सिद्धांत, विरुद्धों के सामंजस्य का सिद्धांत आदि के बीज संकेत प्लेटो में पाए हैं जबकि सच बात यह है कि प्लेटो के चिंतन का महत्व काव्य सिद्धांतों की सूची बनाने में नहीं है बल्कि इस बात में है कि प्लेटो कविता को लेकर बुनियादी प्रश्न उपस्थित करते हैं। … Read more

मार्क्सवादी साहित्य और कला-चिन्तन | Marxvadi Sahitya aur Kala Chintan | Marxvadi Sahitya Chintan

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Marxvadi Sahitya aur Kala Chintan

मार्क्सवादी कला और साहित्य-चिन्तन मार्क्सवादी दर्शन से प्रभावित है। इसके दो प्रमुख आधार हैं- एक द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और दूसरा ऐतिहासिक भौतिकवाद।   द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद एक विकास का सिद्धान्त है जो क्रिया, प्रतिक्रिया और समन्वय के द्वारा आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसका संबंध प्रकृति और जगत के नियमों की व्याख्या से है ।  ऐतिहासिक भौतिकवाद मनुष्य के सम्पूर्ण इतिहास की व्याख्या है । मानव-समुदाय का मूल प्रयत्न आर्थिक या उत्पादन-परक है। इसी के लिए वह श्रम का आधार ग्रहण करता है। इन्हीं तत्त्वों के आधार को ग्रहण कर कला और साहित्य का निर्माण होता है। अतः कला और साहित्य भी मानव के व्यापक कार्यकलाप का अंग है। वह उसके श्रम को मधुर बनाता है और उत्पादन के उपरान्त प्राप्त सफलता के आधार पर आगे के निर्माण और विकास की कल्पना प्रदान करता है और उसका मार्ग प्रशस्त करता है।  इस प्रकार मार्क्सवाद साहित्य और कला के सम्बन्ध में एक … Read more

अभिजात्यवाद क्या है | आभिजात्यवाद क्या है | Abhijatyavad Kya Hai | Classicism Kya Hai

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abhijatyavad kya hai

हिंदी शब्द अभिजात्यवाद या आभिजात्यवाद अंग्रेजी शब्द क्लासिसिज्म [CLASSICISM] का पर्याय है। हिंदी में आभिजात्यवाद के अतिरिक्त शास्त्रवाद या श्रेण्यवाद आदि कई नाम इसके लिए प्रस्तावित किए गए हैं।   आचार्य नलिनविलोचन शर्मा ने उसके लिए हिंदी  में ‘श्रेण्यवाद‘ शब्द प्रस्तावित किया किन्तु यह  शब्द प्रचलन में नहीं आ सका।   आभिजात्यवाद या क्लासिसिज्म की परिभाषा और व्याख्या समय-समय पर अनेक प्रकार से की गई है। वस्तुतः लैटिन शब्द ‘क्लासिक‘ का प्रयोग रोम के करदाताओं के सर्वोच्च वर्ग के लिए किया जाता था। बाद में सामान्य जनता से भिन्न अभिजात वर्ग या श्रेष्ठ वर्ग के साहित्य के लिए किया जाने लगा। परिणामतः क्लासिसिज्म (आभिजात्यवाद), क्लासिक (अभिजात) और क्लासिकल (अभिजात्य) ये तीनों शब्द सर्वश्रेष्ठ के लिए वाचक हो गए। ईसापूर्व दूसरी शताब्दी में ‘क्लासिक‘ का अर्थ अभिजात लेखक समझा जाता था, जो अल्पसंख्यक अभिजात (उच्च वर्ग) के लिए लिखता है।  कुछ समय बाद वह कृति क्लासिक कहलाने की अधिकारिणी मानी जाने लगी जिसमें … Read more

भारतेन्दुपूर्व हिंदी आलोचना | Bhartendupurva Hindi Alochana

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bhartendupurva hindi alochana

भारतेन्दु  से पूर्व भक्ति और रीति युग में आलोचना के क्षेत्र में प्रयास हुए हैं। भक्ति काल में भक्ति का प्रभाव इतना प्रबल है कि वहाँ अलग से काव्य-सिद्धांतों की चर्चा प्रायः नहीं हुई है। भक्त कवियों के लिए काव्य रचना ईश्वर भक्ति का साधन है इसलिए जहाँ ईश्वर है वहाँ उत्तम काव्य भी है। कबीर, सूर तुलसी, मीरा भक्तिकाल के ये सभी भक्त कवि इसी आदर्श को मानते हैं। यद्यपि तुलसीदास ने “सुरसरि सम सब कह हित होई” तथा “गिरा अर्थ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न” कह कर काव्य के प्रति अपनी सजगता भी प्रकट की है।  वैसे इसकाल में भक्तों के जीवन, विचार, भक्ति से परिचित कराने वाले ग्रंथ लिखे जाने लगे थे जिन्हें ‘वार्ता साहित्य’ के नाम से जाना जाता है। भक्त कवियों की कविता के संबंध में भी कहीं-कहीं विचार हुआ है। काव्य के वर्ण्य विषय और शैली बंधी विशेषताओं के अतिरिक्त काव्य के … Read more

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि | Acharya Hazariprasad Dwivedi Ki Alochana Drishti

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acharya hazari prasad dwivedi ki alochana drishti

बलिया जिला (उ.प्र.) के ‘आरत दुबे का छपरा’ नामक गाँव में जन्मे, काशी में शिक्षित हुए तथा शान्तिनिकेतन, चंडीगढ़ और काशी में अध्यापन करने वाले आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी (19.8.1907-19.5.1979) मूलतः साहित्येतिहासकार, आलोचक और अनुसन्धानकर्ता हैं।  उन्होंने साहित्य को सांस्कृतिक चेतना के स्तर पर देखा है। इसी दृष्टि से उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण आलोचना ग्रंथ लिखे हैं और उनके माध्यम से उन्होंने शुक्ल जी के बाद की हिंदी आलोचना को किसी हद तक प्रभावित भी किया है। ‘हिंदी साहित्य कोश’ के अनुसार, “यद्यपि मूलतः द्विवेदी जी, रामचन्द्र शुक्ल की परम्परा के आलोचक हैं फिर भी साहित्य को एक अविच्छिन्न परम्परा में देखने पर बल देकर द्विवेदी जी ने हिंदी समीक्षा को नई दिशा दी।” आचार्य द्विवेदी की प्रमुख आलोचना कृतियाँ हैं:  ‘कालिदास की लालित्य योजना’, ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘प्राचीन भारत में कलात्मक विनोद’, ‘कबीर’, ‘नाथ सम्प्रदाय’, ‘हिंदी साहित्य’ ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’, ‘साहित्य सहचर’, ‘हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास’, ‘मध्यकालीन बोध … Read more

कबीर का समाज दर्शन | Kabir Ka Samaj Darshan | कबीर एक समाज सुधारक के रूप में | Kabir Ek Samaj Sudharak Ke Rup Men | Kabir Ki Samajik Chetna

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार भक्तिकाल (पूर्व-मध्यकाल) का समय संवत् 1375 से 1700 (अर्थात् सन् 1318 ई. से 1643 ई.) तक है ।   उन्होंने भक्तिकाल का विभाजन निम्नानुसार किया है, जो आज सर्वमान्य है : भक्तिकाल का काल विभाजन : 1. निर्गुण धारा : (क) ज्ञानाश्रयी शाखा (संत काव्यधारा) – इसके प्रतिनिधि कवि कबीर हैं । (ख) प्रेममार्गी शाखा ( सूफ़ी काव्यधारा) – इसके प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी हैं । 2.सगुण धारा : (क) रामभक्ति शाखा – इसके प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं । (ख) कृष्णभक्ति शाखा –  इसके प्रतिनिधि कवि सूरदास हैं ।   इस प्रकार कबीर भक्तिकाल की निर्गुण धारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के अन्तर्गत संत-काव्य धारा के प्रमुख और प्रतिनिधि कवि हैं।  हिंदी साहित्य के भक्तिकाल में इन महाकवियों का आविर्भाव हुआ था, संभवत: इसी को ध्यान में रखकर हिंदी साहित्य के इतिहास लेखक जॉर्ज ग्रियर्सन ने अपने ग्रंथ ‘द मॉडर्न वर्नाक्यूलयर लिटरेचर ऑफ नॉर्दर्न हिंदुस्तान’ (1888 … Read more

मिथक | मिथक क्या है | Mithak | Mithak Kya Hai | Myth | Myth Kya hai

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  ‘मिथक’ शब्द अंग्रेजी के ‘मिथ’ (Myth) और ग्रीक शब्द ‘माइथोस’ शब्द पर आधारित है। ‘मिथ’ (Myth) का प्रयोग ‘कल्पित कथा’ या ‘पौराणिक कथा’ के लिए किया जाता है।  अरस्तू ने अपने ग्रन्थ ‘पोयटिक्स’ में ‘मिथक’ शब्द का प्रयोग ‘मनगढ़ंत कथा’ के लिए किया है। मिथक परम्परागत अनुश्रुत (परंपरा से प्राप्त ज्ञान) कथा है जो किसी अतिमानवीय प्राणी या घटना से सम्बन्धित होती है, जो बिना किसी तर्क के स्वीकार कर लिया जाता है।    हिंदी में इस शब्द का पहला प्रयोग आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने किया। ‘मिथ’ का मूल ग्रीक भाषा का शब्द ‘मुथॉस’  है जिसका अर्थ ‘वाणी का विषय’ है। ‘वाणी का विषय’ से तात्पर्य है, एक कहानी एक आख्यान (वर्णन, वृतांत, कथा), जो प्राचीन काल में सत्य माने जाते थे और कुछ रहस्यमय अर्थ देते थे। लेटिन भाषा में यह शब्द ‘मिथास’ है, जिसका अर्थ है – शब्द-कथा या कहानी।  इस प्रकार ‘मिथक’  ऐसे आख्यान (वर्णन, वृतांत, कथा) को कहते है, जिसमें कोई तार्किक संगति न हो। … Read more

वाक्य के भेद | वाक्य के प्रकार | Vakya ke Bhed | Vakya ke Prakar

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शब्दों का अपना अर्थ होता है, लेकिन इनको बिना किसी क्रम के अलग-अलग बोलने से वक्ता का पूरा अभिप्राय स्पष्ट नहीं हो पाता। जबकि शब्दों को निश्चित क्रम और स्वाभाविक गति से बोलने पर वक्ता का अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है।   जैसे – नदी के किनारे-किनारे एक गाय जा रही थी। अतः हम कह सकते हैं- वाक्य पदों का वह व्यवस्थित समूह है जिसमें पूर्ण अर्थ देने की क्षमता अथवा सामर्थ्य होता है।   वाक्य के अंग (Parts of Sentence)  वाक्य के दो अंग होते हैं- (1) उद्देश्य (Subject)   (2) विधेय (Predicate) एक छोटा-सा वाक्य लें – राहुल आया। इसके दो अंग हैं- 1. राहुल  2. आया।   यहाँ राहुल के बारे में बात की गई है अतः ‘राहुल’ वाक्य का उद्देश्य(Subject) है। राहुल के बारे में कहा गया है कि वह ‘आया’। यहाँ ‘आया’ विधेय (Predicate)  है। उद्देश्य (Subject) वाक्य में जिसके बारे में कुछ कहा जाए, उसे उद्देश्य (Subject) … Read more

समास और उसके प्रकार | Samas Aur Uske Prakar

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Samas aur uske prakar

समास के माध्यम से भी शब्दों का निर्माण होता है। समास का शाब्दिक अर्थ है संक्षेप। समास प्रक्रिया में शब्दों का  संक्षिप्तीकरण किया जाता है । 1.देश के लिए भक्ति  = देशभक्ति 2.राम और लक्ष्मण = राम-लक्ष्मण 3. रसोई के लिए घर = रसोई घर समास का अर्थ : ‘समास’ का शाब्दिक अर्थ है – छोटा करना या संक्षिप्त करना। जैसे- गंगा का जल = गंगाजल, जेब के लिए खर्च  = जेबखर्च।      अतः हम कह सकते हैं- दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर, संक्षिप्त कर नया शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं।      इस प्रक्रिया द्वारा जो नए शब्द बनते हैं, वे समस्त-पद या सामासिक पद  कहलाते हैं। समस्त पद का पहला पद पूर्वपद तथा दूसरा पद उत्तरपद कहलाता है। समास-विग्रह : समस्त पद को पुनः पहले की स्थिति में लाने की प्रक्रिया को ‘समास-विग्रह’ कहा जाता है। अर्थात्  समस्त-पद या सामासिक पद के सभी … Read more

पृथ्वीराज रासो के रेवा तट सर्ग का कथानक | Prithviraj Raso Ke Reva Tat ka Kathanak

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prithviraj raso ke reva tat ka kathanak

चन्दवरदाई दिल्ली के अंतिम सम्राट महाराज पृथ्वीराज चौहान के सामंत और राजकवि के रूप में प्रसिद्ध है । माना तो यह भी जाता है कि चन्द केवल पृथ्वीराज के राजकवि या सामंत ही नहीं बल्कि उनके परम मित्र भी थे। वे षडभाषा, व्याकरण, काव्य, साहित्य, छंदशास्त्र, ज्योतिष, पुराण आदि अनेक विधाओं में पारंगत थे ।  एक प्रसिद्धि यह भी है कि चन्दवरदाई और पृथ्वीराज चौहान दोनों का जन्म एक ही दिन हुआ था और मृत्यु भी एक ही दिन । चन्दवरदाई की प्रसिद्धि का कारण उनके द्वारा रचित ढाई हज़ार पृष्ठों का ग्रंथ ‘पृथ्वीराज रासो’ है । ‘पृथ्वीराज रासो’ महाकाव्य में 69 समय (सर्ग या अध्याय) हैं तथा इसमें 68 छंदों का प्रयोग है । मुख्य छंदों में कवित्त, छप्पय, दूहा, त्रोटक, तोमर, गाहा, आर्य आदि हैं । ‘पृथ्वीराज रासो’ में 69 समय (सर्ग) हैं। ‘रेवा तट’ समय पृथ्वीराज रासो का सत्ताइसवाँ समय (सर्ग) है। इसमें दिल्ली के महान् राजा … Read more

अलंकार सम्प्रदाय |Alankar Sampraday | Alankar Siddhant | Bhartiya Kavya Shastra

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Alankar Sampraday

   अलंकार काव्य का वह तत्व है जो उसे अलंकृत करता है । अर्थात् अलंकार काव्य को सुंदर बनाता है । सर्वप्रथम आचार्य भरत मुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में चार अलंकारों – उपमा, रूपक, दीपक और यमक का उल्लेख मिलता है ।  किन्तु अभी अलंकार-सिद्धान्त का जन्म नहीं हुआ था ।   संस्कृत काव्यशास्त्र में कालक्रम की दृष्टि से रस सम्प्रदाय सबसे प्राचीन है। अलंकार-सिद्धान्त का प्रवर्तक भामह (छठी शती ई.) को माना जाता है, जिनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘काव्यालंकार’ है । भामह ने 37 अलंकारों का निरूपण किया तथा अलंकार को काव्य का अनिवार्य तत्व घोषित किया । अलंकारवादी आचार्यों में भामह, दण्डी, उद्भट, रुद्रट, भोज, रुय्यक, जयदेव और अप्पय दीक्षित के नाम लिये जा सकते हैं। इनके अतिरिक्त अलंकारों पर विचार उन आचार्यों ने भी किया है जो मूलतः अलंकारवादी आचार्य नहीं थे। यहां हम संक्षेप में अलंकारवादी आचार्यों के मत दे रहे हैं : (1) भामह ‘भामह‘ अलंकार सम्प्रदाय के … Read more

प्रतीक | प्रतीक क्या है | Pratik | Pratik Kya hai

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Pratik Kya hai

प्रतीक किसी वस्तु विशेष या भाव समूहों का एक ऐसा संकेत है जो अगोचर एवं अतीन्द्रिय है, जिसका संपूर्ण रूप में मस्तिष्क में अनुभव किया जा सकता है। अर्थात प्रतीक ऐसा शब्द चिह्न है जो किसी वस्तु का बोध कराता है। वस्तुतः प्रतीक किसी सूक्ष्म भाव, विचार या अगोचर तत्व को साकार करने के लिए प्रयुक्त होता है। उदाहरण के लिए, किसी देश का ध्वज उस देश की राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतिनिधित्व करने के कारण राष्ट्र के सम्मान एवं गौरव का प्रतीक होता है। प्रतीक शब्द रूप में किसी अन्य अर्थ की व्यंजना करता है, यथा : काहे री नलिनी तू कुम्हिलानी। इस पंक्ति में ‘नलिनी‘ जीवात्मा का प्रतीक है। स्पष्ट ही ‘नलिनी‘ का शब्दार्थ न लेकर यहां प्रतीकार्थ ग्रहण किया गया है। काव्य या साहित्य में प्रतीकों का प्रयोग प्रारम्भ से होता रहा है। हिन्दी में सिद्ध साहित्य एवं कबीर आदि कवियों की रचनाओं में प्रतीकों का प्रचुरता से … Read more

साहित्य का उद्देश्य | Sahitya ka Uddeshya | Sahitya ka Prayojan | साहित्य का प्रयोजन

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Sahitya ka Uddeshya

साहित्य शब्द और अर्थ के समन्वित सौंदर्य से निर्मित ऐसी लोकमंगलकारी रचना है जो रचनाकार के भावों, विचारों और आदर्शों को पाठक या समाज तक सम्प्रेषित करती है।  विद्वानों के अनुसार ‘साहित्य’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है = सहित + यत् प्रत्यय । अर्थात साहित्य का अर्थ है – साथ होने का भाव या सहभाव । इसका अर्थ यह कि जहाँ शब्द और अर्थ एक साथ आते हैं,वही साहित्य है। इसमें कल्याण का भाव समाहित होता है। कल्याण के इसी भाव को लक्षित करके आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा- “निखिल विश्व के साथ एकत्व की साधना ही साहित्य है”। स्पष्ट है कि साहित्य हमारी संवेदना के तारों को झकझोरता हुआ हमें संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है ताकि हम समूचे विश्व के साथ एकत्व को महसूस करते हुए वैश्विक संवेदना के साथ जुड़ाव विकसित कर सकें। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ की भूमिका … Read more

यथार्थवाद क्या है | Yatharthvad Kya Hai| Realism Kya Hai

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Yatharthvad Kya Hai

हिंदी में यथार्थवाद अंग्रेजी के रियलिज्म (Realism) के अनुवाद के रूप में प्रयुक्त होता है । यथार्थ का अर्थ है यथा + अर्थ यानी जैसा है वैसा अर्थ। किंतु इसका पारिभाषिक अर्थ समझने के लिए इतिहास और दर्शन के क्षेत्र में जाना पड़ेगा । यथार्थवाद मूलतः दर्शन के क्षेत्र का शब्द है, जहाँ  से साहित्य व कला के क्षेत्र में ले लिया गया है । इस शब्द को दर्शनशास्त्र के सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत करने वाले प्रथम दार्शनिक प्लेटो थे ।      कला और साहित्य के क्षेत्र में ‘यथार्थवाद’  एक आंदोलन के रूप में 19 वीं सदी में फ्रांस में उभरा । 1826 में मर्क्यू फ्रांसे ने ‘यथार्थवाद’ की परिभाषा अपने निबंध में की । तदुपरांत 1855 में फ्रांस के प्रसिद्ध चित्रकार कूर्वे ने अपने चित्रों में यथातथ्य शैली का व्यवहार किया तथा अपनी चित्र प्रदर्शनी के प्रवेश द्वार पर ‘यथार्थवाद’  शब्द अंकित किया । चित्रकला में यथार्थवाद के अभ्युदय … Read more

फैन्टेसी क्या है | Fantasy Kya Hai

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Fantasy Kya Hai

आधुनिक काव्य-चिन्तन में कल्पना के साथ ‘फैन्टेसी’ की चर्चा भी बराबर होती है। इसका कारण यह है कि ‘फैन्टेसी’ भी एक प्रकार की कल्पना ही है। प्लेटो ने कल्पना के लिए ‘फैन्टेसिया’ शब्द प्रयोग किया था जिसका आधार ‘असत्य’ या ‘मिथ्या’ होता है।  अतः ‘फैन्टेसी’  शब्द का निर्माण यूनानी शब्द ‘फैन्टेसिया’ से हुआ है जिसका अर्थ है “मनुष्य की वह क्षमता जो सम्भाव्य संसार की सर्जना करती है।” मानविकी कोश में फैन्टेसी को स्वप्न चित्र मूलक साहित्य कहा गया है जिसमें असम्भाव्य सम्भावनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। फैन्टेसी कल्पना पर आधारित होती है जिसे दिवास्वप्नात्मक (daydreaming) अथवा दुःस्वप्नात्मक (nightmare) मानसिक बिम्ब (image) कहा जा सकता है। यह एक प्रकार की साहित्यिक तकनीक है जिसका सम्बन्ध मनुष्य के स्वप्न और अवचेतन (subconscious mind) में घटित होने वाली घटनाओं की ऐसी बिम्बावलियों (images) से है जो विघटित एवं बेतरतीब होती हैं। फैन्टेसी का प्रयोजन फैन्टेसी के तीन प्रयोजन (purpose) हैं-  1. … Read more

अस्तित्ववाद क्या है | Astitvavad kya hai

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Astitvavad kya hai

अस्तित्ववाद मूल रूप से दर्शन के क्षेत्र का शब्द है । यह अंग्रेजी के एक्जिस्टेंशियलिज़्म (Existentialism) का हिंदी पर्याय हैअस्तित्ववाद का उन्मेष प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी में हुआ।  तदुपरांत उसने फ्रांस और इटली होते हुए एशिया के देशों में भी अपना प्रभाव डाला। इस सिद्धान्त ने साहित्य सृजन तथा आलोचना सिद्धान्त को गहराई से प्रभावित किया है । वर्तमान विश्व चिंताधारा निर्वैक्तिक विघटनकारी प्रवृत्तियों की ओर अधिक झुकी हुई है। व्यक्ति के विकास एवं निर्माण को समाज विभिन्न वर्जनाओं और निषेधों से अवरुद्ध करता है।धर्म और समाज की इन निषेधात्मक प्रवृत्तियों के विरोध में 19 वीं सदी में कुछ विद्वानों ने मनुष्य को उसके प्रकृत रूप में स्थापित एवं विकसित होने देने के लिए आवाज उठाई।      उन्होंने एक ऐसा दार्शनिक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया, जो उन तमाम परंपरागत मतवादों का विरोध करता था जो मानवीय सत्ता  (Human Existence)  की उपेक्षा करके मात्र विचारों तथा नैतिक मूल्य एवं मान्यताओं की … Read more

संरचनावाद क्या है | Sanrachanavad Kya Hai

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sanrachanavad kya hai

संरचनावाद अंग्रेजी शब्द (Structuralism) का हिंदी पर्याय है । संरचनावाद पाश्चात्य समीक्षा जगत से हिंदी में आया।  यह 1960 के दशक के फ्रांस में विकसित बौद्धिक विश्लेषण एवं चिंतन की वह पद्धति है जिसे विश्व स्तर पर भाषाविदों, साहित्य समीक्षकों, दार्शनिकों, मनोविज्ञान शास्त्रियों तथा नृविज्ञान शास्त्रियों (anthropologist) का उत्साहवर्द्धक समर्थन मिला । तो चलिए आज हम sanrachanavad kya hai  को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं ।  ‘संरचनावाद’ की अवधारणा का मूल स्त्रोत जेनेवा और पेरिस में  भाषाविज्ञान के प्रोफेसर फर्डिनेन्ड-डि-सस्यूर (Ferdinand de Saussure, 1857-1913) द्वारा प्रतिपादित ‘भाषा-सिद्धांत’है ।‘संरचनावाद’ का केंद्रवर्ती  बिन्दु ‘कृति’ है, कृतिकार अथवा  समीक्षक नहीं । ‘संरचनावाद’ का गहरा संबंध ‘भाषा’ से है । ‘संरचनावाद’ भाषिक दृष्टि  से साहित्य के मूल्यांकन का प्रतिमान (model) है।  भाषा का ऐसा कलात्मक  प्रयोग, जो मानव स्थितियों के नाना पहलुओं को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत करता है, ‘संरचनावाद’ के अंतर्गत आता है।   भाषा और अर्थ परस्पर जुड़े रहते हैं । अतः किसी भी साहित्यिक कृति … Read more

प्लेटो का काव्य सिद्धांत | Plato ka Kavya Siddhant

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Plato ka Kavya Siddhant

पाश्चात्य काव्य-चिंतन की परंपरा का विकास 5 वीं सदी ईस्वी पूर्व से माना जाता है। पतंतु पाश्चात्य आलोचना में भौतिक सिद्धान्तों का सर्वप्रथम प्रतिपादन प्लेटो द्वारा ही हुआ । इसी काल में पाश्चात्य अर्थात् ग्रीक आलोचना का क्रमबद्ध स्वरूप देखने को मिलता है । इसके पहले कतिपय यूनानी साहित्यकारों (होमर, पिण्डार, गार्जियस, अरिस्टोफनीस आदि) की कृतियों में हमें भले ही कुछ फुटकर आलोचना के सिद्धान्तों के दर्शन हों, किन्तु उनका कोई सारगर्भित और व्यवस्थित रूप हमें देखने को नहीं मिलता । एक व्यवस्थित शास्त्र के रूप में पाश्चात्य साहित्यालोचन की पहली झलक प्लेटो (427-347 ई.पू.) के ‘इओन’ नामक संवाद में मिलती है । प्लेटो का जन्म 427 ई.पू.में एथेंस में हुई और मृत्यु 347 ई.पू.में हुई। इनका मूल नाम अरिस्तोक्लिस था, लेकिन इनके गुरु ने इन्हें प्लातोन नाम दिया। आज हम इन्हें अरबी-फारसी में अफलातून और अंग्रेजी में प्लेटो के नाम से जानते हैं। प्लेटो की महत्वपूर्ण रचनाएँ ईओन (Ion), विचार … Read more

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